विधिशास्त्र कानून का क्षेत्र है इस कथन की समीक्षात्मक व्याख्या कीजिये

विवेचना कर बताइए कि विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान | Jurisprudence is the Philosophy of Law or Knowledge of Law
विवेचना कर बताइए कि विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान | Jurisprudence is the Philosophy of Law or Knowledge of Law
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विधिशास्त्र कानून का क्षेत्र:- किसी भी विषय का एक आधार होता है। एक प्रेरणा होती है। जिसके चारों और उनका ताना-बाना बुना जाता है। कानून कोई अपवाद नहीं है। कानून विधिशास्त्र का शरीर है। विधिशास्त्र उसकी आत्मा है। विधिशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण कार्य विधि की उत्पत्ति विकास एवं समाज में किए जाने वाले योगदान का अध्ययन होता है। समाज से संबंधित महत्वपूर्ण और निकट का विषय विधि ही है। जिसके अभाव में हम एक शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित समाज की कल्पना तक नहीं कर सकते।
राष्ट्रीय जीवन में विविध पक्षों में संकलन का मूल आधार विधियां होती हैं। इसके द्वारा ही राज्य अस्तित्व का निर्धारण राष्ट्रीय कार्यों का संचालन और व्यक्तिगत अधिकारों और दायित्वों का पालन संभव है। जन्म, विवाह, मृत्यु, उत्तराधिकारी, आचरण और अन्य जन्य सामाजिक संबंध विभिन्न विधियों द्वारा संचालित और नियंत्रित होते हैं। नागरिक जीवन में विधि का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। विधि का पालन करने वाला व्यक्ति अनुशासित नागरिक कहलाता है। और पालन ना करने वालों को दंडित किया जाता है। इसीलिए विधि का सुचारू रूप से पालन करने के लिए यह आवश्यक है, कि केवल प्रत्येक व्यक्ति को न केवल विधि का सम्यक रूप से ज्ञान हो बल्कि समय पर उसमें होने वाले संशोधन और परिवर्तनों की भी सूचना मिलती रहे। इस कार्य को विधिशास्त्र बड़ी सरलता से करता है।




 प्रसिद्ध विधिशास्त्र पैण्टन के अनुसार विधिशास्त्र विधि के अध्ययन का एक ढंग है। किसी देश- विदेश के कानून का नहीं वरन् स्वयं विधि की धारणा का  (  Jurisprudentia is a particular method of study not of the law of one country, but of the general nation of law itself.)    चूंकि विधिशास्त्र समाज को नियमबद्ध करने का प्रयास है। अतः इसे विधि का नेत्र कहा जा सकता है।।।

विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान- विधिशास्त्र कानून का क्षेत्र

विज्ञान एवं दर्शन एक ही धरातल पर स्थित ऐसे दो बिंदु है। जो एक दूसरे को अनुपूरक दृष्टि से देखते हैं। किसी क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। और विज्ञान की सूचना विवेचना को दर्शन की संज्ञा दी जाती है। जब हम विधिशास्त्र के लिए इसके मूल शब्द जूरिप्रूडेंशिया की व्युत्पत्ति पर दृष्टिपात करते हैं। तो अर्थअनुसार विधिशास्त्र विधि का ज्ञान है। दूसरी ओर अल्पियन की विधि शास्त्र की परिभाषा इसे दैवी और मानवीय बातों का ज्ञान   (The knowledge of things,  divine and human) सही और गलत का  विज्ञान( The science of right and  wrong)     कहती है। तो सूचना दर्शन सामने उपस्थित हो जाता है।




 यदि हम सूक्ष्म में विवेचना करें तो हम पाते हैं। कि विधिशास्त्र को  प्रसिद्ध विधि व्यक्ता ऑस्टिन ने वास्तविक विधि का दर्शन कहा। उनके इस परिभाषा से  भ्रम उत्पन्न हुआ। क्योंकि दर्शनशास्त्र वस्तुओं के मानवीय एवं दैवीय तत्व के बारे में सबसे अधिक सामान्य सिद्धांतों की चर्चा करता है। जबकि विधिशास्त्र केवल मनुष्य द्वारा अपनाए गए कानूनों के सामान्य सिद्धांतों तक ही अपने को सीमित रखता है।
परंतु इसके बावजूद भी विधिशास्त्र स्वयं को दर्शन से पृथक नहीं रख सकता। आधुनिक विधिशास्त्र सामाजिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र दोनों पर अपना अधिकार रखता है। विधिशास्त्र कानून का क्षेत्र
 जब हम अन्य अनेक सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन करते हैं, तो पहला प्रश्न उनकी वैज्ञानिकता का ही उठता है। वह समाजशास्त्र हो अर्थशास्त्री या राजनीतिक शास्त्र का सभी इस द्वन्द्व से बाहर निकलने के लिए अपना रूप प्रदर्शित करते हैं। वास्तव में सभी शास्त्र वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे उतरे हैं। उनकी वैज्ञानिकता को नकारा नहीं जा सकता। उनके अध्ययन की क्रमबद्ध विधि विज्ञान के समस्त आवश्यकताओं को पूरा करती है। फिर विधिशास्त्र कोई इंद्रियतीत विज्ञान अथवा शास्त्र नहीं है। इसीलिए हालैंड ने इसे विध्यत्मक की विधि का प्रकृति विज्ञान कहा है। क्षेत्र में सामान्य द्वारा दी गई विधिशास्त्र की परिभाषा सारे विवाद को समाप्त कर देती है। सामण्ड विधिशास्त्र को विधि का विज्ञान कहकर परिभाषा करता है।

अतः विधिशास्त्र को भी विज्ञान माना जा सकता है। इसके अलावा विधिशास्त्र को विज्ञान मानने के निम्न कारण भी हैं।

1- विधि शास्त्र के अध्ययन को क्रमबद्ध वैधानिक पद्धति के आधार पर किया जाता है।
2-क्रमबद्ध अध्ययन के उपरांत उसके परिणाम निकाले जाते हैं। लेकिन विधिशास्त्र को इसलिए विज्ञान के उपयुक्त नहीं माना जाता, कि उसकी विषय वस्तु व्यक्ति है। जो कि विचार और भावना प्रधान है, अतः व्यक्तियों के कार्य और  संव्यवहार की प्रकृति के निरंतर बदलते रहने से कोई शाश्वत और सार्वभौमिक नियम नहीं बनाए जा सकते। जैसे कि अन्य पार्थिव विज्ञानों में जैसे रसायन शास्त्र या भौतिक शास्त्र में बनाए जाते हैं।
यह भावना पूरी तरह सही नहीं है। क्योंकि मानव  संव्यवहार भी पूरी तरह असीमित नहीं होती। उन पर समाज में नियमों और व्यापदाओ का अंकुश होता है। इसीलिए शायद समाजवादी स्कूल में यथार्थवादी गुण ने विधि को विज्ञान माना। अतः मानव पहलुओं का जिनसे विधि का संबंध है। अगर गहराई से अध्ययन करने के लिए कोई व्यक्तियुक्त वैज्ञानिक प्रणाली अपनाई जाए तो मानव विज्ञान के संबंध में यही निष्कर्ष निकलेंगे। जो कि अन्य विज्ञानों में होते हैं। अतः इसी से स्पष्ट हो जाता है, कि विधिशास्त्र को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाना ही उचित है।।।।




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