सामण्ड द्वारा की गयी विधि शास्त्र की परिभाषा की विवेचना कीजिए | Discuss the definition of law made by Samand.

विवेचना कर बताइए कि विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान | Jurisprudence is the Philosophy of Law or Knowledge of Law
विवेचना कर बताइए कि विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान | Jurisprudence is the Philosophy of Law or Knowledge of Law
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सामान्य द्वारा दी गई विधि की परिभाषा की विवेचना कीजिए क्या आप इस बात से सहमत हैं। कि वह परिभाषा ऑस्टिन द्वारा दी गई विधि के परिभाषा की परिष्कृत रूप है-

विधि शास्त्र के अनेक विद्वानों ने विधि की परिभाषा अलग-अलग रूपों में दी है। परंतु सामण्ड ने विधि की परिभाषा इस प्रकार दी है, कि कानून उस सिद्धांत का समूह है। जो राज्यों द्वारा न्याय संगत प्रशासन के निमित मान्य किये गए हैं और लागू किए गए हैं दूसरे शब्दों में कानून के अंतर्गत वे नियम आते हैं जो न्याय के निमित है तथा न्यायालयों द्वारा मान्य है। एवं जिनका वे अनुपालन करते हैं।
अर्थात् विधि राज्यों द्वारा स्वीकृत एवं मान्यता प्राप्त ऐसे सिद्धांतों का समूह है। जो राज्य में न्याय स्थापित करने हेतु निर्मित किए गए हैं। सामण्ड के विचार में विधि का तात्पर्य नागरिक विधि  से है जो वकीलों द्वारा व्यवहार में लाई जाती है।  सामण्ड इन्हें अंतर्राष्ट्रीय विधि और संवैधानिक विधि से भिन्न मानता है। सामण्ड के दृष्टिकोण में विधि का उद्देश्य न्याय सुलभ करना है। कि पर नियमित नियम विधानसभा द्वारा पारित होते ही कानून मान लिए जाते हैं न्यायालय उनका वादों में प्रयोग करते हैं। सामण्ड इन्हें इसलिए कानून मानता है क्योंकि यह समृद्धि द्वारा निर्मित होते हैं ना कि न्यायालय उन्हें मानते हैं इस आपत्ति का उत्तर देते हुए सामान्य ने बताया कि न्यायालय कानून को लागू भी करते हैं। और नए कानून भी बनाए जाते हैं। जिन्हें न्यायाधीश द्वारा निर्मित कानून या न्यायिक पूर्वोक्तियॉ भी कहते हैं। विधान सभाएं जो कानून बनाती हैं, उन्हें कहते हैं, जिसे न्यायालयों ने स्वीकार किया है। दोनों एक बात के दो पहलू हैं।




सामण्ड की परिभाषा से एक बात स्पष्ट है, कि वह न्याय पर अधिक बल देता है। परिभाषा देते समय वह यह मानता है, कि कानून का एकमात्र लक्ष्य न्याय की व्यवस्था करना है। अतः न्याय लक्ष्य है, और कानून साधन है। न्याय प्रशासन के लिए कुछ कठोर नियमों का होना आवश्यक है। यदि वहां ऐसा अभाव है ,तो निश्चित नियमों की अनुपस्थिति में सुद्धद्धि, विवेक और प्राकृतिक न्याय का सहारा लेना पड़ता है। हम न्यायाधीशों की किसी बात को जोड़ने या घटाने के स्वच्छ अधिकार को नियंत्रित नहीं कर सकते। और इसीलिए न्याय प्रशासन में कानून को लागू करने की  मशीनरी भी नहीं समझ सकते।

सामण्ड ने कहा है कि

कानून को हम कानून मानते हैं, यह बात इसलिए नहीं कि उन्हें मानने के लिए न्यायालय बाध्य है। बल्कि  इसलिए कि वे वास्तव में उन्हें अपना लिया करते हैं स्पष्ट है कि कोई भी नियम जो इस प्रकार न्यायालयों द्वारा प्रचलित परंपराओं को स्वीकार नहीं करता, उसे कानून नहीं कहा जा सकता यही नहीं यदि दूसरे अर्थ को ले तो प्रत्येक नियम जो इस प्रकार न्यायालयों द्वारा स्वीकार किए गए हैं। कानून बन जाते हैं, न्यायिक संस्थाओं का उत्तर दायित्व है, कि वह नियमों का कानून भी दृष्टि से वर्गीकरण करें। इस संबंध में ठोस बात यह है कि कानून का न्यायालय पर अधिकार इसलिए है, कि न्यायाधीश स्वयं अपनी नैतिकता एवं न्याय परंपराओं से बंधे हुए हैं। और इसे नैतिकता को दृष्टिगत करते हुए वे राज्य द्वारा निर्मित नियमों को अंगीकर कर लेते हैं। तथा उन्हें न्याय प्रशासन में यथा स्थान प्रयोग कर उसे कानून का स्वरूप प्रदान करते हैं। सामण्ड की इस परिभाषा की विधि शास्त्रियों ने बड़ी आलोचना की जिनमें पैटन, कैल्सन, पाउंड, फ्रेंक इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं।




कैल्सन- के शब्दों में कानून स्वयं तो वह व्यवस्था है, जिसकी बात हम उसके उद्देश्य के संदर्भ में रहते हैं।
पैटन- के अनुसार सामण्ड का विचार या नहीं है, कि कानून ही न्याय है बल्कि उनका कथन है कि कानून न्याय के लक्ष्य तक पहुंचने की एक साधन है। उसके दृष्टिकोण से कानून का उद्देश्य केवल न्याय की खोज करना नहीं है ।वरन् दृढ़ता पूर्वक सिद्धांतों का प्रकट करना और एक व्यवस्था उत्पन्न करना है।

पाउंड- का कथन है कि सामण्ड ने कानून के निर्णय को एक गठरी बना डाला है। और इस अर्थ में कानून एक संपूर्ण अंग नहीं रहता है।

फ्रेंक- के अनुसार सामण्ड ने कानून को राज्य द्वारा लाभ किए गए नियमों तक सीमित कर दिया है।
सामण्ड – के अनुसार उसकी विधि की परिभाषा का क्षेत्र विस्तृत होते हुए भी उसमें अंतरराष्ट्रीय कानून एवं संवैधानिक कानून को कोई स्थान नहीं है। संवैधानिक कानून पर आर्थिक विचार ना करते हुए सामान्य अंतरराष्ट्रीय कानून के विषय में आवश्यक कहता है, कि वह एक राज्य द्वारा ना बनाकर अनेक राज्यों के सामूहिक विचार की  परिणति है। अतः वे नैतिक नियमों से अधिक कुछ नहीं है, उन्होंने कानून का संबंध उसके अवयव से स्थापित किया है। जिसकी ऑस्टिन ने अपेक्षा की थी। ऑस्टिन ने तो कानून को संप्रभु की आज्ञा माना है। और उसने परंपराओं सर्वसाधारण की राय और धर्म की ओर ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार कानून के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष की उपेक्षा की गई है। उनकी परिभाषा केवल इतना बताती है, कि कानून आचरण या व्यवहार के नियम है। जिन्हें की प्रभुताधारी द्वारा लगाया गया और लागू किया गया ।अतः यह कहा जा सकता है कि सामण्ड ने जो कानून की परिभाषा दी है। वह ऑस्टिन की परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण रखती है ।और त्रुटियों का निराकरण करती है।



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