धारा 2(d) परिवाद Complaint किसे कहते है || What is Section 2(d) Complaint Criminal Procedure Code 1973

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परिवाद Complaint किसे कहते है

परिवाद Complaint कोई भी व्यक्ति जिसे अपराध घटित होने की जानकारी है। वह परिवाद दायर कर सकता है। सीआर.पी.सी.के अनुसार परिवाद का सहज अर्थ, मजिस्ट्रेट द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामले में कार्यवाही कराने से होता है, जो कि पुलिस रिपोर्ट से भिन्न होती है।
 सामान्यतया अपराध के विरुद्ध पुलिस के पास एफ. आई. आर. दर्ज करवाई जाती है। लेकिन किसी राजनीतिक दबाव के कारण या किसी अन्य  कारणवश रिपोर्ट दर्ज ना हो, तो व्यक्ति अदालत में परिवाद( इस्तगासा) (Complaint) पेश करके अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही करवा सकता है।
परिवाद को लिखित एवं मौखिक दोनों प्रकार से दर्ज करवाया जा सकता है।  यह भी आवश्यक नहीं है, कि अपराध का नामजद परिवाद या इस्तगासा (Complaint) दायर हो। अज्ञात अपराधी के विरुद्ध भी परिवाद दर्ज करवाया जा सकता है।  मजिस्ट्रेट अपनी शक्तियों का प्रयोग सीआरपीसी की धारा 200 के तहत करते हुए परिवाद  पर कार्यवाही करता है। मजिस्ट्रेट अपनी कार्यवाही के पश्चात परिवाद को स्वीकार भी कर सकता है।  परिवाद का संक्षिप्त विचारण कोई भी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट अथवा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कर सकता है।




 यदि मजिस्टेट की जानकारी में आता है, कि परिवाद से संबंधित अपराध की जांच का विचारण का  कार्य पुलिस द्वारा अन्वेषित (Investigation) हो रहा है। तो वह पुलिस अधिकारी से उस मामले की रिपोर्ट मांगेगा।  वह स्वयं द्वारा की जा रही जांच में विचारण की कार्यवाही रोक देगा।
यदि मजिस्ट्रेट द्वारा परिवाद पर किसी अभियुक्त के विषय में जांच का विचारण हो रहा है, और उसी मामले में उसी अभियुक्त के विरुद्ध पुलिस रिपोर्ट में भी प्राप्त हो जाए, तो मजिस्ट्रेट द्वारा परिवाद अपराधी वाले मामले को और पुलिस रिपोर्ट से पैदा होने वाले मामलों की जांच या विचारण साथ साथ इस प्रकार किया जाएगा, मानो दोनों मामले पुलिस रिपोर्ट पर स्थापित किए गए हैं।

परिवाद (Complaint) पर संक्षिप्त विचारण की शक्ति

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुसार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट महानगर मजिस्ट्रेट व कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट यदि ठीक समझे तो निम्नलिखित सब अपराधों का या उनमें किसी का संक्षिप्त विचारण कर सकता है।
    • वे अपराध जो मृत्यु, आजीवन कारावास या 2 वर्ष से अधिक की अवधि कारावासीय दंड से दंडनीय हों।
    • 2- भारतीय दंड संहिता ( 1807 का 45)  की धारा 379,380 व 381 के अधीन चोरी का अपराध लेकिन चुराई हुई संपत्ति का मूल्य ₹2000 से अधिक नहीं है।
    •  दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम 2005 की धारा 23 का द्वारा ₹200 के स्थान पर ₹2000 ऊपर प्रतिस्थापित किया गया है।
    • 3- चोरी की संपत्ति प्राप्त करना ।। ।उसे अधिकार में रखे रखना।  लेकिन ऐसी संपत्ति का मूल्य ₹2000 से अधिक नहीं होना चाहिए।
    • 4- चुराई हुई संपत्ति को छिपाने या उसके बयान करने में सहायता देने का कार्य लेकिन जहां संपत्ति का मूल्य ₹2000 से अधिक ना हो
    • 5- भारतीय दंड संहिता की धारा 454 या 456 के अधीन किया गयाअपराध। ( नोट इसकी जानकारी आई.पी.सी.की धाराएं वाले अध्ययन में दी गई है)
    • 6- भारतीय दंड संहिता की धारा 504 और 506 के अधीन अपराध।
    • 7- पूर्ववर्ती अपराधों में से  किसी का दुष्प्रेरक।
    • 8- पूर्ववर्ती अपराधों में से किसी को करने का प्रत्यन,  जब ऐसा प्रत्यन अपराध हो।
    • 9- ऐसे कार्य से होने वाला कोई जुर्म या अपराध जिसकी बाबत पशु अतिचार  अधिनियम 1871 (1871का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद दायर किया जा सकता है।
    • 10- इस्तगासा पेश होने पर धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत् मजिस्ट्रेट  संगेय प्रकरण की प्राथमिकी दर्ज करवाने में जांच के आदेश दे सकते हैं।




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