Specifications of Charter of 1600 AD in Hindi | 1600 ई० चार्टर की विशेषताए

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1600 ई० चार्टर की विशेषताओं का उल्लेख -Specifications of Charter of 1600 AD –

विधि के ऐतिहासिक अध्ययन के लिए 1600 ई० के चार्टर (Charter of 1600) का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इस चार्टर के द्वारा भारत में अंग्रेजी के व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई थी। कालांतर से इस कंपनी के माध्यम से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना हुई इंग्लैंड में साम्राज्यी एलिजाबेथ ने 31 दिसंबर 16 से इस बीच में दिन चार्टर जारी करके ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की थी। भारतीय विधि को एक काफी विचारणीय नियमों का संग्रह ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से प्राप्त हुआ।

1600 ई० के चार्टर (Charter of 1600) चार्टर की मुख्य विशेषताएं निम्नवत थीं-

1- चार्टर के नियमों के अनुसार कंपनी की स्थापना केवल 15 वर्षों के लिए की गई। वह किंतु सम्राट की अपेक्षा  से 2 वर्ष पूर्व भी समाप्त किया जा सकता था।




2- चार्टर के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी के अलावा अन्य किसी संस्था को अफ्रीका एशिया और अमेरिका से व्यापार करने का अधिकार नहीं था। कोई भी अन्य व्यक्ति इस क्षेत्र में व्यापार नहीं कर सकता था। अनाधिकृत अंग्रेजी व्यापारियों के लिए दंड व्यवस्था की गई थी। उनके जहाज जब्त किए जा सकते थे। वह उनको कैद व जुर्माने की भी सजा देने का प्रावधान था।
3-    चार्टर के नियमों का उल्लंघन करने वाले को दंडित किया जा सकता था।

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4- कंपनी का प्रशासन आंतरिक लोकतंत्र द्वारा तय किया था। अर्थात् सभी सदस्य मिलकर 24 संचालकों एवं एक गवर्नर का चयन करते थे। यही मिलकर कंपनी का व्यापार चलाते थे।
5- कंपनी के सदस्यों को कंपनी के हितार्थ नियम बनाने का अधिकार था। और दंड करने का भी अधिकार था यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी को कानून बनाने का अधिकार था। परंतु इस अधिकार पर नियंत्रण भी था। कंपनी ऐसा कोई नियम नहीं बना सकती थी। जो इंग्लैंड की मूल विधि के विपरीत हो।
6- कंपनी द्वारा बनाए गए कानूनों की व्यवस्था यह थी कि वे भारतीयों पर लागू नहीं हो सकते थे।
7- सनसन् 1600 ई० के चार्टर (Charter of 1600) सम्राट को कमीशन नियुक्त करने के अधिकार से वंचित रखता था। अंग्रेजो को व्यापार करते समय वह एहसास हुआ, कि उनके सेवकों ने अनुशासनहीनता सभी मर्यादाएं पार कर चुके थे। और उन्हें नियंत्रित करने के लिए विधायी शक्तियां कम थी।
अतः कंपनी ने सम्राट के आयोग भी स्थापित करवाने प्रारंभ कर दिए। यह कमीशन सैनिक नियमावली के अनुसार अपराधियों को दंडित करने लगे। कालांतर से सन् 1615 में इंग्लैंड के सम्राट ने कंपनी को कमीशन जारी करने के अधिकार भी प्रदान कर दिए।
यद्यपि 1680 के चार्टर (Charter of 1600) में उपर्युक्त उपरोक्त विशेषताएं थी। परंतु इस चार्टर द्वारा कंपनी के संचालकों को केवल सीमित अधिकार प्राप्त थे। इस कारणवश वे शासन प्रबंध का संचालन कुशलता पूर्वक नहीं कर पाते थे। अतः कंपनी के संचालकों को और अधिकार प्रदान करने के लिए सन् 1661 का चार्टर प्रदान किया गया।
1661 का चार्टर-  धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा। और व्यापार की प्रगति के लिए भारत में अपनी बस्तियां बसना अंग्रेजों की मजबूरी हो गई। अतः कंपनी ने ब्रिटिश सम्राट के पास एक प्रार्थना पत्र भेजा। जिसमें यह याचना की गई कि उसे और अधिकार व शक्तियां प्रदान की जाए। जिससे वह कंपनी का प्रशासन ठीक ढंग से चला सके। तथा कंपनी में कार्यरत  कर्मचारियों पर पूर्ण नियंत्रण रख सके।
अतः 3 अप्रैल 1661 को सम्राट चार्ल्स द्वितीय ने एक चार्टर प्रदान किया। जिसके द्वारा कंपनी को न्याय व्यवस्था संबंधी विस्तृत अधिकार दिए गए इस चार्टर द्वारा प्रत्येक फैक्ट्री के गवर्नर और काैंसिल को यह अधिकार दिया गया, कि वह अपने क्षेत्र की सीमा में कंपनी सब कर्मचारियों व उनके अधीन रहने वालों के सभी दीवानी व फौजदारी के मामलों पर निर्णय कर सके। अतः इस चार्टर के द्वारा कंपनी और भारतीय सभी समान रूप से इसके नियमों के अधीन आ गए। इसमें कंपनी के नियमों का उल्लंघन करने पर मृत्यु दंड तक का प्रावधान था।

चार्टर 1661 की दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। प्रथम तो न्यायिक शक्ति गवर्नर व कौंसिल को प्रदान की गई

द्वितीय न्याय केवल अंग्रेज़ी कानून द्वारा ही किया जा सकता था। यह व्यवस्था अंग्रेजों के हित में थी। इस चार्टर द्वारा ब्रिटिश सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्र आधीन भू -प्रदेश में एक निश्चित न्याय व्यवस्था लागू की।  जो की इंग्लिश विधि पर आधारित थी। कंपनी के नियमों का अध्ययन करने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है। कि कंपनी के नियम केवल अनुशासन तक ही सीमित नहीं थी। वरन् धीरे-धीरे भारत राज्य में अपनी शक्ति का  उत्तरोत्तर विकास करने से है।।




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