Supreme Court Landmark Judgement on Daughters Right Father’s Property | बेटी की मृत्यु हुई तो उसके बच्चे हकदार

Supreme Court Landmark Judgement on Daughters Right Father's Property | बेटी की मृत्यु हुई तो उसके बच्चे हकदार
Supreme Court Landmark Judgement on Daughters Right Father's Property | बेटी की मृत्यु हुई तो उसके बच्चे हकदार
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Supreme Court Landmark Judgement on Daughters Right Father’s Property

 

Daughters Right Father’s Property:- देश की सर्वोच्च अदालत की तीन जजों की पीठ ने आज स्पष्ट कर दिया कि भले ही पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू होने से पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों को माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार मिलेगा। इसे लेकर 2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम बनाया गया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में व्यवस्था दी है कि पहले के मामले में भी कानून लागू होगा। ये फैसला भारतीय सामाजिक स्थिति को देखते हुए बेहद अहम है। इससे महिलाएं और मजबूत होंगी और फैसले का दूरगामी परिणाम आएगा। Supreme Court Judgement on IPC Section 498a in 2019 || आईपीसी धारा 498 ए पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले

 

देखा जाए तो बेटी को ससुराल की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। जब पति से किसी बात को लेकर अनबन हो जाए तो पति की खुद की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता मिलता है, लेकिन ससुराल की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। ऐसे में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक दिया गया है। कहीं न कहीं तो उसे पैतृक संपत्ति में अधिकार जरूरी था। 12 साल प्रॉपर्टी पर रहने से आप उसके मालिक बन जाते है- सुप्रीम कोर्ट का अहम् फैसला | Supreme Court Judgemnet on Adverse Possassion




‘बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं’ पहले क्या था कानून – Daughters Right Father’s Property

 

हिंदू लॉ के तहत महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को लेकर लगातार कानून में बदलाव की जरूरत महसूस की जाती रही थी और समय-समय पर कानून में बदलाव होता रहा है। संसद ने 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बनाया और महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया।

 

इस कानून से पहले हिंदू लॉ के दो स्कूलों मिताक्षरा और दायभाग में महिलाओं की संपत्ति के बारे में व्याख्या की गई थी। इस कानून में काफी विरोधाभास को खत्म करने की पूरी कोशिश की गई। इसके तहत महिलाओं को सीमित अधिकार से आगे का अधिकार दिया गया। महिला को जो संपत्ति मिलेगी उस पर पूर्ण अधिकार दिया गया और वह जीवन काल में उसे बेच सकती थी। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 में संशोधन के तहत महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार दे दिया गया और तमाम भेदभाव को खत्म कर दिया गया। बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही साझीदार बना दिया गया। Latest Supreme Court Judgement on Child Custody | चिल्ड्रेन कस्टडी पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेन्ट





बेटी की मृत्यु हुई तो उसके बच्चे हकदार – Daughters Right Father’s Property

 

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी को अपने भाई से थोड़ा भी कम हक नहीं है। उसने कहा कि अगर बेटी मृत्यु भी 9 सितंबर, 2005 से पहले हो जाए 9 सितंबर, इसलिए क्योकि इसी दिन 2005 से हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू हुआ था तो भी पिता की पैतृक संपत्ति में उसका हक बना रहता है। इसका मतलब यह है कि अगर बेटी के बच्चे चाहें कि वो अपनी मां के पिता (नाना) की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी लें तो वो इसका दावा ठोक सकते हैं, उन्हें अपनी मां के अधिकार के तौर पर नाना की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला :- एक ही केस के लिए दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता

HUF फैमिली और हमवारिस

 

हमवारिस या समान उत्तराधिकारी वे होते/होती हैं जिनका अपने से पहले की चार पीढ़ियों की अविभाजित संपत्तियों पर हक होता है। 2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियां सिर्फ हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की सदस्य मानी जाती थीं, हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी नहीं। हालांकि, बेटी का विवाह हो जाने पर उसे हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का भी हिस्सा नहीं माना जाता है। 2005 के संशोधन के बाद बेटी को हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी माना गया है। अब बेटी के विवाह से पिता की संपत्ति पर उसके अधिकार में कोई बदलाव नहीं आता है। यानी, विवाह के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने बताया प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession Law) नहीं कहा जा सकता है – ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65




2005 के संशोधन की बड़ी बातें

 

  1. इसके तहत महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार दे दिया गया और तमाम भेदभाव को खत्म कर दिया गया।
  2. बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही साझीदार बना दिया गया।
  3. बेटी और बेटे जन्म से पिता और पैतृक संपत्ति में बराबर के अधिकारी बना दिए गए। इसके तहत बेटियों को इस बात का भी अधिकार दिया गया कि वह कृषि भूमि का बंटवारा करवा सकती है।
  4. साथ ही शादी टूटने की स्थिति में वह पिता के घर जाकर बेटे के समान बराबरी का दर्जा पाते हुए रह सकती है यानी पिता के घर में भी उसका उतना ही अधिकार होगा जिनता बेटे को है।
  5. बेटे और बेटी दोनों को जन्म से ही बराबरी का दर्जा दे दिया गया।

 

बेटी कब पैदा हुई, कोई फर्क नहीं

 

हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 कहता है कि कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बेटी का जन्म 9 सितंबर, 2005 से पहले हुआ है या बाद में, पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा भाई के बराबर ही होगा। वह संपत्ति चाहे पैतृक हो या फिर पिता की अपनी कमाई से अर्जित। हिंदू लॉ में संपत्ति को दो श्रेणियों में बांटा गया है- पैतृक और स्वअर्जित। पैतृक संपत्ति में चार पीढ़ी पहले तक पुरुषों की वैसी अर्जित संपत्तियां आती हैं जिनका कभी बंटवारा नहीं हुआ हो। ऐसी संपत्तियों पर संतानों का, वह चाहे बेटा हो या बेटी, जन्मसिद्ध अधिकार होता है। 2005 से पहले ऐसी संपत्तियों पर सिर्फ बेटों को अधिकार होता था, लेकिन संशोधन के बाद पिता ऐसी संपत्तियों का बंटवारा मनमर्जी से नहीं कर सकता। यानी, वह बेटी को हिस्सा देने से इनकार नहीं कर सकता। कानून बेटी के जन्म लेते ही, उसका पैतृक संपत्ति पर अधिकार हो जाता है। What Kind of Judiciary is There in India | भारत में किस तरह की न्यायपालिका है




पिता की स्वअर्जित संपत्ति

 

स्वअर्जित संपत्ति के मामले में बेटी का पक्ष कमजोर होता है। अगर पिता ने अपने पैसे से जमीन खरीदी है, मकान बनवाया है या खरीदा है तो वह जिसे चाहे यह संपत्ति दे सकता है। स्वअर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से किसी को भी देना पिता का कानूनी अधिकार है। यानी, अगर पिता ने बेटी को खुद की संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार कर दिया तो बेटी कुछ नहीं कर सकती है। What is Juvenile Court in India | किशोर न्यायालय क्या होते हैं

 

अगर वसीयत लिखे बिना पिता की मौत हो जाती है

 

अगर वसीयत लिखने से पहले पिता की मौत हो जाती है तो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति पर समान अधिकार होगा। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों का चार श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और पिता की संपत्ति पर पहला हक पहली श्रेणी के उत्तराधिकारियों का होता है। इनमें विधवा, बेटियां और बेटों के साथ-साथ अन्य लोग आते हैं। हरेक उत्तराधिकारी का संपत्ति पर समान अधिकार होता है। इसका मतलब है कि बेटी के रूप में आपको अपने पिता की संपत्ति पर पूरा हक है। How to Get Court Marriage in India | भारत में कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया




 

गर बेटी विवाहित हो

 

2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियां सिर्फ हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की सदस्य मानी जाती थीं, हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी नहीं। हमवारिस या समान उत्तराधिकारी वे होते/होती हैं जिनका अपने से पहले की चार पीढ़ियों की अविभाजित संपत्तियों पर हक होता है। हालांकि, बेटी का विवाह हो जाने पर उसे हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का भी हिस्सा नहीं माना जाता है। 2005 के संशोधन के बाद बेटी को हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी माना गया है। अब बेटी के विवाह से पिता की संपत्ति पर उसके अधिकार में कोई बदलाव नहीं आता है। यानी, विवाह के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार रहता है। जब अपहरण के बाद हत्या होती है तो कोर्ट अपहरणकर्ता को हत्यारा मान सकता है: सुप्रीम कोर्ट





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