John Austin’s Theory of Jurisprudence | जॉन ऑस्टिन का विधिशास्त्र का सिद्धांत बताये

 John Austin's Theory of Jurisprudence | जॉन ऑस्टिन का विधिशास्त्र का सिद्धांत बताये
 John Austin's Theory of Jurisprudence | जॉन ऑस्टिन का विधिशास्त्र का सिद्धांत बताये
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 John Austin’s Theory of Jurisprudence | जॉन ऑस्टिन का विधिशास्त्र का सिद्धांत बताये

 

विधिशास्त्र केवल विधि की विषय वस्तु से ना कि उसके आदेशात्मक रूप से संबंध रखता है। आस्टिन के इस मत की व्याख्या कीजिए क्या विधिशास्त्र की परिभाषा भारत के लिए उपयोगी है-

 

ऑस्टिन के उपर्युक्त मत की व्याख्या करने से पूर्व आवश्यक  हो जाता है कि उन परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए जो उससे पूर्व थी और उस के पश्चात हुई थी यह कारण स्पष्ट है कि किसी भी विषय की व्याख्या परिस्थिति जन्य होती है। और सभी परिस्थितियों का  एकत्रीकरण करके व्याख्या को सुगम बनाया जाता है। पूर्व में किसी भी विषय के पृथक अस्तित्व के संबंध में अनेक भ्रांतियां उत्पन्न होती थी। क्योंकि अधिकांश विषय एक से ही होते थे। अरस्तु भौतिक शास्त्र, नीतिशास्त्र ,काव्यशास्त्र का अध्ययन किया था। परंतु उन सब विषय का स्पष्ट विभाजन ना होने के कारण सब को सामूहिक रूप से दर्शनशास्त्र कहा जाता था। इसमें विधिशास्त्र भी सम्मिलित था।

 

यूनानिओं ने विश्व को प्राकृतिक विधि अवगत कराया परंतु उनकी विधि में धर्म नीति तथा विधान में कोई अंतर नहीं था। वह भी दर्शनशास्त्र की एक संहिता लगती थी। क्योंकि उसमें धर्म नीति तथा विधान में कोई स्पष्ट अंतर नहीं था, अतः एक दृष्टिकोण से उनकी विधि शास्त्र का जनक नहीं कह सकते।




विधिशास्त्र 13वीं शताब्दी में धर्म शास्त्र के रूप में अस्तित्व में आया जिसके फलस्वरूप उनके  सम्मिश्रण से धार्मिक दंड प्रणाली का सूत्र पात्र हुआ। बाद में 16वीं शताब्दी में धर्मानुसार आंदोलन के कारण विधिशास्त्र को धर्मशास्त्र से अलग कर दिया गया। राज्य की विधियों को देवी स्वरूप में माने जाने का क्रम 18वीं शताब्दी तक चला इसका समर्थन बेन्थन  ने किया। परंतु ब्लैकस्टोन ने इसका विरोध करते हुए लिखा कि जब किसी विधि को राज्य की स्वीकृत मिल जाए चाहे वह देवी नियमों के विपरीत हो नागरिक उसका पालन करने के लिए बाध्य हैं। अतः बेन्थन के बाद विधिशास्त्र धर्मशास्त्र के बंधन से मुक्त हुआ और उसे अंतर्राष्ट्रीय विधि से संबंधित किया गया।

ऑस्टिन जिसने विधि को संप्रभुता का आदेश माना उनके अनुसार विधिशास्त्र के लिए धार्मिक स्वीकृत अनिवार्य नहीं बल्कि उसका निर्माण करने वाले सर्वोच्च सत्ता की स्वीकृत ही पर्याप्त है।

 

 वर्तमान काल द्रुतगति से परिवर्तन की यातना झेलता हुआ काल है। और इस युग में विधि की परिभाषा और स्वरूप को एक ही सिद्धांत पर आधारित नहीं किया जा सकता मान्यताएं समाज के साथ ही परिवर्तित होती हैं और परिवर्तन के साथ उससे जुड़ी हर वस्तु में परिवर्तन आ जाता है। जैसे आजकल विधिशासन को सामाजिक शास्त्र माना जाता है।

 

जिसमें नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्य से संबंधित व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है। अतः इनके अध्ययन में कार्य और संबंधों की ही प्रधानता है।




 विधिशास्त्र निम्न तीन प्रकार के नियमों का अध्ययन करता है-

 

1- धार्मिक नियम- नैतिक नेम समाज के उचित अनुचित पर आधारित होते हैं जिनका उल्लंघन राज्य द्वारा वर्णित नहीं होता।

2- नैतिक नियम- नैतिक नियम समाज के उचित अनुचित पर आधारित होते हैं। जिनका उल्लंघन राज्य द्वारा वर्णित नहीं होता।

3- वैधानिक नियम – जो राज्य द्वारा बनाए विधानो पर आधारित होते हैं, जिनका उल्लंघन करने पर राज्य दंडित करता है। इसी नियम को ऑस्टिन ने स्पष्ट विधि कहा है। जो राज्य के नागरिकों पर लागू होता है।

वर्तमान विधिशास्त्र को हम भारत जैसे प्रगतिशील देश के लिए उपर्युक्त नहीं कह सकते। क्योंकि विधिशास्त्र ज्यों के त्यों नियम का संकलन है। बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों और मान्यताओं के कारण विधि में परिवर्तन शीलता के तत्व समाहित होना चाहिए। दंडविधान, संपत्ति अंतरण अधिनियम प्रथा तथा अन्य विधियों के धर्म और नैतिकता वाले पहलुओं को आदेशात्मक मोड़ देना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा विधिशास्त्र एक कोरा अध्ययन मात्र रह जाएगा। ऑस्टिन का एक यह मत सही है, कि विधिशास्त्र केवल विधि की विषय वस्तु से ना कि उसके आदेशात्मक रूप से संबंध रखता है।

ऑस्टिन के प्रभुसत्ता सिद्धांत की समीक्षा कीजिए आप उससे कहां तक सहमत हैं। अपने विचारों के प्रति भारत वर्ष इंग्लैंड व अमेरिका के संविधान ओं के आधार पर पुष्टि कीजिए-

 

सुप्रसिद्ध विधि शास्त्री ऑस्टिन का प्रभुसत्ता का सिद्धांत किसी समाज में एक सर्वोच्च सत्ताधारी के अस्तित्व को स्वीकार करता है। जिनके आदेश ही यहां के लोगों के लिए कानून होते हैं। जो आदेशात्मक विधि भी कहे जाते हैं।

 

 इसके आगे भी ऑस्टिन प्रभुसत्ताधारी को परिभाषित करता है। आस्टिन की प्रमुख सत्ताधारी को परिभाषा के अनुसार यदि एक निश्चित मानव श्रेष्ठ अपने समान किसी दूसरे मानव श्रेष्ठ की आज्ञा पालन करने का अभ्यस्त ना हो बल्कि एक बहुत संख्या समाज में अपनी आज्ञा का पालन कर आता हो ऐसा मानव श्रेष्ठ उस समाज का प्रभु सत्ताधारी है। तथा वह समाज राजनैतिक व  स्वतंत्र समाज है।




उपर्युक्त सिद्धांत में तीन बातें अंतर्निहित हैं-

 

1-निश्चित समाज

 2-  श्रेष्ठ मानव

 3- समाज द्वारा किसी आज्ञा का स्वभावतः का पालन।

 इसका तात्पर्य है कि किसी समाज में स्वेच्छा से लोगों द्वारा अपने सारे अधिकार एवं सर्वोच्च सत्ता को समर्पित कर दिए जाते हैं। तथा प्रमुख सत्ताधारी के आदेश कानून कहलाते हैं। ऑस्टिन के अनुसार ऐसे कानून का पालन इसीलिए होता है, कि उसके पीछे राज्य की सर्वोच्च शक्ति होती है। और उलंघन होने पर दंड की व्यवस्था होती है अतः उसको शक्ति का सिद्धांत भी कहते हैं।

 

आलोचना-

 

अनेक विद्वानों ने ऑस्टिन के विचारों की आलोचना की है। इनमें से मुख्य सर हेनरी मेन का कथन है, कि आस्टिन का प्रभुसत्ता सिद्धांत सिर्फ पिछड़े हुए देशों में लागू माना जा सकता है। क्योंकि इन देशों में नीतियों और धार्मिक भावनाओं को अधिक महत्व दिया जाता है। विकसित एवं प्रगतिशील तथा सभी देशों में पूर्ण रूप से यह सिद्धांत लागू नहीं होता।

लौस्की व कोल  बहुलवादी होने के कारण राज्य को अनेक संस्थाओं की संस्था मानते हैं। उसके अनुसार राज्य के हाथों में सारी शक्ति सौंपी जा सकती है। कुछ अधिकार दूसरी संस्थाओं जैसे धार्मिक संस्था, व्यापार संघ, सामाजिक संस्थाओं को भी  होते हैं। किंतु उनका नियंत्रण अंततोगत्वा प्रभुसत्ता द्वारा ही होता है। ये संस्थाएं भी अधिकारों का अंतिम बिंदु नहीं है।

 

 विकसित एवं सभ्य देशों में कानून का पालन किसी आदेश के कारण अथवा दंड मिलने की वजह से नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है, कि उनके पालन में जन कल्याण का सार्वजनिक हित की भावना निहित होती है। नागरिकों का स्वेच्छा से सामूहिक समर्पण उन्हें यह अधिकार भी देता है। कि वे राज काज में अपना सहयोग दें। अतः वे लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करके राज्य के संचालन में अपना सक्रिय सहयोग देते हैं।

 

 

ऑस्टिन का प्रभुसत्ता सिद्धांत राज्य के अस्तित्व के यथार्थ वादी दृष्टिकोणों की अवहेलना करता है। क्योंकि राज्य का अस्तित्व सिर्फ प्रभु सत्ताधारी के कारण ही नहीं बनता बल्कि लोगों को सामूहिक रूप से रहने तथा संगठित समाज बनाने की भावना भी रहती है। जिसमें सार्वजनिक हित व जनकल्याण निहित होता है। प्रभुसत्ता सर्वशक्तिमान, सार्वभौमिक अथवा सर्वोच्च भी नहीं है। क्योंकि वह प्रत्यक्ष परोक्ष लिखित-  अलिखित स्पष्ट नियमों की सीमा में आबाध्य रहती है, उनका अतिक्रमण जनविरोधी होगा।

 

इंग्लैंड का संविधान और प्रभु सत्ता- इंग्लैंड में संसद विधि निर्माण के क्षेत्र में सर्वोच्च संस्था है। इसीलिए उसे प्रभुसत्ता संपन्न कह सकते हैं। उसके द्वारा किसी भी नए कानून का निर्माण हो सकता है। या कानूनों में उसे  जनहितार्थ संशोधन करने का पूर्ण अधिकार है। अथवा रद्द कर सकती है। और यहां तक सम्राट के उत्तराधिकारी अंतरराष्ट्रीय संबंध युद्ध घोषणा व शांति इत्यादि महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी कानून बना सकती है।

 

 विधि शास्त्री सामान्य के अनुसार इंग्लैंड में विधि निर्माण की प्रभुसत्ता सम्राट व संसद में है। और कार्यपालिका संबंधी प्रभुसत्ता केबल सम्राट में जो अपने क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्र है। अतः दोनों ही श्रेष्ठ हैं, और ऑस्टिन के सिद्धांत के विपरीत प्रभुसत्ता इंग्लैंड के संविधान में वास्तविक रूप में परिलक्षित नहीं होती है।

 

 भारत का संविधान- भारत के संदर्भ में सर्वोच्च सत्ता का अध्ययन अपने आप में एक सुरुचिपूर्ण विषय ।है भारत का संविधान संघात्मक है। यहां संविधान द्वारा प्रभुसत्ता व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका तीनों को स्वतंत्र रूप से दी गई है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय सरकार के अतिरिक्त राज्य सरकारें भी अपने अपने क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ताएं हैं।




 भारत के संविधान की एक और विशेषता है, कि कुछ आकस्मिक विपत्तियों के समय केंद्रीय सरकार को संसद द्वारा विशेष अधिकार दिए जाते हैं। तथा आपातकालीन स्थिति में संसद के विषयों पर एक कानून बना सकती है। तथा अन्य प्रमुख संस्थाएं मुख्य प्रभुसत्ता का अंश है। और कुछ विशेष परिस्थितियों में वह उसी में समाहित हो जाती है।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान- अमेरिका का संविधान का पूर्णतः लिखित व दृढ़ है। उसमें व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्रों को नामित कर दिया गया है। ना तो कांग्रेस को ही और ना राष्ट्रपति को कार्यपालिका का अध्यक्ष होने के बावजूद भी पूर्ण सर्वोच्च शक्ति प्राप्त है।

 

अमेरिका में संविधान की संशोधन प्रणाली को अत्यन्त  जटिल बनाया है।  अमेरिकी संविधान में संशोधन के लिए आवश्यक है, कि उसे संसद का दो तिहाई एवं राज्यों का तीन चौथाई बहुमत प्राप्त हो। अतः प्रभुसत्ता कांग्रेस में ना होकर संविधान में निहित है। जो अपने आदेश द्वारा राज्य विधानसभाओं एवं सर्वोच्च कार्यपालिका अध्यक्ष के अधिकारों का नियमन करता है।।।।

विधि प्रत्यक्ष विधान की देन नहीं है, वरन् प्रथाओं के मौन विकास के कारण है, या अनितित सार्वजनिक अथवा व्यवसायिक कार्यों के कारण उत्पन्न हुई।  विवेचना कीजिए-

 

सिवनी के शब्दों में विधि प्रत्यक्ष विधान का परिणाम नहीं है। वरन् या कुछ नियम और प्रथाओं को सहायता प्रदान करता है। उन्हें प्रदत नहीं करता इस प्रकार सेविनी और ऑस्टिन की विधि की परिभाषा में एक विरोधाभास दिखाई देता है। क्योंकि राष्ट्रीय विधि को संप्रभु का आदेश मानता है। जबकि सेविनी प्रभुसत्ता शक्ति को विधि को निर्मात्री नहीं मानता वरन् वह कानून की देन है।

 

 इसका एक सशक्त कारण यह है, कि सेविनी की विचारधारा पर ऐतिहासिक स्कूल का प्रभाव है। उपर्युक्त कथन उस बात की पुष्टि करता हूं। उनके अनुसार समाज में विधि का प्रारंभ एकदम अथवा किसी आदेश से नहीं हुआ है। परंपराओं के निरंतर और धर्म का विकास के कारण हुआ है। उसके अनुसार विधि मनुष्य के कार्य एवं व्यवहारों  का नियम है। जिसे राष्ट्रीय प्रथाओं ने मान्यता प्रदान कर दी .




प्रारंभ की सभी विधियां सेविनी के अनुसार रीतियों और परंपराओं पर आधारित थी। और उनकी कमियों को पूरा करके विधि का रूप देने का कार्यक्रम बनाकर देने की सत्यता और औचित्त या अनौचित चेतना द्वारा आभासित होती है। वह केवल व्यवस्थापिका के स्वीकृति का परिणाम नहीं है।  विधि की प्रकृति के इतिहास को सामाजिक व्यवहारों में ही पाया जा सकता है।

सिवनी ने यह भी कहा है कि विधि प्रथाओं को शांतिपूर्ण उत्थान के कारण हैं।

 

आलोचना-  सिवनी ने सार्वजनिक चेतना को विधि का आधार माना है। इसके साथ वे भूल जाते हैं, कि केवल राष्ट्रीय रिवाज,या प्रथाएं कोई भी नियम बनाने से पूर्व या आवश्यक है। कि वह प्रथा एक लंबे समय से मानी जाती रही हो, तथा प्रचलित विधियों से इसका विरोधाभास हो।।।।




 

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