Mens rea Meaning in Hindi  | दोषपूर्ण आशय की परिभाषा

Mens rea Meaning in Hindi  | दोषपूर्ण आशय की परिभाषा
Mens rea Meaning in Hindi  | दोषपूर्ण आशय की परिभाषा
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Mens rea Meaning in Hindi  | दोषपूर्ण आशय की परिभाषा

 

दोषपूर्ण आशय (What is mens rea):-  किसी व्यक्ति के हृदय कि वह भावना है जिसके द्वारा वह किसी को जानबूझकर हानि पहुंचाने के लिए काम करने को प्रेरित करता है । जब किसी व्यक्ति की भावना दोषपूर्ण नहीं होगी वह किसी भी अपराधी कार्य को करने के लिए प्रेरित नहीं होगा । किसी व्यक्ति के अपराधिक दायित्व के संबंध में अंग्रेजी सामान्य विधि (कॉमन लॉ) का मूलभूत सिद्धांत यह है कि कोई भी कार्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता जब तक कि वह अपराधी भाव यानी कि मेंस रिया Mens rea से ना किया जाए।  इस सिद्धांत का आधार सूत्र “Actus non facit rim nisi mens sit rea” है ।

 

इस सूत्र का अर्थ यह है कि केवल कार्य (mere Act) दंडनीय नहीं है तथा केवल अपराधी विचार (mens rea) दंडनीय नहीं है बल्कि कार्य और दुराशय दोनों मिलकर ही दंडनीय अपराध की रचना करते हैं ( Act and Intent both constitutes the guilt) ।

 

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लोर्ड केनी का कहना है कि आशय से और कार्य मिलकर ही अपराध का सृजन करते हैं । अतः कोई भी व्यक्ति अपराधी कार्य के लिए उस समय तक दोषी सिद्ध नहीं किया जाता जब तक कि वह उसकी अपराधिक दुर्भावना प्रमाणित ना हो जाए।

 

अतः यदि व्यक्ति को अपराधी ठहराना है तो यह दिखाना आवश्यक है कि उसने आमुख काम किया है और दूसरा वह कार्य दुरशय से के साथ किया था ।




अतः दोष सिद्धि के लिए निम्नलिखित दो तत्वों का होना आवश्यक है।

 

दोषपूर्ण कार्य (wrongful act) :- जस्टिस brayan ने कार्य की ओर संकेत करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के विचारों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि मनुष्य के मन की बात शैतान (Devil) भी नहीं जान सकता।  इसलिए कानून व्यक्ति के विचारों में क्या है इस पर दृष्टि नहीं डालता बल्कि उसने जो कुछ किया है उस पर नजर रखता है।  लॉर्ड कैनिंग ने इस बात को एक बड़े ही अच्छे उदाहरण से स्पष्ट किया है।

 

“एक व्यक्ति क्लब के स्टैंड से छाता चुराने के विचार से एक छाता उठाता है लेकिन यह छाता उसी का निकलता है ऐसी स्थिति में उस पर अपराधिक दायित्व नहीं लादा जा सकता हालांकि उसकी इच्छा छाता चुराने की ही थी। ‘




इसका कारण यह है कि यह केवल चोरी करने हेतु एक अपराधी विचार ही था जो कार्य रूप में परिणित ना हो सकने के कारण बाह्य कार्य (overt act) की श्रेणी में नहीं आता उसने चोरी का अपराध नहीं किया।

 

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Mens Rea दुराशय :- अपराधिक दायित्व के निर्धारण के लिए दूसरा आवश्यक तत्व दुराशय से है कोई कार्य ना कि विचार उस समय तक अपराध नहीं माना जाता जब तक कि वह करता द्वारा दोषपूर्ण आशय से प्रेरित होकर ना किया गया हो। दूसरे शब्दों में किसी कार्य को करते समय यदि करता का विचार तथा आवेशित है तो वह अपराध की श्रेणी में नहीं आ सकता।

 

उदाहरण :- यदि आ शिकार हेतु जंगल में जाकर किसी जानवर को मारने के धोखे में किसी व्यक्ति को जान से मार देता है तो उ ऐसी स्थिति में वह हत्या का दोषी नहीं होगा क्योंकि मारते समय उसका आशय किसी व्यक्ति की हत्या करने का नहीं था बल्कि केवल जानवर का शिकार करना था इसलिए अपराधी विचार के अभाव में आप किसी अपराध का दोषी नहीं है।




भारतीय दंड प्रणाली में दुराशय Mens rea को किस सीमा तक मान्यता दी गई है।

 

भारतीय दंड संहिता में दुराशय Mens rea को अधिक महत्वता नहीं दी गई है इसमें विभिन्न धाराओं में जो विभिन्न अपराधों की परिभाषाएं दी गई है उसमें अपराधियों को निश्चित करते हुए जैसे ‘जानते हुए’ (Knowingly) ‘आशय (Intentionally)’ ‘बेईमानी से  (Dishonestly) “कपट पूर्वक ढंग से (Fraudulently)’ आदि शब्दों को शामिल किया गया है।  जिनमें स्वता ही अपराध के लिए दुराशय Mens rea की मनोवृति के तत्व को विद्वान होने का ज्ञान होता है।  इसलिए स्पष्ट है कि अधूरा से ही कोई काम अपराध बनता है अथवा नहीं। Mens rea का यह नियम है कि जो व्यक्ति अपराधी विचार रखने के अयोग्य है वह सदा ही अपराधिक दायित्वों से मुक्त रहते हैं।

 

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ऐसे व्यक्तियों की चर्चा दंड संहिता के सामान्य अपवाद नामक अध्याय में विस्तृत रूप से की गई है। उदाहरण के लिए विकृत चित्त (Unsound Mind), नशा किए हुए व्यक्ति, ड्रंकन, तथा 7 वर्ष से कम आयु की अवस्था वाला व्यक्ति द्वारा किया गया काम अपराधिक काम नहीं माना जाता।  क्योंकि इन अवस्थाओं में दिमाग में अपराध करने का दुराशय नहीं होता। इसी प्रकार तथ्य की भूल दुर्घटना व्यक्तिगत सुरक्षा सामान्य काम न्यायिक कार्य आदि के अंतर्गत किया गया कार्य दुराशय से ना होने के कारण क्षमा योग्य होता है धारा 76 से धारा 106 तक के अंतर्गत किए गए कार्य इसी आधार पर अपवाद हैं।

 

दुराशय के सिद्धांत के अपवाद -Exceptions to the Doctrine of Mens Rea

निम्नलिखित मामलों में अपराधिक दायित्व के लिए दुराशय का सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है 




  1. जहां अपराधी का कार्य लोक बाधा के अंतर्गत आता है।
  2. जहां संविधि (Statute) द्वारा पूर्ण या कठोर दायित्व निर्धारित किया गया हो।  कुछ मामलों में जनहित को ध्यान में रखते हुए अपराधी पर अमुक कार्य को करने या ना करने का कानून पूर्ण दायित्व आरोपित किया जाता है। जैसे हथियार रखना, मोटर चलाने या आवश्यक वस्तुएं बेचने आदि के लिए लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति उक्त कार्य बिना लाइसेंस के ही करता है तो उसका कार्य गैरकानूनी होगा। भले ही ऐसी अवहेलना के पीछे कोई दुराशय ना रहा हो।
  3. जब दुराशय का सिद्ध किया जाना कठिन हो तथा अपराध के लिए निर्धारित दंड बहुत छोटी धनराशि हो।
  4. जहां स्थापनापन दायित्व का सिद्धांत लागू होता हो।

 

इस तरह से यह स्पष्ट है कि इन सभी उपवादों को छोड़कर शेष सभी मामलों में अपराधी विचार के बिना किए गए कार्यों के लिए किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। इस बात का प्रमाण हमें दंड संहिता में दिए गए सामान्य अपवाद नामक अध्याय से मिलता है।




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इस अध्याय में यह घोषित किया गया है कि यदि कोई अपराधिक कार्य तथ्य के भूल, दुर्घटना, सहमति, सामान्य कार्य और व्यक्ति सुरक्षा के संबंध में अपराधी विचार के बिना किया गया है तो ऐसा काम अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

 

धारा 81 के अनुसार कोई बात केवल इस कारण अपराध नहीं है कि वह यह जानते हुए कि गई है कि उस से हानि होना संभव है यदि वह हानी करने के किसी अपराधिक आशय से बिना और व्यक्तिगत संपत्ति को अन्य आने का निवारण या परिवर्तन करने के उद्देश्य से सद्भावपूर्वक की गई हो।

 

स्पष्टीकरण

 

ऐसे मामले में यह तथ्यों का प्रश्न है कि जिस खाने का निवारण या परिवर्तन किया जाना है क्या वह ऐसी प्रकृति की है  कि वह कार्य है जिससे वह जानते हुए कि उस से हानि होना संभव है करने की जोखिम उठाना न्यायोचित या समाज योग्य है था।  यदि हानि वास्तव में ऐसी खतरनाक प्रकृति की थी जिस को दूर करना यह जानते हुए कि वह उस कार्य से व्यक्ति विशेष की हानि होना संभव है तो ऐसी जोखिम उठाना भी न्याय उचित होगा।

 

उदाहरण के लिए

 

  1. क एक बड़े अग्नि कांड के समय आग को फैलने से रोकने के लिए मकान को गिरा देता है। इस कार्य को मानव जीवन या संपत्ति को बचाने के आशय से सदभावना पूर्वक करता है यहां यदि यह पाया जाता है कि निवारण की जाने वाली हानि इस प्रकृति की और इतनी खतरनाक थी कि क का कार्य शमा योग्य है तो क किसी अपराध का दोषी नहीं होगा( सेक्शन 81) .
  2. या को एक शेर उठाकर ले जाता है यह जानते हुए कि संभव है कि गोली लगने से या मर जाए किंतु या का वध का आशय ना रखते हुए और सदभावना पूर्वक या के लाभ के आने से उस भाग पर गोली चलाता है का की गोली से या को मृत्यु कारित चोट लग जाती है का ने कोई अपराध नहीं किया (सेक्शन 92 )|.
  3. क एक शल्य चिकित्सक एक रोगी को सदभावना पूर्वक यह सूचित करता है कि उसकी राय में वह जीवित नहीं रह सकता इस आघात के फलस्वरूप उस रोगी की मृत्यु की जाती है का ने कोई अपराध नहीं किया है यदिपि वह जानता था कि सूचना से उस रोगी की मृत्यु होना संभाव्य है।




निष्कर्ष

 

संक्षेप में उक्त वर्णन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि न्यायालय किसी भी मामले में अपराधी को उसके अपराधी विचार मेंस रिया (Mens Rea) सिद्ध किए बिना दंड नहीं दे सकता। जब तक कि अपराधी विचार को विधि या कानून के द्वारा स्पष्ट रूप से अपराध की परिभाषा से अलग ही ना कर दिया गया हो।

 

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