गुवाहाटी हाईकोर्ट – पत्नी सिन्दूर नहीं लगाती तो इसका मतलब वो शादी को नहीं मानती

Code of Criminal Procedure (Crpc) Section 50 - Person arrested to be informed of grounds of arrest and of right to bail
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‘सिंदूर’ पहनने से मना करने का अर्थ है महिला द्वारा शादी को अस्वीकार करना : गुवाहाटी हाईकोर्ट ने आदेश के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका खारिज की | Sindoor Signify a Womans Refusal to Accept her Marriage

 

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने आदेश के खिलाफ दायर एक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए आदेश के तहत माना था कि ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से मना करना इस बात का संकेत है कि महिला अपनी शादी को अस्वीकार कर रही है। मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा और न्यायमूर्ति सौमित्रा सैकिया की खंडपीठ ने कहा कि जब एक पत्नी, जो हमेशा सिंदूर लगाती थी, अचानक अपने पति के साथ मतभेद होने के बाद कारण इसे लगाना या पहनना बंद कर देती है, तो यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसके पति के साथ उसकी शादी पूरी तरह से टूट गई है।”

 

पीठ ने कहा कि-




”अगर पत्नी ने कभी भी ‘सिंदूर‘ नहीं पहना या डाला होता तो परिस्थितियां कुछ अलग ही होती। ऐसी परिस्थितियों में, पति ‘सिंदूर’ न पहनने को क्रूरता की घटना के रूप में साबित नहीं कर पाता। इस मामले में, हालांकि परिस्थितियां अलग दिखाई दे रही हैं। मामले के साक्ष्यों पर विचार करने और पत्नी द्वारा दिए गए बयान को पढ़ने पर, ऐसा प्रतीत होता है कि पत्नी पहले ‘सिंदूर’ पहनती थी, लेकिन जब उसने उसे अपना पति मानना बंद कर दिया, तो उसने ‘सिंदूर’ पहनना बंद कर दिया। निश्चित रूप से, जब तथ्यों, परिस्थितियों,साक्ष्यों और पत्नी द्वारा दिए गए बयान को एकसाथ देखा जाता है कि यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शादी पूरी तरह से टूट गई थी। इसी अर्थ में सबूतों को सबूत पढ़ा गया है।”

 

इस साल जून में इसी बेंच ने उस वैवाहिक अपील को स्वीकार कर लिया था जो पति की तरफ से एक फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। फैमिली कोर्ट ने पति की तरफ से दायर तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया था। साथ ही यह माना गया था कि हिंदू विवाह की प्रथा के तहत, जब एक महिला हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करती है और उसके बाद वह ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से इनकार करती है तो इससे यह प्रतीत होगा कि वह अविवाहित है या फिर उसने अपनी शादी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

न्यायालय द्वारा दिए गए अन्य कारण नीचे सूचीबद्ध हैंः




-ससुराल वालों के साथ रहने से इनकार करना क्रूरता के समान है

-मैंटेनेंस एंड वेल्फेयर आॅफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 के तहत पति को उसके वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से रोकना।

-अप्रमाणित आपराधिक मामला दायर करना क्रूरता के समान है। वर्तमान कार्यवाही में पत्नी ने इस आदेश की समीक्षा करने की मांग करते हुए दलील दी थी कि पत्नी द्वारा ‘सिंदूर’ पहनने से इनकार करना या मना करने से क्रूरता का मामला नहीं बनता है। न ही इस आधार पर विवाह को भंग करने का कोई औचित्य बनता है।

 

पत्नी की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पति की वैवाहिक अपील को स्वीकार करने के पीछे सिर्फ सिंदूर पहनने से इनकार करना एकमात्र कारण नहीं था। यह भी इंगित किया गया कि न्यायालय ने अन्य परिस्थितियों का भी हवाला दिया था,जैसे महिला की तरफ से उसके पति के खिलाफ झूठी आपराधिक कार्यवाही शुरू करना आदि।

 

कोर्ट ने कहा कि, ”ऐसा प्रतीत होता है कि पुनर्विचारआवेदक ने पत्नी द्वारा ‘सिंदूर’ नहीं पहनने के संबंध में दिए गए बयान को अलग तरीके से देखा है। पुनर्विचारआवेदक ने यह तर्क दिया है कि विवाह को भंग करने के लिए न्यायालय ने सिर्फ इसी आधार पर विचार किया था। हालांकि पहले ही ऊपर यह बताया जा चुका है कि ऐसा कुछ नहीं था। वास्तव में न्यायालय ने पति के खिलाफ झूठी आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के कारण हुई क्रूरता की परिस्थितियों पर भरोसा किया है।”




न्यायालय ने यह भी कहा कि,

 

”अन्य तथ्य व परिस्थितियां, जिनका फैसले में उल्लेख किया गया था,उनके आधार पर अदालत इस बात से सहमत है कि पत्नी द्वारा किए गए विभिन्न कृत्यों ने शादी को पूरी तरह से तोड़ दिया था। पुनर्विचार याचिकाकर्ता के लिए वकील ने रिकाॅर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से निकलकर आए तथ्यों और परिस्थितियों के संदर्भ में यह बात स्वीकार की है कि पति-पत्नी के बीच कोई वैवाहिक सामंजस्य नहीं बचा था और वैवाहिक संबंध टूट गए थे।”

 

गौरतलब है कि

 

पत्नी ने दलील दी थी कि उसने अपने पति के साथ एक समझौता किया था जिसके अनुसार, पति या पत्नी ,दोनों में से किसी के भी परिवार का कोई भी सदस्य उनसे मिलने नहीं आएगा। इस प्रकार, यह नहीं कहा जा सकता है कि उसने अपने पति को मैंटेनेंस एंड वेल्फेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 के तहत उसकी वृद्ध माँ के प्रति उसके वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने से रोका था। इस तर्क को भी खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि- ”पति को उसके परिवार के सदस्यों से मिलने-जुलने से रोकना निश्चित रूप से एक सफल विवाह का संकेत नहीं देता है। बल्कि, पति को उसके परिजनों से मिलने से रोकने के लिए समझौता से बांधना ,एक क्रूरता का कार्य होगा।”




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