Nature of Criminology in Hindi – अपराध शास्त्र की प्रकृति का वर्णन

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Nature of Criminology in Hindi – अपराध शास्त्र की प्रकृति का वर्णन

 

अपराध शास्त्र की प्रकृति का वर्णन, प्रकृति (Nature of Criminology in Hindi) :- अपराध शास्त्र की प्रकृति और उसके स्वरूप के बारे में परस्पर विद्वानों में मतभेद है इस संबंध में हमारे सामने यह प्रश्न आता है कि क्या अपराध शास्त्र एक विज्ञान है इस प्रश्न का प्रमुख अपराध शास्त्रियों, न्याय शास्त्रियों, तथा विधि शास्त्रियों द्वारा विचार किया गया है किंतु वे अभी तक किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे।

 

माइकल आदि अर्थशास्त्रियों के अनुसार “अपराध शास्त्र ना तो विज्ञान है और ना कभी हो सकता है” जबकि इसके विपरीत टेस्ट सदरलैंड आदि अपराध शास्त्रियों का कहना है कि “अपराध शास्त्र विज्ञान तो है किंतु अविकसित”

 

आशा है कि निकट भविष्य में यह पूर्ण रूप से विकसित विज्ञान होगा उक्त दोनों मतों से भिन्न शैलीन महोदय एक अलग ही बात कहते हैं उनका कहना है कि “अपराध शास्त्र विज्ञान का स्थान तभी ले सकता है जब विधायिकाओं द्वारा दी गई मनमानी परिभाषा के स्थान पर विज्ञान के उद्देश्य के लिए वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित परिभाषाएं प्रतिस्थापित हो जाएंगे ।” read अपराध शास्त्र और अपराधिक विधि में अंतर – Diffrence between Criminology and Criminal Law




क्या अपराध शास्त्र एक विज्ञान है (Is Criminology is a Science, Nature of Criminology in Hindi)

 

अपराध शास्त्र की प्रकृति के बारे में यह प्रश्न विवादित है कि अपराध शास्त्र को विज्ञान माना जाए या नहीं इस विषय में पक्ष और विपक्ष में निम्नलिखित तर्क पेश किए हैं जो अपराध शास्त्र की प्रकृति को समझने में सहायक है ।

 

अपराध शास्त्र विज्ञान नहीं है (Criminology is Not Science, Nature of Criminology in Hindi) :- इस मत के प्रमुख समर्थक माइकल आदि है जो अपने मत के समर्थन में अग्रलिखित तर्क पेश करते हैं। Read Meaning of Criminology and Main Division of Criminology in Hindi – अपराध शास्त्र का अर्थ

 

सार्वभौमिक सिद्धांतों का अभाव :- विस्तृत अर्थों में किसी विषय के क्रमबद्ध सुव्यवस्थित अध्ययन को विज्ञान कहते हैं इसके कारण और परिणामों से संबंध स्थापित किया जाता है। दूसरे शब्दों में विज्ञान में इस बात का अध्ययन किया जाता है कि यदि ऐसा होता तो उसके आमुख परिणाम होंगे साथ ही उसके सिद्धांत निश्चित एवं सार्वभौमिक होते हैं जो केवल स्थिर तथा समरूप इकाइयों के बारे में भी बनाए जा सकते हैं। चुकी अपराध स्थिर तथा समरूप इकाई नहीं है बल्कि यह समय और स्थान के अनुरूप बदलता रहता है। अतः अपराध के बारे में सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं बनाए जा सकते तथा इनके अभाव में अपराध शास्त्र कभी भी विज्ञान नहीं बन सकता ।




वैज्ञानिक अध्ययन का अभाव (Lack of scientific study) :- किसी भी विषय विज्ञान का निम्नलिखित कर्म के अनुसार किया गया अध्ययन वैज्ञानिक अध्ययन माना जाता है। परिकल्पना का निर्माण परिकल्पना से संबंधित आगरा आंकड़ों का संग्रह अधिष्ठापन निष्कर्ष सत्यापन सार्वभौमिक सिद्धांतों के निर्णय के लिए वैज्ञानिक अध्यापन में प्राप्त निष्कर्षों का सत्यापन होना अनिवार्य है परंतु अपराध की अस्थिरता के कारण अपराध संबंधी अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों का सत्यापन संभव नहीं है। अतः अपराधों का वैज्ञानिक अध्ययन भी संभव नहीं है यही कारण है कि अपराध शास्त्र विज्ञान नहीं हो सकता ।

 

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विश्वसनीय आंकड़ों का अभाव (Lack of reliable data) :- क्योंकि अपराध संबंधी अपराधों के संग्रह या मापन में वैज्ञानिक उपकरणों का कोण का अभाव रहता है इसलिए इन आंकड़ों पर पूर्ण विश्वास नहीं किया जा सकता यह आंकड़े शोधकर्ता की दुर्भावना से प्रेरित होते हैं अतः संदिग्ध आंकड़ों के आधार पर किया गया अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो सकता ।

 

प्रयोगशाला जैसे नियंत्रण का अभाव (Lack of laboratory control, Nature of Criminology in Hindi) :- क्योंकि अपराध एक सामाजिक हटना है जिसका अध्ययन केवल समाज में ही किया जा सकता है प्रयोगशाला में नहीं। इसलिए अपराध शास्त्र का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञानों की तरह नहीं किया जा सकता अपराध शास्त्र के अध्ययन में प्रयोगशाला जैसी शर्तों के नियंत्रण का अभाव रहता है।




शर्तों और परिस्थितियों के नियंत्रण का आभाव इन निष्कर्षों के सत्यापन को असंभव तथा अविश्वसनीय बना देता है अतः अपराध शास्त्र को विज्ञान नहीं कहा जा सकता संक्षेप में उपरोक्त तर्कों के आधार पर हम अपराध शास्त्र को विज्ञान नहीं कह सकते माइकल के मतानुसार अपराध शास्त्र विज्ञान तो है किंतु यह एक अविकसित विज्ञान है।

 

अपने मत के समर्थन में अपराध शास्त्री निम्नलिखित तर्क पेश करते हैं जो अपराध शास्त्र के विज्ञान होने या विज्ञान हो जाने की संभावना का समर्थन करते हैं ।

 

सार्वभौमिक सिद्धांत संभव है :- सदरलैंड का कहना है कि नियमों की आवश्यकता पर अनावश्यक जोड़ दिया गया है आधुनिक युग में अपराध शास्त्र का अध्ययन पुरानी लीक से हटकर किया जा रहा है। अपराधियों का पता लगाने हेतु तथा उनकी रोकथाम के लिए नए नए उपकरणों और यंत्रों का प्रयोग किया जाने लगा है लाई डिटेक्टर जैसे यंत्रों की खोज की जा चुकी है अतः यह संभव हो गया है कि उनके आधार पर निकाले गए निष्कर्ष तथा प्रतिपादित सिद्धांत फिर शर्माने और सर्व भौमिक हो सकते हैं तथा अपराध शास्त्र एक विज्ञान हो सकता है।




वैज्ञानिक अध्ययन संभव है :- वर्तमान युग में अपराध शास्त्र का अध्ययन सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जाने लगा है उदाहरण के लिए सर्वप्रथम अपराध का पता लगाया जाता है उसके बाद अपराधी की खोज की जाती है। तथा अपराधी से अपराध के कारणों का पता लगाकर कोई निष्कर्ष निकाला जाता है अपराध के अध्ययन का यही पद्धति वैज्ञानिक पद्धति होती है अतः अपराध शास्त्र विज्ञान है।

 

प्रयोगशाला संभव है :- विधि या न्यायिक विज्ञान प्रयोगशालाओं की स्थापना से भी अपराध शास्त्र के विज्ञान होने की सहायता मिली है प्रयोगशाला में परीक्षणों के आधार पर राय बनाई जाती है। उदाहरण के लिए :- खाद्य के मिश्रित होने की जांच में रक्त तथा वीर्य के परीक्षण से अपराधी की खोज आदि महत्वपूर्ण कार्य इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से किए जा रहे हैं। इसके अनुसार अपराध एक ऐसा अध्ययन है जो अभी पूर्ण विकसित नहीं है इससे स्पष्ट है कि अपराध शास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो अभी तक विकसित नहीं है।

 

निष्कर्ष (The Conclusion) :-

 

उपरोक्त वर्णन के आधार पर संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यदि वर्तमान समय में अपराध शास्त्र को विज्ञान मानने में कठिनाइयां हैं किंतु आने वाले समय में अपराध शास्त्र क्षमता विकसित विज्ञान के रूप में उभरकर सामने आएगा। आज आधुनिक युग में हम समाजशास्त्र को सामाजिक विज्ञान मानते हैं तथा मानव मस्तिष्क के व्यवहार संबंधी अध्ययन को भी मनोविज्ञान अर्थात विज्ञान मानते हैं। अतः क्षमता के आधार पर अपराध शास्त्र को भी एक विज्ञान माना जा सकता है। अतः सदरलैंड का यह कथन हमें उचित ही प्रतीत होता है कि अपराध शास्त्र वर्तमान समय में विज्ञान नहीं है किंतु उसके विज्ञान के रूप में विकसित होने की आशाएं है।

 

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