उपभोक्तावाद का उदय और विकास एवं वर्तमान स्थिति क्या है | The Rise and Development of Consumerism

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(उपभोक्तावाद का उदय और विकास) उपभोक्तावाद कोई नई धारा या वाद नहीं है। जो अभी उपभोक्ता जागरण के रूप में सामने आ रहा है। उपभोक्ता की संकल्पना उतनी ही पुरानी है। जितनी  मनुस्मृति। पहली बार जब मनुष्य के मन में परस्पर  संलाप की उत्कट इच्छा पैदा हुई होगी या पहली बार जब उसने किसी वस्तु या आदान-प्रदान किया होगा उसी दिन से उपभोक्ता व उक्त सृजित हो गया होगा।
दो इकाइयों या व्यक्तियों का एक अनिवार्य संबंध यदि कहीं हो सकता है तो वह रहा होगा, देने वाले व  लेनेवाले का संबंध जो प्रकारान्तर से विकसित होकर उपभोक्ता व व्यापारी हो गया और यही तो आज का उपभोक्ता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में व्यापार तथा उद्योग में किए जाने वाले शोषण, कम तोलने व मापने मिलावट आदि के खिलाफ उपभोक्ताओं को संरक्षण तथा उन अपराधों को दर्ज करने की बात कही है।यूरोपीय संस्कृत में ईक से सेव खाने से शुरू हुआ।

मनी लॉन्ड्रिंग क्या है और यह कैसे किया जाता है | What is Money Laundering and How is Money Laundering Done

सेव का उपभोक्ता होना। आज जिसे हम बैंकिग सेवाएं के रूप में जानते हैं उसके बीज भी पंडितों के पास विश्वास के आधार पर पैसे रखने व जौहरियों के पास गहने रखने की परंपरा में है। प्रारंभ में पंडितों के पास जनसाधारण ने अपनी जमा पूंजी विश्वास करके रखने प्रारंभ किए। फिर पंडितों ने उस पूंजी का कार्य व्यापार में उपयोग करना शुरू किया ।और एक स्थित आई जब व्यक्ति सजग हुआ, यह जान गया कि उसकी धरोहर की तरह के रखी गई धनराशि तो पंडितों को लाभ पहुंचा रही है। और तभी से व्याज लेने वा देने की परिपाटी का प्रारंभ हुआ। जौहरी के पास गहने रखने की प्रथा ने आज बैंकों की लॉकर पद्धति का स्वरूप ले लिया है। गहने रखकर ऋण देने की प्रजा प्रथा भी उसी परंपरा का परिणाम है। (उपभोक्तावाद का उदय और विकास)
स्वतंत्रता से पूर्व जिन कानूनों के तहत उपभोक्ता के हितों पर विचार किया जाता था। वह इतने भारतीय दंड संहिता कृषि उपज अधिनियम 1937 औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940। यह माना जाता है कि औसत भारतीय उपभोक्ता में सहनशीलता बहुत अधिक है। वह भाग्यवादी अधिक है। फिर भी आज तो परिवर्तन देखने को मिल रहा है। वह उत्पादों पर लगे लेबलों में परिवर्तित से जा सकता है, कि जहां पहले उत्पादों पर लिखा मिलता था एक बार बेंजी गई वस्तु भी किसी भी परिस्थिति में वापस नहीं ली जाएगी।  अब वही पर सारे के सारे शब्द परिवर्तित हो गए हैं।

संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार है || Right to Protect Private Property

यदि आप हमारे उत्पाद से संतुष्ट नहीं है तो 1 महीने के भीतर बदल सकते हैं। या हमारी पैकिंग में कोई दोष दिखते हैं। हमें सूचित करें वह पैकेट बदल कर ले जाए इस बात का स्पष्ट संकेत है। कि जहां उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति सजग हुआ है, वहीं व्यवसाई भी स्पर्धा के युग में पर्याप्त सतर्क हुआ है। उसे अपने उत्पाद को बेचने के लिए कई -कई पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। किसी भी वस्तु का उत्पादन इतना कठिन नहीं है, जितना उसे बेचना।  मार्किटिंग अपने आप में एक कला के रूप में उभर कर आ रहे हैं। वह एक व्यवसाय बनता जा रहा है। जिसके लिए प्रशिक्षण तक दिए जाने लगे हैं। (उपभोक्तावाद का उदय और विकास)
बढ़ती स्पर्धा के ही कारण उत्पाद व सेवाओं में गुणवत्ता का स्तर बनाए रखना। समय की मांग हो गई है, बिना “स्टैंडर्ड मार्क“ के छोटा सा छोटा भोक्ता भी चीज खरीदते समय नाक भौं सिकोड़ना दिखाई दे रहा है। होम डिलीवरी उपभोक्ता को मिलने वाली फ्री सेवा हो गई है। महात्मा गांधी ने पता नहीं उपभोक्ता के बारे में अपना कथन किस बात को दृष्टि में रखकर किया था। पर लगता है यह जो आज की परिस्थिति है, उस पर वह कथन पूरी तरह खरा उतरता है। और हम शत-प्रतिशत सहमत हैं। कि-
उपभोक्ता या ग्राहक हमारे पास आने वाला सबसे महत्वपूर्ण आगंतुक है। वह हमारे ऊपर निर्भर नहीं है। हम उस पर निर्भर हैं। वह हमारे व्यवसाय से बाहरी व्यक्ति नहीं है। बल्कि हमारे व्यवसाय का हिस्सा है। हम उसकी सेवा करके उन पर एहसान नहीं कर रहे हैं। बल्कि वह हमें सेवा का अवसर देकर हम पर एहसान कर रहा है। “
भारत में उपभोक्ता आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय तत्कालीन मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री श्री चक्रवर्ती  गोपालाचारी को कहा जाता है। जिन्होंने 1949 में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए उपभोक्ता संरक्षण परिषद की स्थापना की। जो मुंबई की ग्रहणियो द्वारा उपभोक्ताओं के कल्याण हेतु हुई।  पहली बार मुंबई शहर की ग्रहण होने वस्तु की गुणता के विरोध में अपना स्वर उठाया। इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उपभोक्ताओं के पक्ष में कई सुर उठने लगे थे। 1960 में

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति “जॉन एफ कैनेडी“ ने उपभोक्ता संरक्षण के महत्व को स्वीकार किया। व उसके चार अधिकारियों को वैधानिक मान्यता दी-

1- सुरक्षा का अधिकार
2- सूचना पाने का अधिकार
3- चयन का अधिकार
4- सुनवाई का अधिकार
 उपभोक्ता आंदोलन को “जॉन एफ कैनेडी“ द्वारा ही 15 मार्च 1962 को संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाने की। ऐतिहासिक घोषणा से प्रोत्साहन व नैतिक समर्थन लिया। संयुक्त राष्ट्र  महासभा ने 1985 में उपभोक्ता संरक्षण के लिए दिशानिर्देश बना डाले। व उद्देश्य भी इंगित कर दिए।
क- उपभोक्ताओं को संरक्षण का अनुदान देने के लिए देशों की सहायता करना
ख- उपभोक्ताओं की आवश्यकता व इच्छाओं के अनुरूप उत्पादन व वितरण पद्धत को और सुविधाजनक बनाना।
ग- वस्तुओं व सेवाओं के वितरण में लगे व्यक्तियों के उच्च नैतिक आचरण बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना।
घ- राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी उद्योगों द्वारा अपनी अपनाई जाने वाली अनुचित व्यापारिक प्रथाओं को रोकने में दिशा की सहायता करना।
ड. – स्वतंत्र उपभोक्ता समूहों के विकास में सहायता।
च- उपभोक्ता संरक्षण क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग में बढ़ावा देना।
छ- ऐसी बाजार स्थितियों को विकसित करना जिसमें उपभोक्ता कम मूल्य पर बेहतर सेवाएं खरीद सके।

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संयुक्त राष्ट्र की मान्यता व विकसित देशों के प्रोत्साहन से भारत में भी उपभोक्ता के पक्ष में एक दबाव बनने लगा। मुंबई की ग्रहणियो की पहल के बाद श्री मनु भाई शाह ने 1979 में उपभोक्ता हितों के संरक्षण व संवर्धन देने के लिए उपभोक्ता शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित किया। जो आज अपनी गतिविधियों के कारण एक विशिष्ट पहचान बन चुका है। (उपभोक्तावाद का उदय और विकास)
उपभोक्ता के कल्याण को दृष्टि में रखते हुए इस बीच उपभोक्ता संबंधित कई कानून भी बन चुके थे। जिनके द्वारा उपभोक्ता को शोषित होने से बचाने के उपाय किए जा रहे थे।  पुराने अधिनियम में वस्तुओं की बिक्री संबंधी अधिनियम 1930, बीज की गुणवत्ता सम्बन्धी      1935 का अधिनियम भारतीय दंड संहिता अधिनियम 1860 भारतीय सिविल प्रक्रिया संहिता 1960,भारतीय संविदा अधिनियम 1972,तो विद्यमान थे ही। जो मूल रूप से वाणिज्य से अधिक जुड़े थे उपभोक्ता को राहत देने के लिए एम आर टी पी कमिशन 1969संयुक्त राष्ट्र की मान्यता व विकसित देशों के प्रोत्साहन से भारत में भी उपभोक्ता के पक्ष में एक दबाव लगने लगा।क्ता  अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जो आज अपनी गतिविधियों के कारण एक विशिष्ट पहचान बन चुका है।

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उपभोक्ता के कल्याण को दृष्टि में रखते हुए इस बीच उपभोक्ता संबंधित कई कानून भी बन चुके थे जिनके द्वारा उपभोक्ता को शोषित होने से बचाने के उपाय किए जा रहे थे।  पुराने अधिनियम में वस्तुओं की बिक्री संबंधी अधिनियम 1930 बीज की गुणवत्ता नापतोल मानक संबंधी अधिनियम 1976 आदि कुछ विशेष नहीं कर पा रहे थे वास्तव में दंड देने वाले संबंधी कानून के द्वारा उपभोक्ता की कठिनाई का कोई सीधा समाधान नहीं निकल पा रहा था ऐसी स्थित में एक ऐसे कल्याणकारी कानून की आवश्यकता थी जो उपभोक्ता को हुए कष्ट तथा हानि की भरपाई कर पाता यही कारण है कि पर्याप्त सर्वेक्षण व राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय दबाव के परिणाम स्वरूप 24 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम भारतीय पार्लियामेंट द्वारा पारित हो गया जिसकी उपभोक्ता संबंधित सभी संस्थाओं ने स्वागत किया यह अधिनियम एक सबसे अधिक प्रगतिशील व्यापक तथा अनूठा अधिनियम है भारत में 1997 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण सम्मेलन में यह कहा गया है। वह माना गया था कि भारतीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक ऐसा कानून है। जिसने उपभोक्ताओं के अधिकारों के क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। जिसका दुनिया में कोई सानी नहीं है।
 यह सत्य है कि इस अधिनियम को द्रुतगति से लागू किए जाने के लिए दिल्ली की कॉमन कॉज एसोसिएट को उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर करनी पड़ी। पर उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद आज देश भर में लगभग 700 उपभोक्ता अदालतें काम कर रही है। किसी ने नहीं सोचा था कि यह फोरम कितने प्रभावी सिद्ध होंगे। देखते ही देखते इन फोरमो  का कार्य क्षेत्र इतना विस्तृत होता गया कि बड़े बड़े वाणिज्यिक समूह सकते में आ गए नेशनल कमीशन व सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय व समाज की सारी तस्वीरें बदल दी। वह तुरंततुरंत- फुरत उन निर्णयों के कारण 1991 में 1993 में तथा अब 2002 में अधिनियम में व्यापक संशोधन हुए।

उपभोक्ता अदालत की न्यायिक प्रक्रिया | उपभोक्ता अदालत में शिकायत कैसे करे | How to Complaint in Consumer Court

पहले दूसरे संशोधनों में ही चिकित्सा व्यवसाय जमा राशि लेने वाले वित्तीय संस्थान तथा वाणिज्यिक समूह, भवन निर्माण कंपनियां, सरकारी अथवा गैर सरकारी सभी बीमा कंपनियाँ, टेलीफोन निगम, बिजली वितरण, संस्थान सभी सेवा प्रदान करने के लिए उपभोक्ता अदालतों की परिधि में आ गई। रेलवे एयरलाइंस, होटल एवं रेस्टोरेंट माल वाहन कंपनियां कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं छूटा, जिस तक उपभोक्ता अदालतों की पहुंचा ना हो। शिक्षण संस्थान भी अब इस अधिनियम से मुक्त नहीं रहे क्या सकते हैं। कि पालने से लेकर चिता तक की यात्रा के लिए व्यक्ति जब अपनी कठिनाइयों के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत उपभोक्ता अदालतों के द्वारा खटखटा सकता है।।

उपभोक्तावाद का उदय और विकास एवं वर्तमान स्थिति क्या है | The Rise and Development of Consumerism

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