संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार है || Right to Protect Private Property

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संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार एक अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार है।

भा० द० सं० की धारा 97 के अनुसार- Right to Protect Private Property

 किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार  की परिभाषा में आने वाला अपराध है। या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है। अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की चाहे वह चल हो अथवा अचल हो। संपत्ति के प्रति रक्षा करें। 

धारा 97 निम्न चार प्रकार के अपराधों के विरुद्ध प्रतिरक्षा का अधिकार देती है-

(1) चोरी
(2) लूट
(3) रिष्टि
(4) आपराधिक अतिचार
 इससे निष्कर्ष क्या निकलता है, कि अन्य प्रकरणों में प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं है, कि जिस संपत्ति की प्रतिरक्षा के लिए बल प्रयोग किया जा रहा है। वह उसकी स्वयं की हो किसी अन्य की शब्दावली से स्पष्ट है, कि किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति के संबंध में किए जाने वाले अपराधों के लिए प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है।

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 उल्लेखनीय है, कि आईपीसी  धारा 97 में प्रदान किया गया, अधिकार समस्त विश्व के विरुद्ध प्राप्त है। इतना ही नहीं यह अधिकार धारा 98 में उपबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध भी प्राप्त है।- Right to Protect Private Property

 

 संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार शारीरिक प्रतिरक्षा के अधिकार की भांति धारा 99 द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के आधीन लागू होगा। निम्नलिखित परिस्थितियों में संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता-
(I) लोक सेवक के स्वयं के कार्य
(ii)  लोक सेवक के निर्देशानुसार किया गया कार्य।
(iii) अधिकारियों की सहायता प्राप्त करने का समय हो
(iv)  अभियुक्त आशंका से अधिक क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती।

 संपत्ति की प्रतिरक्षा में कब मृत्यु तक की जा सकती है?

 भा०द० सं० की धारा 103 उन परिस्थितियों का उपबंध करती है। जिनमें संपत्ति की प्रतीक्षा करते समय प्राप्त करने वाले व्यक्ति की मृत्यु तक की जा सके।
 धारा 103 के अनुसार संपत्ति की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार धारा 99 में वर्णित प्रतिबंधों के आधीन दोष प्रताप की मृत्यु या अन्य हानि की जाने तक है। यदि उस अपराध के किए जाने या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है।




एतस्मिन् पश्चात प्रगणित भॉंतियों में से किसी भी बात का है अर्थात्- Right to Protect Private Property

(I) लूट
(ii)  रात्रि गृह भेदन,
(iii)  अग्नि द्वारा रिष्टि को किसी ऐसे निर्माण तब्बू या जलयान को की गई है। जो मानव के आवास के रूप में या संपत्ति की अभिरक्षा के स्थान में के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
(iv)  चोरी, रिष्टि या गृहअतिचार जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया है। जिससे युक्तियुक्त रूप से ही आशंका हो कि यदि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या गंभीर चोट होगा।
 भा०द० सं० की धारा 104 उन परिस्थितियों का उल्लेख करती है।-  जिसमें मृत्यु के अलावा अपराध कर्ता को अन्य प्रकार की गंभीर हानि पहुंचाई जा सकती है। धारा 104 के अनुसार जब अपराध करता द्वारा किया जाने वाला अपराध धारा 113 में वर्णित बात का नहीं है। तो अधिकार प्रयोग करने वाला व्यक्ति अपराध करता को मृत्यु के अलावा अन्य किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सकता है।
 अधिकार का प्रारंभ हुआ बना रहना दंड संहिता की धारा 105 ही उपबंध करती है। कि संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार कब आरंभ होता है। और कब तक बना रहता है।

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धारा निम्नलिखित उपबंध करती है- Right to Protect Private Property

 1 – चोरी के विरुद्ध –
(क) संपत्ति पुनः वापस प्राप्त नहीं कर ली जाती है, या
 (ख) अपराधी संपत्ति संहित पहुंच से बाहर नहीं होता है या
 (ग) लोक प्राधिकारीओं की सहायता प्राप्त नहीं कर ली जाती।
(2) लूट के विरुद्ध-
(क) जब तक तत्काल मृत्यु या तत्काल चोट या तत्काल व्यक्तिगत अवरोध का भय बना रहता है या।
(ख) अपराधी किसी व्यक्ति की मृत्यु या चोट या तत्काल सदोष अवरोध करता रहता है । या करने का प्रयत्न करता है।
3- आपराधिक अतिचार या दृष्टि के विरुद्ध- जब तक कि वह अपराध कार्य किया जा रहा है।
4- रात्रि गृह भेदन के विरुद्ध -जब तक गृह भेदन से ग्रह अधिकार की स्थिति बनी रहती है ।यहां उल्लेखनीय है। कि अपराधी को तब तक की ही मृत्यु प्राप्त कराई जा सकती है। जब तक वह ग्रह स्वामी के परिवार में है। अन्यथा अधिकार समाप्त माना जाता है। इसमें एक परंतुक यदि वह संपत्ति के साथ भागता है।  तो उस समय तक अधिकार प्राप्त होगा। जब तक कि वह संपत्ति वापस प्राप्त नहीं कर ली जाती है। अथवा संपत्ति को प्राप्त करने के लिए अधिकारियों की सहायता प्राप्त नहीं कर ली जाती।।

 




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