Delhi High Court Judgement – मामले की समय सीमा ख़तम हो जाने के बाद संज्ञान ले सकते है

Delhi High Court Judgement - मामले की समय सीमा ख़तम हो जाने के बाद संज्ञान ले सकते है
Delhi High Court Judgement - मामले की समय सीमा ख़तम हो जाने के बाद संज्ञान ले सकते है
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दिल्ली हाईकोर्ट ने (SHUBHAM BANSAL vs THE STATE ( GOVT OF NCT OF DELHI) & ANR) मामले में फिर कहा है कि किसी मामले की समय सीमा के बीत जाने के बाद भी मजिस्ट्रेट उसका संज्ञान ले सकता है, लेकिन ऐसा करते हुए मामले में देरी क्यों और किन परिस्थितियों में हुई और इसके तथ्यों के बारे में न्याय के हित में मजिस्ट्रेट को आश्वस्त होना होगा।

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वर्तमान मामले में एक लॉ इंटर्न ने आईपीसी की धारा 509 और आईटी अधिनियम की धारा 66A के तहत माला दर्ज किया था। उसका आरोप था कि उसके नाम पर एक फर्जी फेसबुक खाता खोला गया और ऐसा करने के लिए इसमें उसके नाम, उसकी पहचान और नंबर का प्रयोग किया गया। श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण निचली अदालत ने आरोपी के खिलाफ उस धारा में लगाए गए आरोप रद्द कर दिए। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईटी अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक बताया था।

 

धारा 509 का विवरण

जो कोई किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के आशय से कोई शब्द कहेगा, कोई ध्वनि या अंग विक्षेप करेगा, या कोई वस्तु प्रदर्शित करेगा, इस आशय से कि उस स्त्री द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनि सुनी जाए, या ऐसा अंगविक्षेप या वस्तु देखी जाए, अथवा उस स्त्री की एकान्तता का अतिक्रमण करेगा, तो उसे किसी एक अवधि के लिए साधारण कारावास की सजा जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दंड, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

लागू अपराध

सी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के आशय से कोई शब्द कहना या अंगविक्षेप करना।
सजा – तीन वर्ष साधारण कारावास या आर्थिक दंड या दोनों।
यह एक जमानती, संज्ञेय अपराध है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

यह अपराध न्यायालय की अनुमति से पीड़ित महिला (जिसकी लज्जा का अनादर या एकान्तता का अतिक्रमण हुआ है) द्वारा समझौता करने योग्य है।

आईटी एक्ट को 2000 में पास किया गया था. पर उस वक्त विवादास्पद धारा 66(A) को शामिल नहीं किया गया था. 2008 में इस एक्ट में संशोधन करके धारा 66(A) को जोड़ा गया जो फरवरी 2009 में लागू हो गया.

यह धारा इलेक्टॉनिक डिवाइसेज पर आपत्तिजनक कंटेट पोस्ट करने के संबंध में है. इसके तहत दोषियों को तीन साल की जेल या 5 लाख रुपये का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

आईटी अधिनियम की धारा 66A में लिखा है….

“कोई शख्स जो कंम्प्यूटर या फिर कम्युनिकेशन डिवाइस के जरिए भेजता है”

1) कोई भी ऐसी सूचना जो आपत्तिजनक हो या फिर जिसका मकसद चरित्रहनन का हो.

2) कोई भी सूचना जो झूठी है, पर इलेक्टॉनिक डिवाइसेज के जरिए उस सूचना का इस्तेमाल किसी शख्स को परेशान करने, असुविधा पहुंचाने, खतरा पैदा करने, अपमान करने व चोट पहुंचाने के लिए किया जाए.

3) कोई भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मैसेज, जिसके जरिए किसी को व्यर्थ परेशान करने या उसके लिए समस्याएं बढ़ाने के लिए किया जाए. तो ऐसा करने वाले शख्स को जेल भेजा जाएगा. दोषी को दो-तीन साल की सजा हो सकती है साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

यदि कोई व्यक्ति ऐसा करते हुए पाया जाता है तो पुलिस उसे 66A के तहत गिरफ्तार कर उसे कोर्ट में पेश कर सकती है. इसके साथ ही उस पर संबंधित मामले में उपयुक्त अन्य धाराएं जोड़ कर भी मुकदमा चला सकती है

निचली अदालत ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 509 के तहत लगाए गए आरोपों को भी निरस्त कर दिया, क्योंकि चालान एक साल की निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल नहीं किया गया था। इस धारा के तहत सिर्फ एक साल की सजा का प्रावधान है। इसके बाद शिकायतकर्ता ने एएसजे के समक्ष एक पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसमें उसने कहा कि 2015 में चालान 2012 में हुए एक मामले में समन के सिलसिले में दायर किया गया था और यह भी कहा कि इस मामले में आईटी अधिनियम की धारा 67 और 67A भी लागू हो सकती है। यह बताया गया कि आईपीसी के तहत कुछ अपराधों की श्रेणी में भी यह आता है। उसने अपनी दलील में कहा कि सीआरपीसी की धारा 468 और धारा 473 के तहत मामले में हुई इस देरी को अदालत माफ़ कर सकती है। ((SHUBHAM BANSAL vs THE STATE ( GOVT OF NCT OF DELHI) & ANR))

एएसजे ने मामले को मजिस्ट्रेट को भेज दिया जिसने इस पर सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत इसका संज्ञान लिया और जांच अधिकारी को इस बारे में स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा। एएसजे के इस आदेश को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी जिस पर अब सुनवाई हो रही है। याचिकाकर्ता ने कहा कि चूंकि आईटी अधिनियम की धारा 66A को खारिज कर दिया गया है इसलिए अब इस मामले में समय-सीमा पर गौर करने की प्रारंभिक जरूरत भी नहीं है। यह भी कहा गया कि सेशन जज ने सीआरपीसी की धारा 468/473 के प्रावधानों को नजरअंदाज किया और देरी को माफ़ किये जाने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया गया है। (समय सीमा ख़तम हो जाने के बाद संज्ञान)

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न्यायमूर्ति सुरेश कैत की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता (SHUBHAM BANSAL vs THE STATE ( GOVT OF NCT OF DELHI) & ANR) के इन दावों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आगे की जांच कराने के अदालत के निर्देश पर कोई रोक नहीं है। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 156, धारा 173(2) और (8) के साथ पढ़ें और धारा 210 विधायी मंशा को स्पष्ट करते हुए यह साफ़-साफ़ कहती हैं कि जब किसी मामले में प्रोटेस्ट पिटीशन जिसमें मामले की उचित जांच का आग्रह किया गया है, वह सुनवाई के लिए लंबित है, यह जरूरी है कि जांच अधिकारी मजिस्ट्रेट के लंबित मामले में आने वाले निर्देश तक जांच रिपोर्ट पेश नहीं करे। (समय सीमा ख़तम हो जाने के बाद संज्ञान)




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