Supreme Court Judgement on Adverse Possession | KRISHNAMURTHY S. SETLUR vs O.V.NARASIMHA SETTY | प्रतिकूल कब्जा

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Diary Number 2540-2008 Judgment
Case Number C.A. No.-006111-006111 – 2009 26-9-2019
Petitioner Name KRISHNAMURTHY S. SETLUR (DEAD) BY LRS.
Respondent Name O.V.NARASIMHA SETTY(DEAD) BY LRS.
Petitioner’s Advocate RAJEEV SINGH
Respondent’s Advocate ABHIJIT SENGUPTA
Bench HON’BLE MR. JUSTICE DEEPAK GUPTA, HON’BLE MR. JUSTICE ANIRUDDHA BOSE
Judgment By HON’BLE MR. JUSTICE ARUN MISHRA

उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि वादी प्रतिकूल कब्जे के आधार पर सम्पत्ति पर अपना दावा कर सकता है।

मौजूदा अपील वादी की ओर से दायर की गई थी जिसमें उसने दावा किया था कि संबंधित जमीन 1963 से 1981 तक यानी कि पूरे 18 साल उसके कब्जे में थी और इस प्रकार उस जमीन पर प्रतिवादी जोकि उस जमीन का असली मालिक है के बजाय उसका हक है।

निचली अदालत ने इस मामले में वादी के पक्ष में अपना आदेश सुनाया था,

लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए निचली अदालत का आदेश निरस्त कर दिया था कि वादी जमीन का असली मालिक नहीं था। न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने ‘कृष्णमूर्ति एस सेतलुर (मृत) बनाम ओ. वी. नरसिम्हा सेट्टी (मृत)’ मामले में राजस्व रिकॉर्ड पर विचार करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि 1963 से जमीन पर वादी का कब्जा था।

कोर्ट ने कहा:- (Judgement on Adverse Possession)

जमीन पर कब्जा असली मालिक के प्रतिकूल था। यह इस मामले में एचआर अयंगार एवं उनके कानूनी प्रतिनिधियों के दावे के विपरीत था और उन्होंने जमीन पर कब्जे के लिए कभी भी कोई मुकदमा दायर नहीं किया। एक बार यह स्थापित हो जाता है कि विवादित जमीन पर वादी कृष्णमूर्ति एस सेतलुर का कब्जा था, तो इसका परिणाम यह होगा कि वादी का कब्जा ‘प्रतिकूल कब्जा’ था।”

12 साल प्रॉपर्टी पर रहने से आप उसके मालिक बन जाते है- सुप्रीम कोर्ट का अहम् फैसला | Supreme Court Judgemnet on Adverse Possassion

 

पीठ ने यह भी कहा कि प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे हैं कि उन्होंने जमीन पर कब्जा कैसे हासिल किया। कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि मुकदमा दायर करने के बाद उन्हें बेदखल कर दिया गया हो, लेकिन इस बात का इस मुदकमे पर कोई असर नहीं पड़ा।

प्रतिकूल कब्जा यानी एडवर्स पोजेशन का क़ानून (Judgement on Adverse Possession)

उदाहरण के तौर पर राम का किसी भी शहर में एक घर है, जिसे उन्होंने रहने के लिए अपने भाई श्याम को या किसी दूसरे व्यक्ति को रहने के लिए दिया हुआ है। तो कानून ये है की 12 साल बाद श्याम को ये जो भी उस प्रॉपर्टी पर रहता है उसको प्रॉपर्टी बेचने का अधिकार है कानून के मुताबिक पोजेशन श्याम को मिलेगा। इसके कहते हैं प्रतिकूल कब्जा यानी एडवर्स पोजेशन।




लेकिन कब्ज़ा सामान्य है तो इस स्थिति में जमीन का स्वामित्व नहीं मिलता, लेकिन प्रतिकूल कब्जे के मामले में वह संपत्ति के मालिकाना हक पर दावा कर सकता है। जब ऐसी स्थिति होती है तो उसे साबित होने तक यह माना जाता है कि पोजेशन कानूनी है और इसकी इजाजत दी गई है। प्रतिकूल कब्जे के तहत जरूरतें सिर्फ यही हैं कि पोजेशन जबरदस्ती या गैर कानूनी तरीकों से हासिल न किया गया हो।
यानि कहने का मतलब है वैध मालिक अपनी अचल संपत्ति को दूसरे के कब्जे से वापस पाने के लिए 12 साल के अंदर कदम नहीं उठा पाएंगे, तो उनका मालिकाना हक समाप्त हो जाएगा और उस अचल संपत्ति पर जिसने 12 साल तक कब्जा कर रखा है, उसी को कानूनी तौर पर मालिकाना हक दे दिया जाएगा ।

इसके लिए बेहद जरुरी है जानना लिमिटेशन एक्ट :-

लिमिटेशन एक्ट, 1963 कानून का अहम हिस्सा है, जो प्रतिकूल कब्जे के बारे में विस्तार से बताता है। इस कानून में प्राइवेट प्रॉपर्टी के लिए 12 साल और सरकारी प्रॉपर्टी के लिए 30 साल की अवधि बताई गयी है, जिसमें आप संपत्ति का मालिकाना हक ले सकते हैं।  इस कानून के अनुसार  समय रहते अपनी प्रॉपर्टी के कब्जे को नहीं हटते है तो किसी भी तरह की देरी भविष्य में परेशानियां पैदा कर सकती है।
‘लिमिटेशन उपाय को खत्म कर देता है, जो आपके लिए सही नहीं है’, यही सिद्धांत लिमिटेशन एक्ट का आधार है। इसका मतलब है कि प्रतिकूल कब्जे के मामले में असली मालिक के पास प्रॉपर्टी टाइटल हो सकता है, लेकिन कानून के जरिए वह इस तरह दावा करने का अधिकार खो देता है।

कोर्ट ने ‘रवीन्द्र कौर ग्रेवाल एवं अन्य बनाम मंजीत कौर‘ के मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा :- “रवीन्द्र कौर ग्रेवाल एवं अन्य बनाम मंजीत कौरके मामले में कहा कितीन सदस्यीय पीठ ने कहा- हमारा फैसला है कि संपत्ति पर जिसका कब्जा है, उसे कोई दूसरा व्यक्ति बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के वहां से हटा नहीं सकता है. अगर किसी ने 12 साल से अवैध कब्जा कर रखा है तो कानूनी मालिक के पास भी उसे हटाने का अधिकार भी नहीं रह जाएगा. ऐसी स्थिति में अवैध कब्जे वाले को ही कानूनी अधिकार, मालिकाना हक मिल जाएगा.

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