परिवीक्षा से आप क्या समझते हैं | What do you understand by ‘Probation’

परिवीक्षा से आप क्या समझते हैं | What do you understand by 'Probation'
परिवीक्षा से आप क्या समझते हैं | What do you understand by 'Probation'
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परिवीक्षा से आप क्या समझते हैं | What do you understand by ‘Probation’

 


परिवीक्षा क्या है?(What is Probation) – परिवीक्षा विधि की कोई नई अवधारणा (Concept) नहीं है। प्राचीनकाल से ही किसी न किसी रूप में इसका प्रचलन रहा है। इंग्लैण्ड में नवीं शताब्दी में दया के पात्र या प्रथम बार अपराध करने वाले व्यक्तियों को सजा न दी जाकर सदाचरण के आश्वासन पर मुक्ति प्रदान किये जाने का प्रचलन था। वहाँ चर्च के सदस्य पादरियों एवं सन्यासियों को परिवीक्षां जैसा लाभ देने का अधिकार था । इसे “पादरी का लाभ कहा जाता था।

 

आधुनिक युग में इसका श्रेय जॉन आगस्टस को दिया जाता है जो 19 वीं शताब्दी के सुधारवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक माने जाते हैं। जॉन मूलतः अमेरिका के निवासी थे । वे सन् 1841 में वोस्टन की एक अदालत से एक आदतन शराबी अभियुक्त को इस शर्त पर छुड़ा लाये थे कि वह भविष्य में कभी शराब नहीं पियेगा । इसके बाद उन्होंने करीब 2000 ऐसे अपराधियों को शर्तों पर छुड़वाया और धीरे-धीरे यह प्रचलन में आ गया।

 

भारत में सर्वप्रथम दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 की धारा 562 में इसका प्रयोग किया गया तथा बाद में अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 पारित किया गया । परिवीक्षा की परिभांषा (Definition of Probation) –

शब्द “परीवीक्षा” अग्रंजी के शब्दं “Probation” का हिन्दी रूपान्तर है । इसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द “Probate” हुई है जिसका अर्थ है “परीक्षण करना”। वस्तुत: परिवीक्षा के अन्तर्गत अपराधी के प्रति सहानुभूति क्त करते हुए उसे सुधरने का अवसर प्रदान किया जाता है।

दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता कि परिवीक्षा के अन्तर्गत अपराधी की सजा को उसके सदाचरण के आश्वासन पर स्थगित किया जाता  है। यदि अपराधी परिवीक्षा काल में अपराध की पुनरावृत्ति करता है तो वह पुनः दण्ड का
भागी बन जाता है।

 

सदरलैण्ड के अनुसार, परिवीक्षा दोषी घोषित किये गये अपराधी के दण्ड के निरीक्षण काल की वह अवस्था है जिसमें उसे सदाचरण की शर्तों पर स्वतंत्रता दी जाती है,जिसमें राज्य व्यक्तिगत निरीक्षण द्वारा सदाचरण बनाये रखने में उसे सहायता देने का प्रयास करता है।”
इलियट के अनुसार, “अपराधी को उसके सदाचरण के आश्वासन के आधार पर न्यायालय द्वारा दण्ड से मुक्ति प्रदान किया जाना ही परिवीक्षा है।”

परिवीक्षा के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Probation) – परिवीक्षा के निम्नलिखित तीन आवश्यक “तत्व” हैं-

 

1. परिवीक्षा में अपराधी को दण्ड नहीं दिया जाता है,
2. यदि दण्ड दिया भी जाता है तो उसे एक अवधि-विशेष के लिए स्थगित रखा जाता है, तथा
3. यदि इस दौरान अपराधी अपराध की पुनरावृत्ति करता है है तो उसे दण्डित किया जा सकता है।

 

परिवीक्षा का स्वरूप (Form of Probation )

1. यह दण्ड का एक सुधारात्मक रूप है;
2. यह दण्ड से बचने का एक उत्तम उपाय है;
3. यह अपराधी के प्रति उदारता एवं सहानुभूति की अभिव्यक्ति है;
4. यह अपराधी के आचरण पर निगरानी रखने का एक सर्वोत्तम साधन है; तथा
5. यह अपराधी में अपराध के प्रति प्रायश्चित का भाव उत्पन्न करने का श्रेष्ठ उपाय है ।

 

वे अपराध जिनमें परिवीक्षा का लाभ दिया जा सकता है (The Offences for which the Bencfit of Probation can be Granted) –

 

अपराधी परिवीक्षा अधिनियम की धारा के अनुसार, निम्नलिखित अपराधों में अपराधी को परिवीक्षा का लाभ दिया जा सकता है-


1. जहाँ अपराध सात वर्ष से अधिक के कारावास से दण्डनीय नहीं था, अभियुक्त के विरुद्ध पूंर्व दोषसिद्धि नहीं थी और अभियुक्त का पूर्व आचरण अच्छा रहा था । (धारा 360 Cr RC.)
2. जहाँ परिवादी के विरुद्ध अवैध मदिरा बनाने का मामला था और अभियुक्त घटनास्थल पर अतिक्रमण के विरुद्ध अपने बचाव हेतु गया था।
3. जहाँ अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के भाग 2 के अधीन दोषसिद्ध किया गया था।
4. जहाँ अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 325 के अन्तर्गत दोषिसिद्धि किया गया था।
5. जहाँ अभियुक्त 18 वर्ष से कम आयु का था और उसे स्वापक द्रव्य एवं मनः प्रभावी पदार्थ अधिनियम के अन्तर्गत दोषिसिद्ध किया गया था ।
6. अपराध जिसमें न्यूनतम सजा का प्रावधान हो।
7. जहाँ अभियुक्त को खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के अधीन दोषसिद्ध किया गया
8. जहाँ अभियुक्त की आयुं 55 वर्ष की थी और विचारण लम्बे समय तक चला था।
9. जहाँ अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 क के अधीन दोषसिद्ध किया गया था लेकिन वह अत्यन्त निर्धन था और लम्बे समय से विचारणाधीन रहा था आदि।

 

वे अपराध जिनमें परिवीक्षा का लाभ नहीं दिया जा सकता है (The offcnce in which the Benefit of Probation cannot be Granted) –

धारा 4 और धारा 6 के अन्तर्गत निम्नलिखित अवस्थाओं में अपराधी को परिविक्षा का लाभ नहीं दिया जा सकता-


1. जहाँ अपराधी मृत्युदण्ड से या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करता है।
2. अभियुक्त को पहले परिवीक्षा का लाभ दिया जा चुका था परन्तु उसके द्वारा पुनः अपराध की पुनरावृत्ति की गई ।
3. अभियुक्त को आपराधिक न्यास-भंग के मा्मले में दोषसिद्ध किया गया था .
4. अभियुक्त पर सोने की तस्करी करने का आरोप था ।
5. अभियुक्त को स्त्री की लज्जा भंग करनें तथा अबोध बालिका के साथ बलात्कार का प्रयत्न करने के आरोप में दोषसिद्धि किया गया था ।
6. जहाँ अभियुक्त पर गंभीर डकैती का आरोप था।
7. जहाँ अभियुक्त कुख्यात अपराधी हो या रहा हो ।

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परिवीक्षा का लाभ देने के लिए आवश्यक शर्ते (Essential Conditions for Granting the Benefit of Probation)

 

धारा 4 के अन्तर्गत न्यायालय, अपराधी को सदाचार पर परिवीक्षा करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगा-

1. अपराधी की उम्र 21 वर्ष से कम न हो,
2. मामले की परिस्थिति,
3. अपराध की प्रकृति,
4. अभियुक्त का चरित्र,
5. अभियुक्त की पूर्व दोषिसिद्धि,
3, परिवीक्षा अधिकारी की अनुंशसित रिपोर्ट ।

 

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 360 (S. 360of Code of Criminal Procedure, 1973) – दं० प्र० सं० की धारा 10 के अन्तर्गत अपराधी को सदाचरण की परिवीक्षा पर या भर्त्सना के पश्चात् छोड़ देने का मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश पारित किये जाने के सम्बन्ध में विस्तृत प्रावधान किये गये हैं।

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परिवीक्षा के बाद पर्यवेक्षण (Supervision after Probation) – जब किसी अपराधी को सदाचरण की परिवीक्षा पर छोड़ने का आदेश दिया जाता है तब न्यायालय ऐसे अपराधी को किसी परिवीक्षा अधिकारी के पर्यवेक्षण में रखे जाने का भी आदेश दे सकता है। ऐसे आदेश में


1. पर्यवेक्षण की शर्तों, तथा
2. पर्यवेक्षण की अवधि; का भी उल्लेख किया जायेगा, लेकिन ऐसी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी। इसका मुख्य उद्देश्य अपराधी, अपराधी व्यक्तियों की गतिविधियों एवं कार्य-कलापों पर देख रेख रखना तथा यह सुनिश्चित करना है की वह पुनः अपराध की और तो नहीं बढ़ रहा है। 

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