शून्यकरणीय विवाह क्या है | शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह में अंतर स्पष्ट कीजिए

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शून्यकरणीय विवाह क्या है:- धारा 12 शून्यकरणी विवाह के संबंध में उपबंधित हैं, इस धारा के अनुसार कोई भी विवाह, चाहे वह अधिनियम में लागू होने से पूर्व या बाद में संपन्न किया गया हो, निम्नलिखित आधारों पर शून्यकरणीय यह समझा जाएगा।

 शून्यकरणी विवाह विधि मान्य विवाह है, जब तक कि उसमें शून्यकरणीयता होने की डिक्री पारित ना कर दी जाए, वह वैध और मान्य विवाह रहता है। हिंदू विवाह में प्रावधान है, कि शून्यकरणी  विवाह, विवाह के पक्षकारों में से किसी भी एक प्रकार की याचिका द्वारा निर्धारित हो सकता है। यदि उनमें से एक प्रकार की मृत्यु हो जाए तो उस विवाह की शून्यकरणीयता के डिक्री पारित नहीं की जा सकती।
यदि विवाह के दोनों पक्ष कार जीवित हैं। और वह विवाह के शून्यकरणी घोषित कराने की कार्यवाही नहीं करते हैं। तो विवाह विधि मान्य होगा। विधि के अनुसार शून्यकरणी विवाह जब तक शून्यकरणी घोषित नहीं हो जाता, तब तक उसके अंतर्गत विधि मान्य विवाह के सब परिस्थितियों और सब अधिकार कर्तव्य और दायित्व जन्म लेते हैं। ऐसे विवाह से उत्पन्न संतान धर्मज होती है।

(1)  विवाह विधि संशोधन अधिनियम 1976 के पूर्व की स्थिति – शून्यकरणीय विवाह क्या है

प्रावधान के अनुसार विवाह के समय और उसके बाद भी कार्यवाही प्रारंभ करने के समय तक प्रत्युत्तर दाता नपुंसकता विवाह विधि अधिनियम 1976 के अनुसार भी शून्यकरणी विवाह के लिए नपुंसकता और को आधार बनाया गया है, किंतु उसे और भी सरल कर दिया गया है, संशोधन के पश्चात अगर प्रत्युत्तर दाता के नपुंसकता के कारण विवाह को पूर्णता नहीं दी जा सकती है। तो याची विवाह को शून्य घोषित करा सकती है।
(2)  प्रत्युत्तर दाता का मानसिक अस्वस्थ होना।
(3)  विवाह के लिए संपत्ति प्राप्त करने के लिए बल प्रयोग करना अथवा वैवाहिक संस्कार के संबंध में अथवा प्रत्युत्तर दाता के संबंधित किसी तात्विक तथ्य अथवा परिस्थितियों के संबंध में कपट का प्रयोग करके प्रार्थी की संपत्ति प्रदान करना।

बल अथवा कपट द्वारा संपत्ति- शून्यकरणीय विवाह क्या है

 किसी विवाह को शून्यकरणी करार देने के लिए तीसरी शर्त यह है, कि विवाह के प्रकार को बल प्रयोग अथवा कपट द्वारा प्राप्त होती है, नियमानुसार जहां के बल अथवा कपट द्वारा सम्मान प्राप्त की जाती है। वहां भी विवाह सुनने के लिए होता है।   धारा 12 में सामान्य नियम इस प्रकार दिया गया है, कि कोई विवाह डिक्री द्वारा भंग किया जा सकता है। यदि विवाह दो दशाओं को छोड़कर बल या कपट द्वारा संपन्न किया गया है। सामान्य नियम इस प्रकार है –
(I)   जहां धारा 5 के अंतर्गत विवाह में संरक्षण की स्वीकृति आवश्यक है, इस प्रकार की स्वीकृत बल अथवा कपट द्वारा प्राप्त की गई है, बाल विवाह निरोधक संशोधन अधिनियम संख्या (2)  1978 द्वारा या धारा बदल दी गई।
(ii)  याची के ऊपर बल को प्रयोग किया गया है। अथवा उसके साथ कपट पूर्ण व्यवहार किया गया है

अपवाद – इस नियम का एक अपवाद यह है, कि कोई भी याचिका विवाह को भंग करने के लिए बल अथवा कपट द्वारा सम्पत्ति प्रदान करने के आधार पर मंजूर नहीं की जाएगी यदि –

(I)  यथास्थिति बल प्रयोग समाप्त हो जाने अथवा कपट का पता चल जाने के 1 वर्ष की अवधि के बाद याचिका प्रस्तुत की गई हो अथवा
(ii)  यथास्थिति बल प्रयोग समाप्त हो जाने अथवा कपट का पता चल जाने के पश्चात याची पति अथवा पत्नी के रूप में अपनी पूर्ण सहमति के साथ रह रहा हो
कपट पूर्वक सम्मति प्राप्त करने से तात्पर्य है, कि प्रत्युत्तर दाता के संबंध में गलत बातें कहकर अथवा आवश्यक बातों का को गोपनीय रख कर अथवा याची को अन्य किसी प्रकार से धोखा देकर संबंध प्राप्त की गई हैं। राजिन्दर सिंह बनाम श्रीमती प्रमिला, के मामले में न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया, कि जहां पति ने पहले संपन्न हुए अपने विवाह की बात छुपाई है। और पत्नी के पिता द्वारा विवाहार्थ किए गए विज्ञापन के उत्तर में अपनी वैवाहिक स्थिति अथवा अपने पूर्व विवाह के तलाक की बात छिपाई हो। वहां पत्नी इस बात पर धारा 12 (1)  (सी) के अंतर्गत विवाह की अकृत डिक्री प्राप्त कर सकती है। क्योंकि वैवाहिक स्थिति का छुपाया जाना दूसरे पक्षकार को विवाह के लिए निर्णय लेने में एक महत्वपूर्ण विचारक हो सकता है
बाल विवाह अधिनियम 1978 के बाद कन्या के बाद, विवाह के लिए उसकी आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। अत अबएव संरक्षक की सहमति का प्रश्न समाप्त हो गया है? धारा 12 (अ)  के अंतर्गत अब विवाह बल प्रयोग अथवा कपट पूर्ण सहमति के आधार पर तभी शून्य घोषित करवाया जा सकता है। जब इस प्रकार की सहमति उपर्युक्त 1978 के अधिनियम के पूर्व ली गई हो।

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विधि के अनुसार किसी बीमारी को छिपाने मात्र से विवाह को रद्द कराने का अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता, जब तक बीमारी इस प्रकार की ना हो जो इस धारा 13 के अंतर्गत हो,  जहां यह तथ्य छिपाया गया हो, कि वधू यक्ष्मा की  व्याधि से पीड़ित रही है। वहां विवाह को रद्द कराने के लिए पर्याप्त ना होगा।
पत्नी का अन्य व्यक्ति के संभोग से गर्भवती होना-धारा 12 (1-d)  के अनुसार यदि कोई पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति जो उसका पति ना हो जिसे संभोग करके गर्भवती होती है, तो विवाह शून्य कराया जा सकता है।

पत्नी के गर्भवती होने के आधार पर विवाह की अकृतता की डिक्री प्राप्त कर करने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए।

1- प्रत्यर्थी विवाह के समय गर्भवती थी।
2- प्रत्यर्थी याची से भिन्न किसी व्यक्ति से गर्भवती थी।
3- याची विवाह के समय प्रत्यर्थी के गर्भवती होने के तथ्य से अनभिज्ञ था।
(4)  यदि अकृत के लिए आवेदन हिंदू विवाह अधिनियम  प्रारंभ के पूर्ण अनुष्ठापित विवाह के लिए है, तो अधिनियम के प्रारंभ के 1 वर्ष के भीतर और अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात अनुष्ठापित विवाहों की दशा में विवाह  की तारीख  से 1 वर्ष के भीतर कार्यवाही संस्कृत की जानी चाहिए।

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(5)    प्रत्यार्थी के गर्भवती होने का ज्ञान याची हो जाने के पश्चात उसकी संपत्ति से वैवाहिक संभोग नहीं हुआ, है यदि याची ने प्रत्युत्तर दाता क्षमा कर दिया, और उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया हो , तो विवाह का प्रार्थना पत्र स्वीकार नहीं किया जाएगा
          यहां यह उल्लेखनीय है, कि यदि पांच में से एक शर्त सिद्ध नहीं हो पाती, तो विवाह को शून्यकरणी के आधार पर भंग नहीं किया जा सकता । और विवाह सदैव के लिए विधि मान्य बना रहेगा।। (शून्यकरणीय विवाह क्या है)

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1- शून्यकरणीय विवाह प्रारंभ से ही सुने तथा प्रभावहीन होता है । और इस प्रकार इसको विवाह नहीं माना जा सकता। इस विवाह में पक्षकार पति पत्नी की शून्य स्थिति प्राप्त नहीं करते है। संतान भी धर्मज संतान के संग स्थिति प्राप्त नहीं करती है। ना ही पक्षकारों के आपसे अधिकार कर्तव्य और उत्तरदायित्व का जन्म होता है। दूसरी ओर शून्यकरणीय एक विवाह सभी तथ्यों के लिए वैध समझा जाएगा। उस स्थिति तक जब तक कि जिला न्यायालय द्वारा पीड़ित याचिका प्रार्थना पत्र स्वीकार नहीं कर लिया जाता।
2- शून्य विवाह में दोनों पक्षकार बिना डिक्री पारित हुए , दूसरा विवाह कर सकते हैं। परंतु शून्यकरणीय विवाह में विवाह के पक्षकार ऐसा नहीं कर सकते, यदि वे या उनमें कोई ऐसा करेगा तो वह अपराधी होगा।

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3-  जब न्यायालय डिक्री द्वारा शून्य विवाह को शून्य घोषित करता है, तो वह विवाह सुनने विवाह की घोषणा मात्र समझा जाता है। विवाह शून्यकरणीय विवाह न्यायालय द्वारा डिक्री पारित करने के बाद ही शून्यकरणीय विवाह होता है।
4- शून्य विवाह के अंतर्गत पत्नी द० प्र० स० की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग करने की अधिकारिणी नहीं है, जबकि शून्यकरणीय  विवाह में पति पत्नी को यह अधिकार है।

 

शून्यकरणीय विवाह क्या है | शून्य विवाह और शून्यकरणीय विवाह में अंतर स्पष्ट कीजिए

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