Govind Chhota bhai Patel vs. Patel Ramanbhai Mathur | उपहार या वसीयत में मिलि सम्पति स्वाअर्जित सम्पत्ति है

सुप्रीम कोर्ट का फैसला :- एक ही केस के लिए दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता | PREM CHAND SINGH Vs. THE STATE OF UTTAR PRADESH
सुप्रीम कोर्ट का फैसला :- एक ही केस के लिए दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता | PREM CHAND SINGH Vs. THE STATE OF UTTAR PRADESH
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सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि मिताक्षरा उत्तराधिकार कानून के अनुसार, पिता की स्वयं अर्जित सम्पदा यदि वसीयत/उपहार के तौर पर पुत्र को दी जाती है तो वह स्वयं अर्जित सम्पदा की श्रेणी में ही रहेगी और यह पैतृक सम्पत्ति तब तक नहीं कहलाएगी, जब तक वसीयतनामा में इस बारे में अलग से जिक्र न किया गया हो।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ गोविंदभाई छोटाभाई पटेल एवं अन्य बनाम पटेल रमणभाई माथुरभाई मामले में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर रही थी।

मामले की पृष्ठभूमि

छोटाभाई आशाभाई पटेल ने अपने पुत्र रमणभाई माथुरभाई पटेल के पक्ष में 1977 में उपहार विलेख तैयार किया था। छोटाभाई के दूसरे बेटों ने इस उपहार को चुनौती देते हुए इस सम्पत्ति में हिस्सा का दावा किया था।

1. उनका दावा था कि छोटाभाई ने वारिस के तौर पर अपने पिता (आशाभाई पटेल) से वह सम्पत्ति हासिल की थी, इसलिए वह पैतृक सम्पत्ति की श्रेणी में आती है।

2. दूसरी दलील यह भी दी गयी थी कि उपहार विलेख की तसदीक भी साबित नहीं हो पायी थी। हाईकोर्ट ने, हालांकि निचली अदालत के फैसले को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि वह सम्पत्ति पैतृक नहीं थी । साथ ही छोटाभाई को अपनी सम्पत्ति रमणभाई को उपहार के तौर पर देने का अधिकार था।

यह उस तथ्य पर आधारित था कि संबंधित सम्पत्ति छोटाभाई के पिता की स्वयंअर्जित सम्पत्ति थी। हाईकोर्ट के इस फैसले को शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर करके प्रतिवादी द्वारा चुनौती दी गयी थी।




सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सबसे प्रमुख प्रश्न यह था कि वारिस के तौर पर अपने पिता से हासिल की गयी यह सम्पत्ति क्या दानकर्ता (छोटाभाई) पैतृक सम्पत्ति थी?

 इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘सी एन अरुणाचल मुदलियार बनाम सी ए मुरुगनाथ मुदलियार’ (1953) के मामले में अपनी व्यवस्था दी हुई है। न्यायालय ने इस बात पर विचार करते हुए कि वसीयत के जरिये उपहार विलेख से प्राप्त पिता की स्वयंअर्जित सम्पत्ति में पुत्र किस प्रकार का अधिकार रखेगा।

व्यवस्था यह है कि मिताक्षरा पिता को अपनी स्वयं की अर्जित सम्पत्ति को किसी को देने का अधिकार है और इसके लिए उसपर कोई वंशज आपत्ति नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस तरह की वसीयत या उपहार के तौर पर दी गयी सम्पत्ति को पैतृक सम्पत्ति की श्रेणी में रखना संभव नहीं है।

न्यायालय ने आगे कहा कि पिता द्वारा अपने पुत्र को उपहार में दी गयी सम्पत्ति उपहार प्राप्त करने वाले के लिए सिर्फ पैतृक सम्पत्ति इसलिए नहीं हो जाती क्योंकि उसने अपने पिता या पूर्वज से उसे हासिल की है।

इस मामले में कोर्ट ने कहा,

“मिताक्षरा पिता को अपनी स्वयं की अर्जित सम्पत्ति को किसी को देने का अधिकार है और इस पर उसपर कोई वंशज आपत्ति नहीं कर सकता है, इस स्थापित कानून के मद्देनजर हम यह नहीं कह सकते कि पिता द्वारा अपने पुत्र को उपहार में दी गयी इस प्रकार की सम्पत्ति उपहार प्राप्त करने वाले (पुत्र) के लिए आवश्यक तौर पर पैतृक सम्पत्ति होनी चाहिए, सिर्फ इसलिए कि उपहार प्राप्त करने वाले ने अपने पिता या पूर्वज से उसे हासिल की है।

यह भी नहीं कहा जा सकता कि उपहार प्राप्त करने वाले के पुत्र उसमें हिस्सा के हकदार होंगे। इस मामले में न्यायालय ने पाया कि वादियों ने वसीयतनामा भी पेश नहीं किया था, जिसके जरिये दानकर्ता (छोटाभाई) ने अपने पिता से यह सम्पत्ति हासिल की थी। इसलिए यह निर्धारित करने का कोई और उपाय भी नहीं था कि वसीयतनामे में इस बात का जिक्र किया गया हो कि संबंधित प्रोपर्टी पैतृक प्रोपर्टी होगी या नहीं।

कोर्ट ने कहा, “आशाभाई पटेल ने यह सम्पत्ति खरीदी थी, इस अविवादित तथ्य के मद्देनजर वह (आशाभाई) किसी भी व्यक्ति को वसीयत देने के लिए अधिकृत थे। चूंकि उस वसीयत में लाभुक दानकर्ता के पुत्र ही थे और वसीयत में कोई अन्य इच्छा भी नहीं जतायी गयी थी, इसलिए सी एन अरुणाचल मुदलियार मामले के फैसले के आलोक में संबंधित सम्पत्ति स्वयंअर्जित सम्पत्ति की श्रेणी में आयेगी।”

सम्पत्ति को पैतृक सम्पत्ति साबित करना वादी की जिम्मेदारी

“संबंधित प्रोपर्टी को पैतृक सम्पत्ति साबित करने की जिम्मेदारी वादी की थी। वादियों को यह साबित करना था कि आशाभाई ने अपनी वसीयत में इस सम्पत्ति को परिवार के लाभ के लिए पैतृक सम्पत्ति की श्रेणी में रखने की इच्छा जतायी थी। इस तरह के किसी ठोस आधार या प्रमाण के अभाव में दानकर्ता की यह सम्पत्ति स्वयंअर्जित प्रोपर्टी की श्रेणी में आती है। और एक बार यदि संबंधित सम्पत्ति दानकर्ता के लिए स्वयं की अर्जित प्रोपर्टी साबित हो जाती है तो उसे किसी भी व्यक्ति को अपनी मर्जी के हिसाब से उपहार विलेख देने का अधिकार है, भले ही वह परिवार के लिए अजनबी ही क्यों न हो?

 जुलाई में दिये गये एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वारिस के तौर पर पुत्र द्वारा हासिल पिता की सम्पत्ति संयुक्त परिवार की सम्पत्ति होती है, लेकिन ऐसा केवल तभी होता है जब वारिस संबंधी वसीयत नहीं की गयी हो। यह मामला भिन्न है क्योंकि इस मामले में वसीयतनामा के जरिये सम्पत्ति उपहारस्वरूप दी गयी थी। इस मामले में भी, सुप्रीम कोर्ट ने श्याम नारायण प्रसाद बनाम कृष्ण प्रसाद एवं अन्य (2018) का विशेष हवाला देते हुए कहा, “उपरोक्त मामले में बंटवारे के बाद सम्पत्ति की स्थिति को लेकर सवाल उठे थे। यह सवाल इस मामले में नहीं उठ रहा है क्योंकि यह बंटवारे का मामला नहीं है, बल्कि उपहार प्राप्त करने वाले के पक्ष में वसीयतनामा का है।”





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