सुप्रीम कोर्ट ने बताया प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession Law) नहीं कहा जा सकता है – ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65

सुप्रीम कोर्ट ने बताया प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession Law) नहीं कहा जा सकता है - ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65
सुप्रीम कोर्ट ने बताया प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession Law) नहीं कहा जा सकता है - ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65
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ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65

 

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि किसी संपत्त‌ि पर लगातार और लंबे समय तक किया गया कब्जा, प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession Law) नहीं कहा जा सकता है ताकि ल‌िमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 65 के आशय की सीमा में उचित स्वामित्व हो। मामले में वादी ने मुकदमें में शामिल संपत्ति की खरीद के आधार पर कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया था।

प्र‌तिवादियों ने अपने लिखित बयान में इनकार किया कि वादी संपत्ति का मालिक है। उन्होंने दावा किया कि मुकदमें की प्रॉपर्टी पर उनका घर पिछली दो शताब्दियों से अधिक समय से मौजूद है। हाईकोर्ट ने दूसरी अपील में कहा कि संपत्त‌ि मार्च, 1964 से प्रतिवादियों के स्पष्ट, निर्बाध, शांतिपूर्ण और शत्रुतापूर्ण कब्जे में थी, और मार्च, 1976 में 12 साल की अवधि पूरी हो गई थी। इसलिए वादी द्वारा 17 फरवरी, 1979 को दायर किया गया मुकदमा पर‌िसीमन-वर्जित यानी मुकदमे दायर करने के लिए तय की गई सीमा अवधि के बाहर है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एल नागेश्वर राव और ज‌स्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा कि यदि प्रतिवादी के अनुसार, वादी वास्तव‌िक मालिक नहीं है तो वादी की संपत्त‌ि पर उसका कब्जा विवाद‌ित नहीं होगा। पीठ ने LRs बनाम महंत सुरेश दास (अयोध्या केस) में एम सिद्दीक (डी) के मामले में संवैधा‌निक पीठ के फैसले समेत विवाद‌ित कब्जे के कई फैसलों का हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession Law) की याचिका का आधार वह स्वीकृति होती है कि संपत्ति का स्वामित्व दूसरे में निहित है, जिसके खिलाफ दावेदार अन्य स्वामित्व के विपरीत कब्जे का दावा करता है। मामले में अपील की अनुमति देते हुए, पीठ ने कहा: “मौजूदा मामले में, प्रतिवादियों ने मुकदमे की संपत्ति के प्रबंध अधिकारी में निहित होने और इसके वादी के पक्ष में स्थानांतरण होने के तथ्य को स्वीकार नहीं किया है।

प्रतिवादियों ने न केवल प्रबंध अधिकारी बल्कि वादी को भी संपत्त‌ि से इनकार किया है।

प्रतिवादियों की दलील निरंतर कब्जे की है, लेकिन ऐसी कोई दलील नहीं है कि मुकदमे की संपत्त‌ि पर वास्तविक मलिक का ऐसा कब्जा विवादित था। प्रतिवादियों ने निरंतर कब्जे का सुबूत दिया है।

रसीदों में से कुछ 1963 से संबंधित हैं, लेकिन नवंबर 1963 से मुकदमा दायर करने तक कब्जा स्वाम‌ित्व में नहीं बदला था, क्योंकि प्रतिवादियों ने कभी भी वादी-अपीलकर्ता को मालिक होना स्वीकार नहीं किया या जमीन कभी प्रबंध अधिकारी के पास थी। उपरोक्त निर्णयों के मद्देनजर, हम पाते हैं कि हाईकोर्ट द्वारा दिए ‌निष्कर्षों के मुताबिक, प्रतिवादियों ने अपने कब्जे को प्रतिकूल कब्जे से पूरा किया है, जो कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं। नतीजतन, हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय और हुक्मनाम रद्द किया जाता है और मुकदमे का आदेश दिया जाता है।




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