Schools of Criminology in Hindi – अपराधशास्त्र की विभिन्न शाखायें

Schools of Criminology in Hindi - अपराधशास्त्र की विभिन्न शाखायें
Schools of Criminology in Hindi - अपराधशास्त्र की विभिन्न शाखायें
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अपराधों के कारणों की विवेचना कीजिये | अपराध के कारणों की व्याख्या किन सिद्धान्तों के आधार पर की गई है

 

Schools of Criminology

उत्तर-अपराधशास्त्र के स्कूल (Schools of Criminology)- सदरलैण्ड के अनुसार, “अपराध के कारणों और उनके उपचार के बारे में एक ही विचारधारा के समर्थक और एकमत विद्वानों के समूह को अपराधशास्त्र का सम्प्रदाय (शाखा, स्कूल) कहा जाता है।

 

अपराधशास्त्र की विभिन्न शाखायें निम्नलिखित हैं।- Schools of Criminology

 

  • शास्त्रीय शाखा (Classical School)
  • भौगोलिक शाखा (Geographical School)
  • समाजवादी शाखा (Socialist School)
  • प्रकारात्मक शाखा (Typogical School)
  • सामाजिक शाखा (Sociological School)
  • विविध कारक सिद्धान्त (Multifactor Theory)।


1. शास्त्रीय शाखा (Classical School)

 

शास्त्रीय शाखा को पुनः तीन भागों में बाँटा जा सकता है  – Schools of Criminology


(अ) पूर्वशास्त्रीय शाखा (Pre-classical School)-पूर्वशास्त्रीय शाखा का जन्म शास्त्रीय शाखा से पहले हुआ। इसके अन्तर्गत दो विचारधारायें आती है –


(i) प्रेत शास्त्रीय विचारधारा तथा

(ii) स्वतन्त्र इच्छा का सिद्धान्त ।

 


(i) प्रेत शास्त्रीय विचारधारा (Demonological School)- इस मत के अनुसार मानव आत्मा पवित्र और सात्विक है तथा मनुष्य स्वभाव से अपराधी नहीं होता है बल्कि जब मनुष्य प्रेत, शैतान या असुर के नियन्त्रण में आ जाता है तब ये प्रेत आत्मायें उससे अपराध
कराती हैं। अतः अपराध के दो कारण हैं-(i) प्रेतात्मा का व्यकि। में प्रवेश तथा (ii) प्रेतात्मा द्वारा व्यक्ति पर नियन्त्रण होना । अगस्टकाप्टे ने मानव चिन्तन के किस में भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं के अस्तित्व को स्वीकार करते हुये कहा है कि आरम्भिक अवस्था में मनुष्य
प्रेतवाद से प्रभावित रहता है।

 

उपचार (Remedy) – इस स्कूल में दण्ड का कोई स्थायी सिद्धान्त न था। दण्ड का मौलिक उद्देश्य अपराधी को अधिकतम प्रताड़ित करना था।

 

आलोचना (Criticism)- या सिद्धान्त वैज्ञानिक नहीं है क्योंकि यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि प्रेत अपराध का कारण है। प्रेतों का अस्तित्व भी विवादित है। यह व्याख्या काल्पनिक है क्योंकि अपराधों का सीधा सम्बन्ध समाज और परिस्थितियों से है। जिनकी उपेक्षा करके अपराध की व्याख्या करना निराधार है किन्तु इस सिद्धान्त का महत्व इस बात में है कि इस शाखा ने अपराध के कारणों की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया है।

 


(ii) स्वतन्त्र इच्छा का सिद्धान्त (The Concept of Free Will)- इस शाखा का कहना है कि मनुष्य में कुछ व्यवहार तो जन्मजात होते हैं और कुछ व्यवहार वह अनुकरण से सीखता हैं । कुछ व्यक्ति सद्व्यवहारी तथा कुछ दुराचारी वाले होते हैं। मनुष्य इनमें से किसी का भी अनुकरण करने के लिये स्वतन्त्र होता है। स्वतन्त्र इच्छा के कारण मनुष्य जान-बूझकर आपराधिक व्यवहार को चुन लेता है।


उपचार (Remedy)- इस शाखा में अपराधी को प्रतिशोधात्मक दण्ड के रूप में फाँसी की सजा दी जाती थी तथा मृत शरीर एवं पशुओं पर भी मुकदमा चलाया जाता था।


आलोचना (Criticism)- इस स्कूल में अपराध के कारणों की गलत व्याख्या की गई है तथा समाज और परिस्थितियों की उपेक्षा से यह व्याख्या एकांगी और पक्षपातपूर्ण है। इस सिद्धान्त का इतना महत्व अवश्य है कि यह अपराध में दुर्भावना (Mens rea) के तत्वों का
थोड़ा सा आभास कराता है।


(ब) शास्त्रीय शाखा (Classical School)-19वीं शताब्दी के अन्त में इस स्कूल का जन्म बैकारिया, बेन्थम और फ्यूअर बैंक के सहयोग से हुआ। सर्व प्रथम सीजर बैकारिया ने इस बात का समर्थन किया कि मनुष्य वही कार्य करता है जिसमें उसे दुःख की अपेक्षा सुख की प्राप्ति अधिक होती है, भले ही यह कार्य अपराधिक ही क्यों न हो। अत बैकारिया ने अपनी पुस्तक “अपराधी और दण्ड में कहा है कि-

 

(i) अपराध सुखवादी दर्शन पर आधारित है।

(ii) व्यक्ति तभी अपराध करता है जब उसे अपराध करने में दुःख की अपेक्षा अधिक सुख मिलता है,

(iii) सुख-दुख का निर्धारण मानव-व्यवहार पर ही आधारित होता है,

(iv) मनुष्यों के व्यवहारों में अन्तर पाया जाता है तथा

(v) मनुष्य का व्यवहार उसकी स्वयं की जिम्मेदारी का फल है।


बैन्थम के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति किसी कार्य को करने से पूर्व उस कार्य से मिलने वाले सुख और दुःख की तुलना करता है। वह वही कार्य करता है जिसमें उसे दुःख की अपेक्षा सुख अधिक मिले। दैन्थम के अनुसार, प्रकृति ने मनुष्य को दो सम्प्रभु स्वामियों सुख और दुःख के अधीन रखा है। यह उन्हीं का कर्तव्य है कि वे बतायें कि हमें क्या करना चाहिये तथा यह निर्णय करे कि हम भविष्य में क्या कर सकते हैं। अत मानव के समस्त कार्यों की कसौटी उपयोगिता है। उनका कहना है कि सुख की मात्रा बराबर होने से बच्चों का खेल और काव्य का अध्ययन एक ही कोटि के हैं। अतः बेन्थम के अनुसार कानून का उद्देश्य अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख होना चाहिये।

 

आलोचना (Criticism) – अपराधों का एकमात्र कारण सुखों की प्राप्ति नहीं है बल्कि अपराध सामाजिक, आर्थिक और अन्य परिस्थितियों के कारण भी किये जाते हैं। समान अपराध के लिये समान दण्ड की मात्रा उचित नहीं है क्योंकि दण्ड की मात्रा आयु तथा
मानसिक अवस्था आदि बातों पर निर्भर करती है।


(स) नवीनशास्त्रीय शाखा (Neoclassical School)-गिलिन के मतानुसार, नव-शास्त्रीय शाखा का जन्म शास्त्रीय शाखा द्वारा प्रतिपादित समदण्ड व्यवस्था के दुष्परिणामों के प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ है। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक रौसी गैरान्ड और जौली हैं। इनका मत है कि अपराधों का एकमात्र कारण सुख की भावना न होकर, परिस्थितियाँ और विषमतायें भी हैं। ये विद्वान समान अपराध के लिये समान दण्ड को भी उचित नहीं मानते। उनका कहना है कि शिशु या विकृत चित्त वाले व्यक्ति को प्रौढ़ या स्वस्थ्य चित्त व्यक्ति के बराबर दण्ड देना कभी उचित नहीं हो सकता।

 

महत्व (Importance)- इस स्कूल के समर्थकों ने सर्वप्रथम अपराधियों और अभ्यस्त अपराधियों में अन्तर स्थापित करके प्रशासकों का ध्यान पृथक-पृथक दण्ड व्यवस्था द्वारा व्यक्तिगत उपचार की ओर आकृषित किया है। आज के प्रभावी उपचार जैसे परिवीक्षा
(Probation), पैरोल तथा सुधारालयों के व्यवस्थापन का श्रेय इसी सम्प्रदाय को जाता है।

2. भौगोलिक शाखा (Cartiographical School) 

 

इस स्कूल के समर्थक क्वेटलेट ग्वेरी और मान्टेस्क्यू हैं। इस शाखा के अनुसार, भौगोलिक परिस्थितियाँ समाज को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। ये परिस्थितियाँ मानव समाज में विद्यमान हैं किन्तु मानव नियन्त्रण के बाहर हैं। क्वेटलेट और ग्वेरी ने भौगोलिक अवस्थाओं और अपराधों में साम्य स्थापित करने के लिये थरमिक लॉ (Thermic Law) नामक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसके कुछ निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं-

 


सामाजिक दशाओं का प्रभाव-

 

(अ) अनुकूल सामाजिक दशाओं में अपराध कम होते हैं ।

(ब) प्रतिकूल सामाजिक दशाओं में अपराध अधिक होते हैं।

 

(II ) मौसम का प्रभाव

 

(अ) गर्मियों में व्यक्ति के विरुद्ध अपराध अधिक होते हैं।

(ब) सर्दियों में सम्पत्ति के विरुद्ध अधिक अपराध होते हैं।

 

(ii) जनसंख्या का प्रभाव-

(अ) अधिक भीड़ वाले स्थान पर अधिक अपराध होते हैं तथा

(ब) कम भीड़ वाले स्थान पर कम अपराध होते हैं।

 

(iv) भूमि की पैदावार का प्रभाव

 

(अ) जहाँ भूमि उपजाऊ होती है वहाँ अपराध कम होते हैं ।

(ब) जहाँ भूमि कम उपजाऊ होती है वहाँ अपराध अधिक होते हैं।


वर्षा का प्रभाव

 

अ) अनुकूल वर्षा वाले स्थानों पर अपराध कम होते हैं तथा

(ब) प्रतिकूल वर्षा वाले स्थानों पर अपराध अधिक होते हैं।


(vi) प्राकृतिक साधन

 

(अ) जहाँ प्राकृतिक साधनों की अधिकता होती है वहाँ अपराध कम होते हैं।

(ब) जहाँ प्राकृतिक साधनों की कमी होती है वहाँ अपर व अधिक जन्म देती है। फलस्वरूप प्रतिस्पर्द्धा से समाज में विघटन और अपराधों की संख्या बढ़ती हैं।

3. समाजवादी शाखा (Socialist School)

 

इस स्कूल के प्रतिपादक पास, एन्जिल्स तथा बोंगर थे। इनका कहना है कि आर्थिक दशाओं का अपराध से घनिष्ट सम्बन्ध है।

 

इस सिद्धान्त के मुख्य निष्कर्ष-

 

(i) उत्पादन आर्थिक स्वार्थ से प्रेरित होते हैं जो वर्ग संघर्ष को जन्म देते हैं जिनका अपराध से सीधा सम्बन्ध है।

(ii) अपराध की दर आर्थिक दशाओं पर निर्भर करती है। आर्थिक दशाओं में भिन्नता के कारण ही अपराध की दरों में भिन्नता पाई जाती है।

(iii) आर्थिक दशायें प्रतिकूल होने पर अपराध अधिक होते हैं और अनुकूल होने पर कम।

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बोंगर का अपराधिक कारणवाद का आर्थिक सिद्धान्त (Bongers Economic theory of crime causation)- प्रसिद्ध अपराधशास्त्री बोंगर ने आर्थिक दशाओं और अपराधों के बारे में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले हैं-


(i) स्वार्थपरता अपराध का मूल कारण है। मनुष्य स्वार्थी प्रकृति के कारण ही अपराध करता है ।

(ii) आर्थिक व्यवस्था का अपराधों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है, जैसे पूँजीवाद में उत्पादन उपयोग के लिये न होकर लाभ हेतु होता है। अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति प्रतिस्पर्द्धा को जन्म देती। है फस्वरूप प्रतिस्पर्धा से समाज में विघटन और अपराधों की संख्या बढ़ती है। 

(iii) यह प्रतिस्पर्धा भले ही किन्हीं दो वर्गों में हो, उसका फल सब अपराधों में वृद्धि ही होती है।

(iv) प्रतिस्पर्धा के बढ़ने से स्त्री श्रम और बाल-श्रम का जन्म होता है जो संघर्ष और अपराधों को जन्म देता है।

(v) बेरोजगारी के कारण आवारागर्दी, आर्थिक विषमता के कारण चोरी, अमीर लोगों के ऐश्वर्य से ईर्ष्या के कारण अपराध, स्वस्थ मनोरंजन के अभाव में मजदूरों द्वारा मद्यपान और वेश्यागमन, आर्थिक निर्धनता के कारण उपयुक्त आयु में विवाह न होने से यौन अपराध होते हैं या बिना मेहनत किये मालदार बनने की इच्छा से अभ्यस्त अपराधियों द्वारा किये गये अपराधों का एक मात्र जड़ आर्थिक कारण थे। बॉगर ने अपराध को दूर करने हेतु दो उपाय बताये हैं-

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                                      (i) समाज का पुनर्गठन तथा
(ii) उत्पादन और उपभोग के साधनों पर समान अधिकार।


आलोचना (Criticism)- यह स्कूल आर्थिक कारणवाद पर आधारित होने के कारण अपराधों का एकांगी स्पष्टीकरण देता है। आर्थिक दशा को अपराध का एक कारण मानना भूल है। उत्पादन और उपयोग के साधनों पर समान अधिकार होने पर भी अपराधों का अस्तित्व रहेगा। अपराध का सीधा सम्बन्ध सामाजिक दशाओं से है।


4. प्रकारात्मक शाखा (Typological School) 

 

इस सिद्धान्त को पुनः निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है


(अ) इटैलियन स्कूल (Italian School)

(ब) मानसिक परीक्षण स्कूल (Mental Testers School)

(स) मनोविश्लेषणात्मक स्कूल (Psychiatric School)

(अ) इटैलियन या लोम्बोसियन शाखा (Italian or Lombrosian School)-इस सिद्धान्त के प्रतिपादक इटली के. प्रसिद्ध अपराधशास्त्री लोम्ब्रोसो थे। लोम्ब्रोसो के मतानुसार-1 अपराधी जन्मजात होते हैं, वे बनते नहीं हैं। ये अपराधी जन्म से बनावट में
अपराधी व्यक्तियों से भिन्न प्रकार के होते हैं । (ii) अपराधियों की इस शारीरिक विशेषता के कारण इनकी पहचान की जा सकती है। अपराधियों के शरीर की विशेषतायें निम्नलिखित हैं।


जिनमें यदि किसी मनुष्य में 5 से अधिक विशेषतायें हैं तो वह निश्चित रूप से अपराधी है, 3 से 5 तक विशेषतायें रखने वाला अपूर्ण अपराधी तथा 3 से कम में यह आवश्यक नहीं है कि वह अपराधी हो ही

 

(अ) खोपड़ी (Cranium) – अपराधियों की खोपड़ी असमतल होती है-

(i) खोपड़ी गुम्बद की तरह गोल उठी होती है।

(ii) छत की तरह दबी हुई चौड़ी और नीची,

(ii) खोपड़ी का गुम्बद नाव या जहाज की पेंदी के समान चौड़ा,

(iv) एक ओर या दोनों ओर आगे या पीछे से उठी हुई होती है ।

(ब) निचला जबड़ा नीचे की ओर लम्बा या अन्दर की ओर दबा हुआ।

(स) चपटो नाक (Flatened Nose)

(द) छिटकी हुई दाढी,

(य) दर्द कम अनुभव करने की संवेदना,

(र) मस्तिष्क आकार और मात्रा में अनियमित होता है,

(ल) कान लम्बे और मौटे होते हैं।

(ब) (i) दांत अविकसित होते हैं, (ii) अक्ल दाढ़ (Wisdom Teeth) नहीं होते, (iii) सुआ दाँत (Canine Teeth) कुत्ते की तरह ऊपर उठे रहते हैं । (स) भौहें (Eyebrows) अपराधियों की भौहे देखकर लगता है जैसे उन्होंने नशा किया हो। उनकी आँखों में बाल बहुत कम होते हैं।


आलोचना (Criticism)- भौगोलिक परिस्थितियाँ अपराध का एकमात्र कारण नहीं है। भौगोलिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं तथा इन पर नियन्त्रण भी किया जा सकता है। सभान भौगोलिक अवस्थाओं में सभी लोग अपराधी नहीं होते अत अपराध का सम्बन्ध मानव आचरण से होना चाहिये।

लोम्बोसों का मत है कि उक्त विशेषतायें स्वयं अपराध नहीं करती बल्कि ये उस व्यक्ति की पहचान बताती हैं कि जिसमें पहले से ही अपराधी प्रवृत्ति विद्यमान हैं। यह प्रवृत्ति उसके अतिवादी या वंशानुगत होने के कारण हो सकती है। अपनी इन शारीरिक विशेषताओं के कारण ये लोग अपने के अपराध करने से नहीं रोक सकते जब तक कि उनके जीवन की परिस्थितियाँ बहुत ही अनुकूल न हों।

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दण्ड (Sentence)-लोम्बोसो के अनुसार, (i) मनुष्य को उसकी शारीरिक विशेषताओं के अनुसार दण्ड दिया जाना चाहिये। एक ही अपराध के लिये विभिन्न प्रकार के अपराधियों को अलग-अलग दण्ड दिया जाना चाहिये। (ii) अभ्यस्त हत्यारों को मृत्यु दण्ड दिया जाना चाहिये, (iii) पागल और बाल अपराधियों को किसी भी प्रकार का दण्ड न दिया जाना चाहिये बल्कि उनका उपचार किया जाना चाहिये तथा उन्हें इस अवस्था में संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिये। (iv) कारावास की सजा को खत्म करके देश निकाले की व्यवस्था की जानी चाहिये।

 

गैरोफैलों के अनुसार-(i) खतरनाक अपराधियों, जैसे हत्यारे को मृत्युदण्ड द्वारा, भंयकर अपराधियों को देश निकाले द्वारा और अभ्यस्त अपराधियों को आजन्म कारावास द्वारा समाज से लुप्त कर देना चाहिये ।

(ii) साधारण अपराधियों को क्षतिपूर्ति की सजा दी जानी चाहिये। अपराधियों से क्षतिपूर्ति राज्य और पीड़ित पक्ष को दिलाई जानी चाहिये।

 

 लोम्बोसो के सिद्धान्त का महत्व

 

लोम्ब्रोसो ने 1870 में पहली बार अपराधशास्त्र में वैधानिक विधि और आँकड़ों का प्रयोग किया। उसनें जेलों और पागल खानों में जाकर अपराधियों का स्वयं अध्ययन किया। उसने 383 खोपड़ियों तथा सैकड़ों मृत शरीरों को खोलकर अध्ययन किया। वह एक अच्छा शरीरशास्त्री भी था और उसने शरीर के अंगों का वैज्ञानिक अध्ययन पेश करने की कोशिश की। उसने अपराध की अपेक्षा अपराधी पर बल दिया और उसके महत्व को स्वीकार किया।

आलोचना (Criticism)- लोम्ब्रोसो का यह कथन कि अपराधियों को गैर अपराधियों से अलग किया जा सकता है, गलत है क्योंकि उसी के समकालीन डॉ गोरिंग ने हजारों अपराधियों और गैरअपराधियों की तुलना करके यह प्रमाणित कर दिया था कि उनमें कोई विशेष अन्तर नहीं था, (ii) लोम्ब्रोसो ने सामाजिक घटनाओं की उपेक्षा करके भंयकर भूल की है। वास्तव में अपराध के लिये सामाजिक परिस्थितियाँ बहुत हद तक जिम्मेदार हैं, जबकि लोम्बोसो केवल व्यक्ति को ही जिम्मेदार मानता है। (ii) देश निकाले की प्रस्तावित सजा-अव्यवहारिक है क्योंकि आज अपराधियों को कोई भी देश स्वीकार नहीं करेगा। (iv) लोम्ब्रोसों का यह कथन कि “अपराधी जन्मजात होते हैं, सही नहीं है। वास्तव में अपराधी बनते हैं, पैदा नहीं होते। लोम्बोसो ने शारीरिक विशेषताओं का सम्बन्ध आराध से जोड़ा या जो आज के युग में मिथ्या प्रमाणित हुआ है।

 

सदरलैण्ड के अनुसार, इस स्कूल ने विद्वानों का ध्यान अपराध एक सामाजिक घटना है से हट,कर अपराध एक वैजिक घटना है पर केन्द्रित करके जो कार्य इस स्कूल के जन्म के समय प्रगति पर था, उसे 50 वर्षों तक रोके रखा और स्वयं ने कोई स्थायी योगदान भी नहीं किया।

 

(ब) मानसिक परीक्षण शाखा (Mental Testers School)- जब लोम्बोसो का सिद्धान्त मान्यता खोने लगा तब गोडार्ड ने शारीरिक विशेषताओं (शारीरिक प्रकार) के स्थान पर मानसिक दुर्बलता (Feeble Mindedness) का सिद्धान्त प्रयुक्त किया जिससे अपराधियों और गैरअपराधियों में पहचान की जा सकती थी। गोडार्ड के मतानुसार मानसिक दुर्बलता जो मैण्डोलयन यूनिट (Mendelian Unit) के रूप में वंशानुक्रम में मिलती है, यही अपराध का कारण है क्योंकि कमजोर दिमाग का व्यक्ति अपने कार्यों के फल तथा कानून को समझने के योग्य नहीं होता। गोडार्ड ने अपने परीक्षणों से यह प्रमाणित किया कि लगभग सभी अपराधी मानसिक रूप से दुर्बल थे तथा लगभग समस्त दुर्बल मस्तिष्क वाले व्यक्ति अपराधी थे। लेकिन जब यह परीक्षण बड़ी संख्या में अपराधी और गैरअपराधी लोगों पर किये गये तब अपराध के कारणों के इस सिद्धान्त की प्रमाणिकता कम होती गई और कालान्तर में यह विचारधारा खत्म हो गई।

 

दण्ड (Sentence)- गोडर्ड का मत है कि अपराध का कारण मानसिक दुर्बलता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी अन्तरित होती है। अतः अपराध को समाप्त करने हेतु अपराधियों को या तो देश-निष्कासन की सजा देनी चाहिये या अपराधियों की नसबन्दी करा देनी चाहिये।

आलोचना (Criticism)- (i) मानसिक दुर्बलता अपराध का एकमात्र कारण नहीं हो सकता, सदरलैण्ड ने यह प्रमाणित किया है कि अपराध करने के लिये प्रखर बुद्धि आवश्यक है। अनेक अपराधों जैसे-जालसाजी, आयकर की बचत आदि अपराधों में बुद्धिमान व्यक्ति ही सफलता प्राप्त कर सकता है,

 

(ii) यह कहना गलत है कि सभी अपराधी मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। आधुनिक आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि केवल 10 प्रतिशत अपराधी ही मानसिक विकास से पीड़ित होते हैं।

(iii) सदरलैण्ड ने यह प्रमाणित किया है कि अपराध का कारण मानसिक परिस्थितियाँ हैं न कि दुर्बल बुद्धि,

(iv) यह प्रमाणित हो चुका है कि मानव विकास में वंशानुक्रमण की अपेक्षा पर्यावरण का महत्व अधिक है। अतः अपराधों को वंशानुक्रमण कारण मानना गलत है।

 

(स) मनोविश्लेषणात्मक शाखा (Phychiatic School)- इस स्कूल के विद्वानों ने अपराधी प्रकार के स्थान पर “भावान्तर असामंजस्य (Emotional disturbance) को अपराध का कारण बताया है। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक फ्रायड एलडर तथा आटोरैंक हैं। फ्रायड ने इडिपस कम्लैक्स, अचेतन निराशा और मौलिक इच्छाओं के दमन को अपराध का कारण माना है।

(i) इडिपस कम्पलैक्स (Oedipus Complex)- इडिपस थीब्स यूनान का राजा था। वह अपनी माँ के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करना चाहता था जो पिता के रहते सम्भव नहीं था। अतः उसने अपनी यह इच्छा पूरी करने हेतु अपने पिता की हत्या की तथा अपनी माँ के साथ विवाह किया। यौन-इच्छी की इस भावना के आधार पर फ्रायड ने इडिपस कम्पलैक्स के सिद्धान्त को जन्म दिया। फ्रायड के मतानुसार, सभी अपराध निकट सम्बन्धियों में यौन सम्बन्ध रखने की इच्छा का परिणाम हैं। जैसे-अवेतन में एक व्यक्ति अपनी माँ से वासनायुक्त प्रेम करने लगता है। सामाजिक दण्ड के डर से उसकी इच्छा पूर्ण नहीं हो पाती। यौन सम्बन्ध की इच्छा बड़ी तीव्र होती है जिसकी पूर्ति किसी न किसी रूप में प्रकट होती है। इस दबाई गई इच्छा का प्रकटीकरण चोरी, हत्या, आत्म-हत्या आदि अपराधों में होता है।फ्रायड का कहना है कि चोरी आदि अपराध का वास्तविक उद्देश्य नहीं था, वास्तविक उद्देश्य तो निकट सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध की भावना ही है। इस प्रकार की क्रियाओं का कारण भावात्मक तनाव है जो पारिवारिक संघर्ष या अन्य अनेक कारणों में उत्पन्न हो सकता

 

(ii) अचेतन निराशा (Unconcious Frustration) – मनुष्य को अपने कार्यों में कभी सफलता मिलती है तो कभी असफलता । कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो असफलताओं से मतानुसार, मानसिक निराश नहीं होते और सफलताओं के लिये लगातार प्रयास और संघर्ष करते रहते हैं। सफलता विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा प्रदान करते हैं जिससे बाल अपराधों की संख्या में वृद्धि मिलने पर कोई दुष्कृष्य या अपराध नहीं किया जाता किन्तु असफलता मिलने पर वह कोई न होती है। कोई अपराध कर बैठता है। उदाहरणार्थ-प्रेम सम्बन्धों में असफलता रहने पर प्रेमी युवक और युवतियाँ प्राय आत्महत्या कर बैठते हैं।

(iii) मौलिक इच्छाओं का दमन (Repression of Basic Drives)-कुछ इच्छाओं जैसे-यौन और भूख की इच्छा को दबाने से संघर्ष पैदा हो जाता है। समाज के साथ सामंजस्य नहीं कर पाता है और अपराधों की ओर मुड़ जाता है। इन संघर्षों के कारण के व्यक्ति का निर्माण उस सामाजिक वातावरण में होता है जिसमें कि वह रहता है। व्यक्ति में जीवन के तनावों का सामना करने की शक्ति कम हो जाती है और वह दिवास्वपन तरह अपराध वातावरण एवं व्यक्तित्व की अन्तक्रिया का परिणाम है।


6. विविधकारक सिद्धान्त (Multifactor Theory)

 

इस शाखा के प्रवर्तक विलियम हीले थे जिनके अनुसार अपराध तत्वों और परिस्थितियों में संयुक्त होने पर घटित होते है।  प्रत्येक अपराध में अलग अलग इस प्रकार के संयोजन होते है। इस सिद्धांत के अन्य समर्थक वानरस, और टियर्स है। 

 

उदहारण :- एक बाल अपराधी सामान्यतः एक या दो कार्डो से  बनकर सात या आठ कारणो से बनता है। प्रत्येक बच्चा एक या दो करने पर नियंत्रण पा सकते है।  जैसे माता पिता की मृत्यु या गरीबी तथा कमजोर स्वस्थ्य। लेकिन अगर बच्चे की पिता शराबी है माँ व्यभिचारी है। बच्चा मानसिक रूप से कमजोर है। इस तरह के कारन बच्चे को अपराधी बना ही देंगे।

आलोचना :- यह अपराध का सिद्धांत अपराध की व्याख्या एक करक के आधार पर न करके अनेक  आधार पर करता है जो भ्रामक है। 

(ii) यह मनना की प्रत्येक करक अपने आप में अपराध पैदा  क्षमता रखता है गलत है , क्योकि एक करक अपराध पैदा।   अपराध पैदा करने के लिए बहुत  मिलने चाहिए। 

 

किस संप्रदाय को हम सर्वाधिक पूर्ण कह सकते है 

 

अपराध के सम्बन्ध में सभी स्कूलों में से किसी को पूर्ण समझा नहीं जा सकता। फिर भी विभिन्न अपराध शास्त्रियों ने यह स्वीकार किया है की अपराध के लिए एक अकेला सर्वमान्य कारन नहीं हो सकता। अपराध के लिए कोई एक कारन जिम्मेदार नहीं हो सकता। 

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