लूट क्या होती है और लूट के आवश्यक तत्व का वर्णन करे

Spread the love

चोरी, लूट और डकैती क्या है ?

चोरी : किसी व्यक्ति के कब्जे से उसकी सहमति के बिना कोई चल सम्पत्ति, जैसे रुपया, घड़ी, सामान आदि, बेईमानी से लेना चोरी होता है. इसके लिए सामान्य दण्ड 3 वर्ष तक जेल या जुर्माना या दोनो सजा है. लेकिन ये चोरी अगर घर में हो तो जेल 7 वर्ष तक का हो सकता है.

लूट : जब चोरी करने के लिए या करने में या चुराई सम्पत्ति ले जाने या उसके कोशिश में कोई हिंसा की जाती है तो यह लूट हो जाता है. सामान्यतया यह 10 वर्ष तक के कठिन कारावास और जुर्माना से दण्डनीय है लेकिन यह लूट राजमार्ग पर हो तो जेल 14 वर्ष तक का हो सकेगा.

डकैती : वहीँ लूट करने वाले व्यक्तियों की संख्या यदि 5 या अधिक है तो यह डकैती कहलाएगी. इसके लिए सामान्य दण्ड आजीवन कारावास या 10 वर्ष का कठिन कारावास एवं जुर्माना है.



लूट क्या होती है और लूट के आवश्यक तत्व का वर्णन करे –

लूट को भारतीय दंड संहिता की धारा 390 में परिभाषित किया गया है। धारा 390 लूट- सब प्रकार की लूट में या तो चोरी या तो उद्यापन होता है।
चोरी कब लूट है- चोरी लूट है, यह उस चोरी को करने के लिए या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अभी प्राप्त संपत्ति को ले जाने वाले जाने का प्रयत्न करने में अपराधी उस उद्देश्य से स्वेच्छया किसी व्यक्ति की मृत्यु या हत्या उसका सदोष अवरोध या तत्काल मृत्यु का या तत्काल उपाधि का या तत्काल सदोष अवरोध का भय कार्यकर्ता या कार्य करने का प्रयत्न करता है।

उद्यापन लूट में कब बदलता है-

उद्यापन लूट है यदि अपराधी व उद्यापन करते समय वह में डाले गए। व्यक्ति की उपस्थिति में है ।और उस व्यक्ति को स्वयं उसका या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति  या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डाल कर वह उद्यापन करता है। और इस प्रकार भय में डालकर इस प्रकार वह में डाले गए व्यक्ति को उद्यापन की जाने वाली चीज उसी समय और वहां ही परिदत्त करने के लिए प्रेरित करता है।

लूट को भारतीय दंड संहिता की धारा 390 में परिभाषित किया गया है।

 उद्यापन लूट में कब बदलता है-  उद्यापन लूट है यदि अपराधी व उद्यापन करते समय वह में डाले गए व्यक्ति की उपस्थिति में है। और उस व्यक्ति को स्वयं उसका या किसी अन्य व्यक्ति की तत्काल मृत्यु या तत्काल उपहति या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डाल कर वह उद्यापन करता है। और इस प्रकार भय में डालकर इस प्रकार वह  भय में डाले गए, व्यक्ति को उद्यापन की जाने वाली चीज उसी समय और वहां ही परिदत्त करने के लिए प्रेरित करता है।




स्पष्टीकरण- अपराधी का उपस्थिति होना कहा जाता है। यदि वह उस अन्य व्यक्ति को तत्काल मृत्यु के तत्काल उपहति के या तत्काल सदोष अवरोध के भय में डालने के लिए पर्याप्त रूप से निकट हो।

 लूट को निम्न दृष्टांत से समझा जा सकता है

(I)  क, य को दबोच लेता है, और य के कपड़े में से य का धन और आभूषण  य कि संम्मति  के बिना  कपट पूर्वक निकाल लेता है। यहां क ने चोरी की है ।और वह चोरी करने के लिए स्वेच्छया य का प्रदोष अवरोध कारित करता है। इसीलिए क ने लूट की है।
(ii)  क, य को राजमार्ग पर मिलता है। एक पिस्तौल दिखलाता है। और य की थैली मांगता है। परिणाम स्वरूप य अपनी थैली दे देता है। यहां क ने य को तत्काल उपहति का भय दिखला कर  थैली विद्यापीठ की है। और उद्यापन करते समय वह उसकी उपस्थिति में है, अतः क ने लूट की है।
(iii)  क राजमार्ग पर य और य के शिशु से मिलता है। क उस शिशु को पकड़ लेता है, और यह धमकी देता है। कि यदि य उसको अपनी थैली परिदत्त नहीं कर देता तो वह उस शिशु को करार से नीचे फेंक देगा। परिणाम स्वरूप य अपनी थैली परिदत्त कर देता है। यहां क ने य को यह कारित करके कि वह उस शिशु को जो वहां उपस्थित है। तत्काल उपाधि करेगा। य से उसकी थैली उद्यापित की है। इसीलिए क  ने य को लूटा है।
(iv)  क, य से यह कहकर संपत्ति अभिप्राप्त करता है, कि तुम्हारा शिशु मेरी टोली के हाथों में है, यदि तुम हमारे पास ₹10000 नहीं भेज दोगे तो वह मार डाला जाएगा। यह उद्यापन है ,और इसी रूप में दंडनीय है, किंतु यह लूट नहीं है, जब तक कि य को उसके शिशु की तत्काल मृत्यु के भय में ना डाला जाए।

 लूट की व्याख्या-

लूट का अपराध चोरी अथवा उद्यापन अपराध का एक विशेष और उत्तेजक स्वरूप है। चोरी और लूट तथा उद्यापन और लूट के बीच विभेद का मुख्य तत्व हिंसा के भय के आसन्न उपस्थित है। इस धारा का द्वितीय पैराग्राफ चोरी और लूट तथा तृतीय पैराग्राफ उद्यापन और लूट के बीच अंतर स्थापित करता है।
 चोरी उद्यापन और लूट के बीच के संबंधों की चर्चा करते हुए भारतीय दंड संहिता के प्रारूपकारो  ने अभिमत व्यक्त किया था, कि लूट का ऐसा कोई भी मामला नहीं मिल सकता, जो चोरी अथवा उद्यापन की परिभाषा में ना आता हो परंतु व्यवहारिकता कभी-कभी या संदेह उत्पन्न कर जाता है। कि क्या लूट का कोई मामला चोरी है। अथवा उद्यापन लूट का एक बहुत बड़ा भाग अंशतः उद्यापन होता है।
उदाहरण के लिए अ नामक व्यक्ति जेड को पकड़ लेता है। उसे धमकी देता है कि यदि उसने उसकी समस्त संपत्ति का परिदत्त उसे नहीं किया, तो वह उसे मार डालेगा। इस कथन के साथ ही वह जेड के पहने हुए आभूषणों को छीनना प्रारंभ कर देता है। जेड प्रार्थना करता है कि वे उसके समस्त धन को ले ले। परंतु उसके प्राण बख्श दे। और स्वयं अपने आभूषणों को उसे परिदत्त करता है। इस मामले में भी आभूषण जिसे अ ने स्वयं ले लिया है। चोरी द्वारा लिए गए और वे आभूषण जिसे जेड ने मृत्यु भय से परिदत्त कर दिया है।




उद्यापन द्वारा लिए गए यहां किसी भी प्रकार असंभव भी नहीं है। कि अ ने जेड के दाहिने हाथ का कंगन चोरी करके ले लिया हो, और बाएं हाथ का कंगन उद्यापन के माध्यम से अभिप्राप्त किया हो, इस प्रकार यह भी संभव हो सकता है। कि उसने जेड के परिवेष्ठन में से चोरी के माध्यम से धन प्राप्त किया हो। और पगड़ी में से उद्यापन के माध्यम से।
प्रायः 10 में से 9 ऐसे ही मामले होते हैं, और घटनाक्रम  के कुछ ही क्षणों के उपरांत ना तो लूट ग्रस्त व्यक्ति को ही या स्मरण रहता है, कि उसके शरीर के किस भाग से चोरी करके धन लिया गया है। और किस भाग से उद्यापन के माध्यम से इसी प्रकार लूटकर्ता को भी यह स्मरण नहीं रहता ।न्यायधीश चयन के लिए भी यह आवश्यक नहीं है, कि सब को सुनिश्चित किया जाए।

 धारा 390 का स्पष्टीकरण और दृष्टांत

(iii)  तथा ( ii)  साधारण उद्यापन और लूट की कोटि में आने वाले उद्यापन के बीच का अंतर स्थापित करते हैं,।  दृष्टांत (ii)  यह प्रस्तुत करता है, कि चोरी कब लूट होती है।।।।।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *