क्या भारत में अंग्रेजी शासन के आरंभिक काल में न्याय प्रशासन कार्यपालिका के दबाव में अधिक था | Initial Period of the English Rule India

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क्या भारत में अंग्रेजी शासन के आरंभिक काल में न्याय प्रशासन कार्यपालिका के दबाव में अधिक था | Whether in The Initial Period of the English Rule in India, The Justice Administration Was More in the Pressure of Executive.

The Initial Period of the English Rule in India:- सन् 1600 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में स्थापना हुई, तो उसका उद्देश्य मात्र कुछ विधायी एवं न्यायिक शक्तियों द्वारा कंपनी का आंतरिक प्रशासन चलाना था। चार्टर 1600 के द्वारा कंपनी को न्यायिक शक्ति इसीलिए भी प्रदान की गई थी। जिससे वे अपने आंतरिक मामलों में निर्णय दे सकें। 
31 मई 1609 को इंग्लैंड के सम्राट जेम्स प्रथम ने एक नया चार्टर जारी किया। जिसके फलस्वरूप कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार शाश्वत बना दिया गया। परंतु कंपनी के व्यापारी एकाधिकार को राज्य के हित में प्रतिभूति होने पर 3 वर्ष का नोटिस देकर समाप्त किया जा सकता था। कंपनी को इस भूमि पर न्यायिक शक्ति प्रथम बार सन् 1661 के चार्टर द्वारा प्रदान की गई। (Initial Period of the English Rule India)

इस चार्टर द्वारा कंपनी अपनी फैक्ट्रियों के लिए गवर्नर एवं काैंसिल के सदस्यों को नियुक्त कर सकती थी।

हर इंग्लिश फैक्ट्री के गवर्नर एवं परिषद को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले प्रत्येक सदस्य के विरुद्ध निर्णय देने का अधिकार था। यह निर्णय अंग्रेजी विधि के अनुसार होना सुनिश्चित किया गया। सन् 1668 के चार्टर द्वारा कंपनी को मुंबई द्वीप के निवासियों पर न्यायिक शक्ति प्रदान की गई। सन् 1683 के चार्टर द्वारा कंपनी को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वह सामुद्रिक न्यायालय की स्थापना कर सकें।
अतः इस चार्टर के अंतर्गत न्याय प्रशासन का दृढ़ आधार प्रदान करने के लिए कोर्ट आफ जुडीकेचर की स्थापना की गई।



इस न्यायालय में एक विधि का ज्ञाता तथा दो अन्य व्यक्ति सहायक के रूप में बैठते थे। इस प्रकार स्पष्ट है, कि अब तक प्रचलित न्यायिक प्रणाली पूर्ण रूप से कार्यकारिणी के नियंत्रण में थी। कार्यकारिणी को न्याय प्रशासन का कार्य सौंप कर न्यायिक स्वतंत्रता पर भीषण कुठाराघात किया गया।

मुंबई में स्थापित सामुद्रिक न्यायालय में डॉक्टर सेंट जॉन की नियुक्ति न्यायाधीश के पद पर की गई। (The Initial Period of the English Rule in India)

डॉ जान दीवानी विधि के विद्वान थे। परंतु जल्द ही क्षेत्राधिकारी संबंधी विवाद के कारण गवर्नर ने इनमें केवल सामुद्रिक क्षेत्राधिकार निहित कर दिया। तथा दीवानी न्यायालय के लिए अलग से न्यायाधीश नियुक्त कर किया गया। कोर्ट आफ जुडीकेचर में गवर्नर एवं काैंसिल न्यायाधीश की हैसियत से बैठते थे। तथा सभी अधीनस्थ न्यायालयों से आए हुए दीवानी मामलों पर निर्णय देते थे।
क्योंकि अपराधिक मुकदमो पर मेयर कोर्ट्स का कोई अधिकार नहीं था।
अतः गवर्नर एवं परिषद के क्षेत्राधिकार में लेकर समूची न्याय व्यवस्था कार्यकारिणी के हाथों सौंप दी गई। 

सर्वप्रथम मद्रास शहर की न्याय व्यवस्था एक अभिकर्ता एवं परिषद को सौंपी गई।

प्रारंभ में एजेंट एवं काैंसिल के सामने दीवानी के छोटे-छोटे मुकदमें आते थे। जिनके निर्णय में कठिनाई नहीं होती थी। इसके साथ ही साथ मद्रास में चौल्ट्री कोर्ट स्वतंत्र रूप से कार्य करती थी। यह न्यायालय वास्तव में स्वतंत्र रहकर गरीबों को निष्पक्ष रूप से न्याय प्रदान करती थी। मद्रास के न्याय प्रशासन में क्रांतिकारी मोड़ उस समय आया। जबकि सन् 1668 में सामुद्रिक न्यायालय की स्थापना हुई। इस समय तक कंपनी को व्यापारिक एकाधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त हो चुका था। फिर भी कुछ अंग्रेज व्यापारी अनाधिकृत रूप से निजी व्यापार किया करते थे। जो कंपनी के लिए अहितकर मद्रास में सामुद्रिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में सर जॉन्स ब्रिग्स नियुक्त हुए।




यह न्यायालय पूर्ण रूप से कार्यकारिणी से अलग तथा स्वतंत्र होकर न्याय प्रशासित करता था। (The Initial Period of the English Rule in India)

इसके साथ-साथ सन 1687 में जारी किए गए चार्टर के अंतर्गत मेयर कोर्ट की स्थापना हुई। मेयर कोर्ट की स्थापना तथा कार्यप्रणाली से कंपनी शासक के रूप में अपना प्रभुत्व बनाए रखने में सफल हुई। अतः न्यायपालिका पुनः व्यवस्थापिका के अधीन आ गई। फिर भी हम इतना कह सकते हैं, कि मद्रास में न्यायालयों को थोड़ी बहुत न्यायिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। 
मुंबई स्थित सामुद्रिक न्यायालय का कार्य अपवाद से घिरा रहा क्योंकि न्यायालय पर गवर्नर का नियंत्रण था। वह न्यायालय को अपने आधीन रखना चाहता था। इसीलिए उसने सामुद्रिक न्यायालय से दीवानी न्याय प्रशासन के क्षेत्राधिकार को ले लिया। मुंबई स्थित न्यायालयों को न्यायिक स्वतंत्रता नहीं थी। 

कोलकाता की न्याय प्रणाली के बारे में अधिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

कोलकाता में न्याय प्रशासन जमीदारों के हाथ में था ।अपील सिद्धांत के तौर पर राज्यपाल परिषद के पास होती थी। किंतु व्यवहार में अपील लगभग नहीं होती थी। आपराधिक न्याय प्रशासन गवर्नर काैंसिल के हाथ में थी। इस प्रकार कोलकाता में न्याय प्रशासन कार्यकारिणी के हाथ में था। 




 उल्लेखनीय है, कि सन् 1726 ई० के चार्टर द्वारा स्थापित मेंयर कोर्ट ही ऐसी कोर्ट थी, जिसे न्यायिक स्वतंत्रता प्रदत्त थी।  इसका कारण यह था, इस न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यकारिणी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं था। मेयर कोर्ट में मेयर तथा दो वरिष्ठ एल्डरमैन बैठते थे। मेयर कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील गवर्नर काैंसिल के पास 14 दिन के अंदर हो सकती थी। यदि किसी वाद का मूल्य 1000 पैगोडा से अधिक होता था, तो इसकी अपील सम्राट परिषद के पास हो सकती थी। जहां तक अपराधिक न्याय प्रशासन का प्रश्न है, यह कार्यकारिणी के अधिकार क्षेत्र में था। आंशिक न्यायिक स्वतंत्रता के कारण मेयर कोर्ट के न्यायाधीश अपने आप को पूर्ण स्वतंत्र समझने लगे थे। परंतु वास्तविकता ऐसा नहीं थी। 

 सन् 1753 के चार्टर द्वारा मेयर कोर्ट का पुनर्गठन किया गया था।

मेयर की नियुक्ति तथा पद मुक्ति गवर्नर काैंसिल के अधिकार क्षेत्र की बात थी। मेयर गवर्नर द्वारा प्रस्तावित 2 नामों से चुना जाता था। चार्टर 1753 के इस प्रावधान के अंतर्गत मेयर पूर्ण रूप से गवर्नर कौंसिल के नियंत्रण में आ गया। इसका परिणाम यह निकला की मेयर कोर्ट ने अपनी स्वतंत्रता खो दी। अब मेयर कोर्ट पूर्ण रूप से गवर्नर काैंसिल के हाथ में थी। 

 अतः निः संदेह कंपनी की न्याय व्यवस्था कार्यकारिणी के हाथों में थी।

इसमें कोई संदेह नहीं है, आपराधिक न्याय शासन पर कार्यकारिणी को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। दीवानी ने प्रशासन के क्षेत्र में चाउल्ट्री  कोर्ट तथा प्रार्थना न्यायालय को न्यायिक स्वतंत्रता प्रदान की। लेकिन यह स्वतंत्रता केवल छोटे-छोटे मामलों में ही प्राप्त थी। मेयर कोर्ट को जो थोड़ी बहुत न्यायिक स्वतंत्रता 1726 के चार्टर द्वारा प्रदान की गई थी। वह 1753 के चार्टर द्वारा निरस्त कर दी गई । यह व्यवस्था सन् 1773 तक चलती रही। अंततः इन कमियों को दूर करने के उद्देश्य से सन् 1773  रेग्युलेटिंग एक्ट पास किया गया।

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