भारतीय संविधान में गिरफ्तार व्यक्ति को क्या अधिकार प्राप्त हैं।

अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान में गिरफ्तार व्यक्ति को क्या अधिकार प्राप्त हैं।
अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान में गिरफ्तार व्यक्ति को क्या अधिकार प्राप्त हैं।
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भारतीय संविधान में एक बन्दीकृत व्यक्ति को साधारण एवं निवारक निरोध कानून के अन्तर्गत क्या अधिकार प्राप्त हैं।

 

व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Life and Personal Liberty) –अनुच्छेद 21 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति चाहे वह नागरिक हो या कोई विदेशी, कानून द्वारा रस्थापित प्रक्रिया से सिवाय अन्य किसी तरीके से अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जायेगा यह अनुच्छेद सरकार के ऐसे कार्यों पर प्रतिबन्ध लगाता है जो व्यक्ति के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का बिना किसी प्राधिकार के उल्लंघन करते हैं । किसी व्यक्ति को प्राण या शारीरिक स्वतन्त्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं। प्राग और दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार सभी अधिकारों में श्रेष्ठ है और अनुच्छेद 21 इसी अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है ।

 

अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त ‘दैहिक स्वतन्त्रता’ पदावली काफी विस्तृत अर्थ वाली पदावली है। और इस अर्थ में इसके ‘अन्तर्गत दैहिक स्वतन्त्रता के सभी आवश्यक तत्व शामिल हैं। जो व्यक्ति को पूर्ण बनाने में सहायक हैं । इस अर्थ में इस पदावली में अनुच्छेद 19 द्वारा दिये गये स्वतन्त्रता के सभी अधिकार शामिल हो जाते हैं। किन्तु आरम्भ में सुप्रीम कोर्ट ने इस पदाबली का बहुत संकुचित अर्थ लगाया था ।




सर्वप्रथम इस पेदावली की व्याख्या का प्रश्न ए0 के0 गोपालन ब० मटार राज्य A.I.R. 1952 S.C. 27 में आया था। प्रस्तुत वाद में पिटिश्नर को निवारक निरोध अधिनियम, 1950 (Preventive Detention Act, 1950) के अन्तर्गत निरुद्ध करके जेल में बन्द कर दिया था। पिटेश्नर ने अपने निरोध को इस आधार पर चुनौती दी कि इससे उसके अनुच्छेद 19 में दिये गये समस्त भारत में भाषण की स्वतन्त्रता के अधिकार का अनुच्छेद 19 (5) के अन्तर्गत उसके अधिकार पर अयुक्तियुक्त प्रतिबन्ध लगाता है इसलिए अवैध है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 21 केवल कार्यपालिका के कार्यों के विरूद्ध संरक्षण प्रदान करता है, विधानमण्डल के विरूद्ध नहीं । अतः विधानमण्डल कोई विधि पारित करके किसी व्यक्ति को उसके प्राण और शारीरिक स्वतन्त्रता से बंचित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने खड़कसिंह बनाम स्टेट आफ यू० पीo A.I. R. 1963 S.C. 1295 में ‘जीवन’ (Life) शब्द की व्याख्या करते हुये कहा कि इस शब्द का अर्थ केवल पशु का जीवन नहीं बल्कि यह उन सभी सीमाओं और सुविधाओं तक विस्तृत है जिनके द्वारा जीवन अपभोग किया जाता है। यह उपवन्ध शरीर के अंग-भंग को मना करता है। इस वाद में न्यायालय ने यू० पीo रेगुलेशन नं० 236 (ख) की मान्यता, जो किसी संदिग्ध व्यक्ति के घर में आने जाने का उपवन्ध करता है को इस आधार पर अवैध घोषित कर दिया कि यह किसी कानूनी प्राधिकार के बिना केवल कार्यकारी निर्देश (Executive Direction) है और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन करता है।

 

दैहिक स्वतन्त्रता पर आपात्कालीन घोषणा का प्रभाव (Effect of Declaration of Emergency on the Freedom of Life)

 

हमारे सविधान के अनुच्छेद 359 में यह उपबन्धित किया गया है कि राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी करके या आपात् कालीन घोषणा के पश्चात् दैहिक स्वतन्त्रता और घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। आपात् कालीन स्थिति में किसी भी व्यक्ति को किसी भी आधार पर निरोध की वैधता को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। जबकि अनुo 21 में दिये गये अधिकारों को निर्बन्धित कर दिया जाता है तो युक्तियुक्त कारण होने पर उस स्वतन्त्रता के विरुद्ध कोई माँग नहीं की जा सकती है। किन्तु 44 वाँ संविधान-संशोधन अधिनियम 1978 के माध्यम से अब यह उपबन्धित कर दिया गया है कि राष्ट्रपति के आदेश से आपात्काल में भी अनुo 20 और 21 में प्राप्त दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार को निलम्बित नहीं किया जा सकता।




दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संशोधन के बाद अब आपात्काल में भी अनुo 20 और 21 के दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार का निरोध किये जाने पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। किन्तु 44 वाँ संविधान-संशोधन अधिनियम, 1978 के माध्यम से अब यह उपबन्धित कर दिया गया है कि राष्ट्रपति के आदेश से आपात्काल में भी अनुच्छे द 20 और 21 में प्राप्त दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार दको निलम्बित नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संशोधन के बाद अब आपात्काल में भी अनुच्छेद 20 और 21 के दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार का निरोध किये जाने पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

 

इस संशोधन अधिनियम के पारित हो जाने से अब नागरिकों को तथा सभी व्यक्तियों को दैहिक स्वतन्त्रता के अधिकार में और भी अधिक दृढ़ता प्रदान हुई है। प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता एकमात्र स्रोत हैं और इनके विरोध पर कोई भी अयुक्तियुक्त प्रतिबन्ध (Unreasonable Restriction) असंवैधानिक होगा किन्तु युक्तियुक्त प्रतिबन्ध के खिलाफ कोई उपचार प्रदान नहीं किया जा सकता।

 

कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law)




जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार भी अन्य अधिकारों की तरह प्रतिबन्धयुक्त है। कारण यह है कि व्यक्तिगत रवतन्त्रता के अधिकार का अस्तित्व एक सुव्यवस्थित समाज में ही सम्भव होता है। अन्य लोगों के कानूनी अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए ही इस अधिकार को “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के अन्तर्गत स्थिति किया गया है।

 

सुप्रीम कोर्ट ने ए० के० गोपालन बनाम मद्रास, A.I.R. 1954, S.C. 27 में “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” शब्द को व्याख्या करते हुये कहा है कि कानून शब्द का अर्थ राज्य द्वारा बनाये गये कानून से है, न कि प्राकृतिक कानून से। अतः संसद या विधानमण्डल कानून द्वारा
किसी व्यक्ति के जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अपहरण कर सकती है और न्यायालय को यह अधिकार नहीं होगा कि वह इस बात पर विचार करे कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया न्यायसंगत है या नहीं। इस प्रकार यदि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता अनुच्छेद 21 अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रता का उपयोग करने का भी अधिकारी नहीं होता। अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत दिये गये अधिकारों का उपयोग एक स्वतन्त्र व्यक्ति द्वारा ही किया जा सकता है।

 

अत: यदि कोई कानून जीवन और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अपंहरण से राम्बन्धित है तो ऐसी विधि को अनुच्छेद 20 से 22 तक दी गई शर्तों को पूरा करना चाहिये न कि अनुच्छेद 19 में दी गई शर्तों को क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ उन स्वतंत्रंता का अर्थ उन स्वत्रंताओं से है जो अनुo 19 के अन्तर्गत दी गई स्वतन्त्रताओं के निकालने पर बचती हैं। परन्तु मेनका गाँधी बनाम भारत संघ, A.LR. 1978 S.C 597 में सर्वोच्च न्यायालय ने गोपालन के मामले में दिये गये अपने निर्णय को उपलक्षित रूप से उलट, दिया और कहा कि अनुच्छेद 21 न केवल कार्यकारिणी के कार्यों के विरूद्ध बल्कि विधायिका के विरूद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। अतः विधान-मण्डल द्वारा पारित किसी विधि के अधीन निर्धारित प्रक्रिया जो किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता से वंचित करती है उचित. युक्तियुक्त और प्राकृतिक सिद्धान्तों के अनुरूप होनी चाहिये।




न्यायालय ने कहा कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है वरन इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुये जीने का अधिकार शामिल है। इस वाद में जस्टिस भगवती ने बहुमत का निर्णय सुनाते हुए कहा कि अनु0 21 में प्रयुक्तदैहिक स्वतन्त्रता शब्दावली अत्यन्त व्यापक अर्थ वाली है और इसके अन्तर्गत ऐसे बहुत अधिकार शामिल हैं जिनमें व्यक्ति की दैहिक स्वतन्त्रता का गठन हो के अन्तर्गत छीन ली. जाती है तो वह अनुच्छेद 19 के और उनमें से कुछ को विशिष्ट मूल अधिकारों का दर्जा दिया गया है और अनुच्छेद 21 के अधीन बनाई गई विधि की वैधानिकता की जाँच अनुo 14 और अनु0 19 (5) के अधीन भी की जायेगी और यदि उसके अधीन लगाई गई पाबन्दी अयुक्तियुक्त और मनमानी हैं तो उस विधि को असवैधानिक घोषित कर दिया जायेगा।

 

इसी प्रकार फ्रेन्सिस कोरेली ब0 भारत संघ A.I.R. 1981, S.C. 476 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण (Life) शब्द के तात्पर्य पशुवत् जीवन से नहीं वरनु मानव-जीवन से है । इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन् अध्यात्मिक अस्तित्व भी है । प्राण’ का अधिकार शरीर के अंगों की रक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनन्द मिलता है बल्कि इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिये आवश्यक है।




पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट्स ब० भारत संघ A.I.R. 1982 s.C. 1473 में एशियाड योजनाओं में काम करने वाले श्रमिकों को 9 रू० न्यूनतम मजदूरी दिया जाना था किन्तु ठेकेदारों के जमादारों ने उन्हें 8 रू0 मजदूरी दी और प्रति श्रमिक 1 रू0 कमीशन काट लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अवैध घोषित कर दिया क्योंकि न्यूनतम मजदूरी न दिये जाने से श्रमिकों के अनुच्छेद 21 गरिमा से जीविकोपार्जन के अधिकार का उल्लंघन होता था ।

महाराष्ट्र राज्य ब0 चन्द्रभान, A.I.R. 1982, S.C. 1473 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाम्बे सिविल रूल 1959 को जिसके अधीन एक सरकारी सेवक को निलम्बन की अवधि में 1 रूपया प्रति माह निर्वाह भक्ता देने का प्रावधान था, इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि इससे अनुच्छेद 21 की अवहेलना होती है, क्योंकि ऐसी अवस्था में अपीलार्थी के लिये न्यायालय में अपनी अपील का चलाना असम्भव है।




सुभाष कुमार ब0 बिहार राज्य A.I.R. 1991 S.C 420 में सर्वांच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रदूषण रहित जल और वायु के उपभोग का अधिकार अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीविकोपार्जन के अधिकार में शामिल है और किसी भी नागरिक को जल और वायु को प्रदूषण से बचाने के लिये अनुo, 32 के अन्तर्गत लोकहित में वाद दायर करने का हक है। सीo ई0 एस0 ब0 सुभाष चन्द्र बोस, 1992 S.C. 441 में यह निर्धारित किया गया है कि सामाजिक न्याय. का अधिकार एक मूल अधिकार है। जीविकोपार्जन का अधिकार अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्राण के अधिकार से उत्पन्न होता है। कर्मचारी का स्वास्थ्य प्राण के अधिकार का एक आंवश्यक तत्व है।

 

क्या जीने के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल है?

 

महाराष्ट्र राज्य ब0 मारूति श्रीपति छूबल, 1987 C.I.J. 743 में बम्बई हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार भी शामिल है। इस मामले में बम्बई के एक सिपाही ने नगर निगम द्वारा जीविकोपार्जन हेतु एक दुकान स्थापित करने की अनुमति देने से-इन्कार किये जाने पर निराश होकर नगर निगम के अधिकारी के कमरे में ही आग लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। न्यायालय ने कहा कि वह दोषी नहीं था क्योंकि ऐसी स्थिति में उसके पास कोई विकल्प नहीं था और अनुच्छेद 21 उसे यह अधिकार प्रदान करता है। न्यायालय ने दण्ड संहिता की धारा 309 असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है।




इसी प्रकार पी0 रथीनम ब0 भारत संघ A.I.R. 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 309 जो आत्म हत्या के प्रयास को अपराध घोषित करती है अनुच्छेद 21 का अतिक्रमण करती है और इसलिए यह शून्य है। परन्तु महाराष्ट्र राज्य ब0 मारूति श्रीपति डुबल, 1996 के फैसले के द्वारा सर्वसम्मति से पी0 रथीनम में दिये गये निर्णय को स्वोच्च न्यायालय ने पलट दिया। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 के अधीन दिये गये अधिकार में आत्म हत्या का अधिकार शामिल नहीं है। अतः आत्महत्या का प्रयास करना या इसमें सहायता देना धारा 309 व 306 के अधीन अपराध ही माने जायेंगे।

 

जीवन और स्वतन्त्रता की सुरक्षा के संवैधानिक उपाय (Constitutional Safeguards of Right to Life and Liberty)

 

न्यायाधीश हिदायतुल्ला ने स्टेट ऑफ एम0 पीo बनाम शोभाराम A.IR. 1966, S.C. 1910 में निर्णय देते हुए बन्दी व्यक्तियों की सुरक्षा के सम्बन्ध में कहा कि, अनु० 21 व 22 एक अर्थ में साथ-साथ चलते हैं। किन्तु उनकों अन्तर सम्बन्धित या अन्तर निरभर नहीं बरता जा सकता। अनुच्छेद 21 यह सकेत नहीं करता कि वह कानून क्या होना चाहिये. न कि अनु0 22 ऐसा करता है। अनु0 22 निःसन्देह एक प्रकार से अनु0 21 के स्वतन्त्रता के अधिकार को अनुo 21 के अन्तर्गत छीन लिया गया है एक बन्दीकृत व्यक्ति को निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है-




बन्दीकृत व्यक्ति को प्राप्त संबैधानिक अधिकार

 

(i) बन्दी को तुरन्त उसकी गिरफ्तारी के आधारों (Grounds of Arrest) की सूचना दी जानी चाहिये।
(ii) उसे अपनी पसन्द के वकील से सलाह लेने तथा सफाई देने का अवसर (Opportunity to defend) दिया जाना चाहिये।
(iii) बन्दी को बन्दी बनाये जाने के 24 घण्टे के भीतर निकटतंम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिये।
(iv) यदि किसी बन्दी को 24 घण्टे से अधिक रोकना है तो मजिस्ट्रेट से आदेश लेना चाहिये।

 

उपरोक्त संरक्षणों के उल्लंधन के फलस्वरूप किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी असवैधानिक होगी, न्यायालय ऐसे किसी मामले में बन्दी व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दे सकता है। किन्तु उक्त आधारों पर किसी निवारक निरोध के अन्तर्गत बन्दी व्यक्ति को रिहा नहीं किया जा सकता।




2. निवारक निरोध कानून के अन्तर्गत संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Safeguards under Preventive Detention Law)

 

अनुच्छेद  24 की उपधारा 4, 5 और 8 ‘निवारक निरोध के अन्तर्गत निरूद्ध (Detained) व्यक्ति को निम्नलिखित संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है-

 

1. सलाहकार बोर्ड द्वारा पुनर्विलोकन (Review by Advisory Board)




किसी भी व्यक्ति को 2 माह से अधिक अवधि के लिए तब तक गिरफ्तार नहीं रखा जा सकता जब तक कि सलाहकार बोर्ड उक्त अवधि की समाप्ति से पहले ही यह रिपोर्ट न दे दे कि निरोध के पर्याप्त कारण विद्यमान हैं। सलाहकार बोर्ड का निर्माण हाई कोर्ट की सलाह से किया जायेगा । इसमें एक अध्यक्ष जो उच्च न्यायालय का कार्यरत न्यायाधीश तथा दो अन्य सदस्य जो उच्च न्यायालय के कार्यरत या रिटायर्ड न्यायाधीश होंगे। किन्तु यदि बोर्ड यह रिपोर्ट देता है कि निरोध का उचित कारण नेहीं है तो सरकार निरोध का आदेश रदद कर देगी।

2. गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार (Right to Know the Causes of Arrest)-

 

निरोध आदेश जारी करने वाले अफसर को गिरफ्तार व्यक्ति को शीघ्र ही गिरफ्तारी के कारणों की सूचना देनी चाहिये। ये कारण स्पष्ट और
बोधगम्य (Intelligible) होने चाहिये ऐसे अफसरों को यह भी बताना चाहिए कि बन्दी को सलाहाकार बोर्ड के सामने पैरवी (Represent) करने का भी अधिकार है । किन्तु यदि आदेश देने वाला अफसर उन तथ्यों को प्रकट करना जनहित के विरोधी समझता है तो वह उन तथ्यों को प्रकट नहीं करेंगा ।




3. पैरवी करने का अधिकार (Right to Represent)

 

मेनका गाँधी बनाम भारत संघ A.I.R. 1978. S.C. 597 में निर्णय हुआ कि. विरोध प्रकट करने के लिए प्रयुक्त प्रलेख और सामग्रियों विरोध के ‘आधार’ के आवश्यक भाग हैं अतः उन्हें निरोध का आधार साथ-साथ दिया जाना चाहिये। यदि प्रलेख और सामग्री बाद में दी जाती हैं तो निरूद्ध व्यक्ति अपनी पैरवी कारगर ढंग से नहीं कर सकता और इससे निरूद्ध (Detention) गैर-कानूनी हो जाता है । एम० एम० हासकार ब0 महाराष्ट्र राज्य A.I.R. 1978 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि सिद्धदोष व्यक्ति को अपील दायर करने का मूल अधिकार है और उसे निर्णय की प्रतिलिपि मुफ्त पाने और ‘निशुल्क कानूनी सहायता’ पाने का भी अधिकार है।

 

बाबूसिंह ब0 उ0 प्र0, A.I.R. 1978 में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि हत्या के मामले में अभियुक्त को बिना किसी युक्तियुक्त कारण के जमानत नामन्जूर करना उसे शारीरिक स्वतन्त्रता से वंचित करना है और वह असंवैधानिक है। अभियुक्त को जमानत देने से इन्कार तभी किया जाना चाहिये जब समाज के कल्याण के लिये ऐसा करना उचित हो।




हुसन आरा खातून बनाम बिहार राज्य A.I.R. 1979 में स्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि “शीघ्रतर परिक्षण” (Speedy trial) और मुफ्त कानूनी सहायता के अधिकार अनुo 21 द्वारा दी गई दैहिक स्वतन्त्रता के मूल अधिकार का एक आवश्यक तत्व है। कोई भी प्रक्रिया जो युक्तियुक्त शीघ्रतर परीक्षण को सुनिश्चित नहीं करती, उसे युक्तियुक्त या उचित नहीं कहा जा सकता। इसीलिये न्यायालय ने बिहार राज्य के विभिन्न जेलों में बन्द सिद्धदोष व्यक्तियों को जो कई वर्षों से परीक्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे, तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
वर्तमान विधि यह है कि विधि और प्रक्रिया दोनों को ही उचित और युक्तियुक्त होना चाहिये। कोई प्रक्रिया उचित है या नहीं इसके लिये यह भी आवश्यक है कि उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त निहित हों ऐसा न होने पर वह प्रक्रिया का अतिक्रमण करेगी और असंवैधानिक घोषित कर दी जायेगी।




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