जरूरी न हो तो लॉक डाउन की अवधि में पुलिस न करे गिरफ्तारी- Kerala High Court

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जरूरी न हो तो लॉक डाउन की अवधि में पुलिस न करे गिरफ्तारी- Kerala High Court

 

केरल हाईकोर्ट ने वकीलों और सरकारी कानून अधिकारियों के दफ्तरों और सहायक कर्मचारियों के कामकाज पर पड़ रहे नेशनल लॉकडाउन के प्रभावों के मद्देनजर निर्देश जारी किए हैं। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि अपरिहार्य न हो तो गिरफ्तारी न की जाए। जघन्य और गंभीर अपराधों में कार्रवाई करने के लिए पुलिस स्वतंत्र है।

 

मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार, जस्टिस सीके अब्दुल रहीम और सीटी रविकुमार की पूर्ण ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कई निर्देश जारी किए हैं। “उक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए, हमारा दृढ़ मत है कि किसी आरोपी को गिरफ्तार कर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए, सिवाय उन मामलों में जहां गिरफ्तारी अपरिहार्य है। हालांकि, राज्य जघन्य/गंभीर अपराधों के मामले में उचित निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

 

अन्य मामलों में, राज्य उसी अनुसार कार्य कर सकता है।” जेलों में भीड़भाड़ की स्थिति को देखते हुए पीठ ने कहा कि जब भी आरोपियों को पेशा किया जाता है, तब मजिस्ट्रेट/न्यायाधीशों को यह तय करना चाहिए कि आरोपी की न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत आवश्यक है या नहीं।

 

न्यायालय ने जोर देकर कहा कि “जमानत नियम है, जबकि जेल अपवाद।” “किसी भी गिरफ्तारी की स्थिति में, अनुच्छेद 20 (2) के तहत उल्लेखित संवैधानिक दायित्व का अक्षरसः पालन किया जाए। जेलों में बहुत ज्यादा भीड़ उन मुद्दों में एक रही है, जिन्हें माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका (C) No.1/2020 के तहत स्वतः संज्ञान में लिया था। इसलिए, जिन विद्वान मजिस्ट्रेट/न्यायाधीश के समक्ष आरोपी को पेश किया जा रहा है, वे अपराध की प्रकृति के आधार पर, यह तय करें कि न्यायिक/पुलिस हिरासत की आवश्यकता है या नहीं। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि जमानत नियम है, जबकि जेल एक अपवाद।”

 

बेंच ने हालांकि कहा:

 

“हम यह स्पष्ट करते हैं कि उपर्युक्त निर्देश सार्वजनिक आदेश/ कानून और व्यवस्था से संबंधित विषयों और राज्य सरकार द्वारा COVID-19 के प्रकोप का सामना करने के ली की जार ही कार्रवाइयों और उसके बाद की कार्रवाइयों पर लागू नहीं होते हैं। केरल हाईकोर्ट में मंगलवार रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 21 दिनों के नेशनल लॉक डाउन के मद्देनजर यह मामला उठाया गया था। हाईकोर्ट ने रंजीत थंपन (अतिरिक्त महाधिवक्ता), सुमन चक्रवर्ती (वरिष्ठ लोक अभियोजक), पी विजयकुमार (सहायक सॉलिसिटर जनरल), वी मुन मनु (वरिष्ठ सरकारी वकील) और लक्ष्मी नारायण (अध्यक्ष, केरल उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ) की दलीलों को सुनने के बाद निर्देश द‌िए।

 

साथ ही अदालत ने सभी अधीनस्थ अदालतों और न्यायाधिकरणों द्वारा पारित अंतरिम आदेशों को एक महीने की अवधि तक के लिए आगे बढ़ा दिया। “संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उच्च न्यायालय उन सभी न्यायालयों/न्यायाधिकरणों, जिन पर अनुच्छेद 227 के तहत पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार रखता है, की ओर से पारित अंतरिम आदेशों को, जो लॉक डाउन की 21 दिन की अवधि के दरमियान समाप्त हो जाएंगे, आज से एक महीने तक बढ़ाए जा रहे हैं।” कोर्ट ने जमानत आदेशों की कार्रवाई भी आगे बढ़ा दी। “एक अवध‌ि तक सीमित जमानत या अग्रिम जमानत के आदेश लॉक डाउन की अवधि में समाप्त हो सकते हैं, उन्हें आगे बढ़ाया जाना चाहिए।



इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करके उपरोक्त मामलों में दिए गए अंतरिम आदेशों को आज से एक महीने के लिए बढ़ाया जाएगा।” अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि केरल सरकार ने 30 अप्रैल तक सभी वसूली कार्यवाहियों को स्‍थगित रखने का निर्णय लिया है। सरकार ने स्थानीय स्वशासी संस्थाओं को भी निर्देश दिया है कि वे कठोर कार्रवाइयों से बचें। पीठ ने कहा कि, “उम्मीद है कि, COVID-19 के प्रकोप को देखते हुए राज्य सरकार, स्‍थानीय स्वशासी संस्थान, भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रमों, जो राज्य/केंद्र सरकारों के स्वामित्व और नियंत्रण में है, द्वारा कोई भी कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी, क्योंकि फिलहाल न्यायालयों से संपर्क करने की स्थिति में नहीं हैं।”

 

भारत के सहायक सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश से अवगत कराया, जिसमें भारत के सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि केंद्र सरकार टैक्स वसूली के संबंध में राहत के लिए एक तंत्र विकसित कर रही है। पीठ ने उम्मीद जताई कि जब तक इस तरह के कदम नहीं उठाए जाएंगे, कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी। “माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष भारत सरकार की ओर से पेश दलील, कि एक उचित तंत्र विकसित किया जाएगा, को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, हम यह भी कहते हैं कि यह राज्य के लिए उपयुक्त है ‌‌‌कि ऐसे होने तक हम आशा करते हैं कि कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।”

 

न्यायालय ने वी मनु की दलील पर भी ध्यान दिया, जिन्होंने बार काउंसिल ऑफ केरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पक्ष रखे। उन्होंने कहा कि देश में महामारी के प्रकोप और भारत सरकार द्वारा जारी लॉक डाउन अधिसूचना के के मद्देनजर इस अवधि के दौरान न्यायालयों को बंद किया जाना चाहिए। एक अलग ऑफिर ऑर्डर में हाईकोर्ट ने 14 अप्रैल तक सभी कार्य निलंबित करने की घोषणा की। जजमेंट डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें



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