Grounds of Judicial Separation in Hindi | न्यायिक पृथक्करण के आधार

Grounds of Judicial Separation in Hindi | न्यायिक पूथक्करण के आधार
Grounds of Judicial Separation in Hindi | न्यायिक पूथक्करण के आधार
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Grounds of Judicial Separation in Hindi | न्यायिक पृथक्करण के आधार | Section 10 Hindu Law|

 

तलाक के स्थान पर न्यायिक पृथक्करण (Judicial Separation instead of Divorce)– धारा 13 (A) के अनुसार यदि तलाक के लिये प्रार्थना-पत्र पेश किया गया है और न्यायालय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये यह उचित समझता है कि तलाक के स्थान पर न्यायिक पृथक्करण ही उचित है तो वह न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्रदान करेगा। किन्तु न्यायालय ऐसा निम्नलिखित आधारों पर नहीं कर सकता-




(i) धर्म परिवर्तन (Conversion) धारा 13 (ii)।

(ii) संसार परित्याग (Renunciation) धारा 13 (1) (vii)।

(iii) परकल्पित मृत्यु (Presumed Death) धारा (1) (Viii)।

पत्नी को प्राप्त विवाह विच्छेद के अतिरिक्त आधार (Additional grounds of divorce availatble to wife)

 

विवाह विधि संशोधन अधिनियम, 1976 के पारित होने के बाद एक पत्नी को अपने पति से तलाक लेने के चार अतिरिक्त आधार प्रदान किये गये हैं जो केवल पत्नी को ही प्राप्त हैं, पति को नहीं।




 न्यायिक पृथक्करण (Judicial Separation)

 

न्यायिक पृथक्करण का अर्थ है सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय द्वारा पति-पत्नी के साथ-साथ रहने के अधिकार को समाप्त करना। परन्तु ऐसी डिक्री या आदेश न पक्षकारों की हैसियत को प्रभावित करती है और न ही विवाह बन्धन को तोड़ती है। यह एक ऐसा सम्बन्ध विच्छेद है जो पति या पत्नी को एक दूसरे से अलग रहने के लिए प्राधिकृत करता है ।




जहाँ न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित हो गई है वहाँ पक्षकारों का यह कर्व्य नहीं होगा कि वे एक दूसरे के साथ सहवास करें। न्यायिक पृथक्करण विवाह के पक्षकारों को समझौता करने और पुनर्मिलन का अवसर प्रदान करता है। यदि समझौता हो जाता है तो उनके अधिकार एवं कर्त्तव्य पुनः जीवित हो जाते हैं। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि वे इस हेतु न्यायालय में आवेदन करें न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पक्षकारों के पुनर्मिलन की तिथि से निष्प्रभावी हो जाती है। यदि उक्त मिलन डिक्री पारित होने की तिथि से एक वर्ष या अधिक समय तक नहीं होता है तो यह विवाह विच्छेद का आधार बन जाता है।

 

न्यायिक पूथक्करण के आधार (Grounds of Judicial Separation) Section 10 Hindu Law

 

न्यायिक पृथक्करण के वही आधार हैं जो विवाह विच्छेद के हैं। ये आधार निम्नलिखित हैं-




  1. जारता (Adultery)– कि, प्रतिपक्षी ने विवाह सम्पन्न होने के बाद आवेदक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति साथ मैथुन किया है; अथवा
  1. क्रूरता (Cruelty)– कि, प्रतिपक्षी ने विवाह सम्पन्न होने के बाद आवेदक के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है; अथवा
  1. अभित्याग (Desertion)-कि याचिका प्रस्तुत करने के ठीक दो वर्ष पहले से लगातार प्रतिपक्षी ने आवेदक का अभित्याग कर रखा है;
  1. धर्मपरिवर्तन (Conversion)– कि प्रतिपक्षी दूसरे धर्म को अपना कर हिन्दू नहीं रहा है; अथवा
  1. विकृतचित्तता (Unsoundness of mind)– कि, प्रतिपक्षी का दिमाग असाध्य रूप से विकृत हो चुका है, या वह लगातार या बीच-बीच में इस प्रकार की दिमागी अव्यवस्था से पीड़ित हो रहा है कि आवेदक से युक्तियुक्त रूप से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह प्रतिपक्षी के साथ रहे।
  1. कोढ़ (Laprosy)– कि प्रतिपक्षी एक वर्ष से उग्र और असाध्य रूप से कोढ़ से पीडित हो रहा है; अथवा
  2. यौन रोग (Veneral Disease)- कि, प्रतिपक्षी रति-जन्य रोग से पीड़ित हो रहा है। अथवा
  3. संसार परित्याग (Renuciation of the world)- कि, प्रतिपक्षी ने संसार का परित्याग कर दिया है; अथवा
  4. प्रकल्पित मृत्यु (Presumed Death)– कि, प्रतिपक्षी सात वर्ष या उससे अधिक समसे उन लोगों के द्वारा जीवित नहीं सुना गया है जिन्होंने स्वाभावित रूप से ऐसा सुना होता यदी वह जीवित रहा होता।

 

पत्नी के लिये अतिरिक्त आधार (Additional Grounds for wife)-

 

धारा 13 (2) के अन्तर्गत पत्नी के लिये निम्नलिखित अतिरिक्त आधार उपबन्धित किये गये हैं-




(1) बहु विवाह (Bigamy)– कि इस अधिनियम के लागू होने के पहले सम्पन्न हुए विवाह की दशा में पति ने इस अधिनियम के लागू होने के पहले ही दूसरा विवाह फिर से किया था या इस अधिनियम के लागू होने के पहले की उसकी विवाहिता पत्नी आवेदक के साथ विवाह के समय जीवित थी; परन्तु यह किसी भी दशा में दूसरी पत्नी द्वारा याचिका प्रस्तुत करते समय जीवित है; अथवा

 

(2) पति द्वारा बलात्कार, गुदा मैथुन या पशुगमन (Rape, Sodomy or Bestiality by the husband)- कि, पति विवाह सम्पन्न होने के बाद, बलात्कार (rape), गुदा-मै थुन (Sodomy) या पशु मैथुन (bestiality) का दोषी रहा है; अथवा




(3) भरण-पोषण की डिक्री या आदेश (Decree or order for maintenance)- कि “हिन्दू दत्तक-ग्रहण तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956” की धारा 18 के अन्तर्गत दायर किये गये वाद में या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के अन्तर्गत दायर कार्यवाही में, जैसी भी दशा हो, पति के विरुद्ध डिक्री या आदेश पारित किया गया है और पत्नी को भरण-पोषण मंजूर किया गया है; भले ही वह अलग रही थी, और यह कि, ऐसी डिक्री या आदेश के पारित होने के समय से एक वर्ष या उससे अधिक समय तक दोनों पक्षों क बीच सहवास फिर से स्थापित नहीं हुआ है।

 

(4) यौवन का विकल्प (Option of Puberty)- कि, उसका विवाह (चाहे संभोग हुआ हो या नहीं) उसके 15 वर्ष की आयु पुरी करने के पहले ही सम्पन्न हुआ था और उस उम्र के पूरी होने पर किन्तु 18 वर्ष की आयु पूरी होने के पहले ही उसने उस विवाह को विखण्डित (repudiate) कर दिया है।




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