उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम कब लागू हुआ | उपभोक्ता अदालतो गठन एवं स्वरूप के बारे में बताओ

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उपभोक्ता अदालतो गठन :- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 जम्मू कश्मीर राज्य को छोड़कर शेष समस्त  देश में  1/07/1987 को लागू हो गया था :- किंतु उपभोक्ता फोरम की स्थापना में कुछ समय लगा। वर्ष 1988 में कुछ उपभोक्ता फोरम स्थापित हो गए। व उनमें कार्य प्रारंभ हो गया। 1999 की गणना के अनुसार इस समय देश भर में कुल 543 उपभोक्ता फोरम जिला स्तर पर कार्य करने लगे थे। और इस समय लगभग 700 उपभोक्ता अदालतें देश में भर में कार्य कर रही हैं।

दिल्ली में पहला उपभोक्ता फोरम तीस हजारी में 19/8/1988 कोई स्थापित हुआ। इस अकेले फोरम में फाइल किए जाने वाले मामलों की संख्या  काफी थी।

वह फोरम ने अनेक महत्वपूर्ण निर्णय के दिल्ली का दूसरा फोरम दक्षिण दिल्ली में 10/03/1992 को स्थापित किया गया। यह फोरम फोरम दो के नाम से जाना गया ।1996 में दो फोरम जनकपुरी व  नंदनगरी में तथा 1998 में दो फोरम सी शालीमार व कस्तूरबा गांधी मार्ग में खुले। 1999 तक दिल्ली के सभी 9 जिलों में 9 फोरम काम करने लगे।
दिल्ली में राज्य उपभोक्ता आयोग 1989 में स्थापित हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर भी 1989 में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग खुल गया। इस प्रकार देशभर में इस अधिनियम के लागू होते ही तीन स्तरों पर उपभोक्ताओं की शिकायतें सुनने व उनके निवारण के लिए अर्ध न्यायिक व्यवस्था का शुभारंभ हो गया।
अर्ध न्यायिक व्यवस्था शब्द साधारण व्यक्ति के लिए एक भ्रामक संदेशवाहक हो सकता है। कि संभवत इस व्यवस्था में न्यायिक अधिकार न्यून हो। किंतु वास्तव में स्थित ऐसी नहीं है। बल्कि कहना यह चाहिए कि यह एक विलक्षण न्याय व्यवस्था है। जिसमें कम खर्च में द्रुतगति से न्याय देने के लिए बाधा डालने वाले अनेक तकनीकी बातों की उपेक्षा कर देने की पूरी छूट है। इन फोरमो की छूट ऐसी विशेषताएं हैं जो अन्य किसी भी ट्रिब्यूनल फोरम और यहां तक कि सिविल न्यायालय में भी दिखाई नहीं देती।




इन फोरमो में कुछ उल्लेखनीय पक्ष है- उपभोक्ता अदालतो गठन

1- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के 2002 में हुए संशोधन से पूर्व कोर्ट शुल्क  शून्य रहा है। और 1987 में आज तक उपभोक्ताओं को यह न्याय की सुविधा निशुल्क प्राप्त होती रही है। अभी भी 2002 के संशोधन में कुछ शुल्क का प्रावधान बहुत नगर रखने का आशय है इसका मंतव्य भी न्याय निशुल्क होने के कारण इसे दुरुपयोग से बचना है।
2- उपभोक्ता स्वयं या उपभोक्ता का कोई भी प्रतिनिधि बिना वकील की सहायता के केस दायर कर सकता है। व पूरे केस की सुनवाई बिना वकील के हो सकती है।
3- प्रक्रिया अत्यंत संक्षिप्त है वह सिविल प्रक्रिया संहिता अथवा आपराधिक प्रक्रिया संहिता या साक्ष्य संबंधी नियमों का कठोरता से पालन नहीं किया जाता।
4- नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत ही सर्वोपरि मानकर अनेक तकनीकी व क्लिष्ट प्रक्रियाओं को अनदेखा कर दिया जाता है।
5- यह फोरम न्यायालय कम व राहत प्रदान करने वाली एजेंसी अधिक है। जहां भुक्तभोगी व्यक्ति को सीधे उसी की सरल सीधी भाषा में सुना जाता है।




6- उपभोक्ता के लिए उपभोक्ता फोरम एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में उभर कर आया है। उपभोक्ता के समक्ष अन्य रास्ते भी खुले हैं। पर क्योंकि यह रास्ता अत्यंत सरल  सस्ता व सहज उपलब्ध है। यह थोड़े ही समय में अत्यंत लोकप्रिय हो गया है।
7-चूँकि यह अधिनियम जनकल्याण की मूल भावना पर आधारित है। इसमें उपभोक्ता को हुई हानि की भरपाई करना व उसको हुई असुविधा व कष्ट के लिए मुआवजा देने का प्रावधान है। यद्यपि उपभोक्ताओं संबंधी कई कानून पहले ही विद्यमान थे। तथापि उनके दांडिक के प्रावधानों से उपभोक्ता की कोई क्षतिपूर्ति नहीं होती थी।
8- इन उपभोक्ता फोरम द्वारा जारी किए गए आदेश पूर्ण रूप से न्यायिक होते हैं। वह उनका पालन न करने पर दोषी व्यक्ति को जेल की सजा तक देने का अधिकार इस फोरम को है।
यही नहीं आपराधिक दंड प्रक्रिया के प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट को जो अधिकार प्राप्त है। इन उपभोक्ता फोरम को भी अपने आदेश का पालन करवाने के लिए वही अधिकार प्राप्त है। इन अधिकारों के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को भगौड़ा घोषित करने उसकी संपत्ति का अधिग्रहण करने उसे बेचकर राशि वसूल करने के समस्त अधिकारों का प्रयोग इन्ही फारमो द्वारा किया जा सकता है। सिविल कोर्ट या आपराधिक प्रक्रिया संहिता की जटिल प्रक्रिया अपनाने की कोई भी इन फारमो को कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाते हुए आदेशो का पालन भी उसी त्वरित गति से कराया जाता है जिस तत्परता से केस का निपटाना किया जाता है।
9- इस संक्षिप्त व सुलभ न्याय प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी समुचित प्रावधान किए गए हैं झूठी शिकायत करने वाले को भी उसी प्रकार के दोषी ठहराया जाता है जैसे दोषी व्यक्ति को मुआवजे के आदेश दिए जाते हैं।
अपनी इन समझ तो विलक्षणता ओं के साथ तीन स्तर पर न्यायालय गठित किए गए हैं जिनको अधिनियम में निहित प्रावधानों के अनुसार स्वरूप दिया गया है।

 जिला उपभोक्ता फोरम- उपभोक्ता अदालतो गठन

जिला स्तर पर गठित उपभोक्ता न्यायालय को जिला उपभोक्ता फोरम कहा जाता है। जिसकी खंडपीठ में 3 सदस्य होते हैं। 3 सदस्यों में एक अध्यक्ष होता है। व 2 सदस्य।  2 सदस्य में 1 सदस्य अनिवार्यता महिला होती है। तीनों के मत का समान महत्व होता है। किसी भी निर्णय पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। किंतु यदि कोई एक सदस्य सुनवाई के समय उपस्थित ना हो तो, दो सदस्यों से भी खंडपीठ सुनवाई के लिए पूर्ण मानी जाती है। व उस स्थिति में आदेश पर उन्हीं दो सदस्यों के हस्ताक्षर होंगे जो सुनवाई के समय उपस्थित होंगे। तीनों सदस्य में मतभेद होने की स्थिति में 1 सदस्य अध्यक्ष का मतैम्य होना आवश्यक है। 2 सदस्य यदि मतैक्य हो, अध्यक्ष का मत अलग हो तब भी अध्यक्ष के मत की कोई मान्यता नहीं होगी। ना ही दो सदस्यों के मत को वैधता प्राप्त होगी।

 राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग

प्रत्येक राज्य में 1 राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की स्थापना का प्रावधान है। वर्ष 2002 में हुए संशोधन के में आवश्यकता समझी जाने पर राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग सर्किट बैंच की स्थापना भी कर सकता है। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में एक-एक अध्यक्ष जो उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। वह कम से कम 2 सदस्यों से मिलकर खंडपीठ का गठन होता है।




एक सदस्य अनिवार्यता महिला होती है। यह आयोग जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा किया गया। निर्णय के विरुद्ध अपील सुन सकता है। वह 20 लाख से एक करोड़ तक की राशि के सीधे मामले सुन सकता है। आदेश पर हस्ताक्षर उन सभी सदस्यों के होंगे जो अंतिम तर्क सुनने के समय उपस्थित रहेंगे। अध्यक्ष व से सदस्यों में से 50% का मतैक्य होना अंतिम आदेश के लिए अनिवार्य है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग

राष्ट्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग   की स्थापना केंद्रीय स्तर पर की गई है। जिसमें एक अध्यक्ष तथा कम से कम 4 सदस्य होते हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। इस आयोग में भी एक सदस्य अनिवार्यता महिला होती है। या आयोग सभी राज्य आयोगों द्वारा निर्मित मामलों की अपील सुन सकता है। व एक करोड़ से अधिक राशि के सीधे मामले भी सुन सकता है। इस आयोग के विरुद्ध अपील केवल सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ही हो सकती है ।

 

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