अपराध शास्त्र और अपराधिक विधि में अंतर – Diffrence between Criminology and Criminal Law

Abolition and Retention of Capital Punishment in India - मृत्यु दण्ड को ख़तम करने और बनाये रखने के सिद्धांत
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अपराध शास्त्र और अपराधिक विधि में अंतर – Diffrence between Criminology and Criminal Law

 

अपराधिक विधि और अपराध शास्त्र में निम्न अंतर है ।

 

1- अपराधिक विधि मुख्य रूप से उन कार्यों या कार्य लोपो का वर्णन करती है जिन्हें अपराध की संज्ञा दी जाती है । तथा उनके संबंध में उपचारात्मक स्वास्थ्य लागू करती है । इसके विपरीत अपराध शास्त्र अपने क्षेत्र में अपराधों के अलावा उन कार्यों को शामिल करता है जो कानूनी दृष्टि से तो अपराध नहीं होते किंतु समाज के लिए खतरा पैदा करते हैं ।




2- अपराधिक विधि में केवल अपराधों का वर्णन किया जाता है अपराध के कारणों का नहीं । बल्कि अपराध शास्त्र में अपराध के कारणों का वैज्ञानिक विवेचन किया जाता है ।

 

3- अपराधिक विधि में अपराधी के लिए केवल दंड या उपचार की व्यवस्था की जाती है । बल्कि अपराध शास्त्र में अपराधियों की आवश्यकता और अपराध के कारणों के संदर्भ में दंड या उपचार की व्यवस्था की जाती है ।

 

4- अपराधिक विधि यह देखने का पर्यत्न नहीं करती की दंड या उपचार का अपराधी के भावी आचरण पर यह समाज पर क्या प्रभाव डालता है । जबकि अपराध शास्त्र दंड या उपचार का इस संदर्भ में भी विचार करता है ।

 

अतः उपरोक्त वर्णन के आधार पर हम कह सकते हैं कि यदि अपराधिक विधि एक पृथक एवं स्वतंत्र विषय है फिर भी दोनों विषयों में उचित सांजस्या स्थापित करना आज के युग की परम आवश्यकता है । जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सांता सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब 1976 एससीसी 190 में कहां है कि न्यायाधीशों को अपराध शास्त्र में नवीन रुखो तथा दंड आदेश द्वारा शिक्षित किया जाना चाहिए । अतः अपराधिक न्याय प्रशासन को लागू करने वाले व्यक्ति यदि अपराध शास्त्र के सिद्धांतों में निपुण हो तो इसे न्याय प्रशासन को अधिक अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है ।

 

अपराध शास्त्र और अपराधिक नीति में अंतर




 

1 अपराध शास्त्र विज्ञान की वह शाखा है जिसमें अपराध और अपराधी बनने के कारण उनके उपचार तथा निवारण के तरीकों तथा अपराध से अपराधी तक पहुंचने के ढंग का अध्ययन किया जाता है । जबकि अपराधिक नीति समय-समय पर अपने नागरिकों को राज्य द्वारा प्रदान की गई एवं सामाजिक सुरक्षा की नियति है जिसके द्वारा अपराधियों से समाज की सुरक्षा की जाती है । तथा इसे आपराधिक विधि के माध्यम से लागू किया जाता है ।

 

अपराध शास्त्र तीन भागों में विभक्त है ।

 

  1. विधि का समाजशास्त्र
  2. अपराधिक कारण शास्त्र
  3. दण्ड शास्त्र

 

जबकि अपराधिक नीति का ऐसा कोई उप विभाजन नहीं है बल्कि इसका जन्म अपराध शास्त्र की दो उपशाखाओं-

 

1 विधि का समाजशास्त्र तथा

2 दंड शास्त्र के संयोजन से होता है ।

 

2 – अपराध शास्त्र सामाजिक नियंत्रण का एक सिद्धांत कार्यक्रम है । जबकि अपराधिक नीति राज्य द्वारा अपनाया गया एक व्यवहारिक कार्यक्रम है ।अपराधिक नीति का निर्धारण अपराध कारण तथा राज्य द्वारा अपराध के प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाता है ।

 

जैसे जैसे किसी कार्य विशेष से सामाजिक सुरक्षा को खतरा बढ़ता है वैसे वैसे ही उस कार्य या अकर्या को आकृति की श्रेणी से हटाकर साधारण या गंभीर अपराध घोषित कर दिया जाता है ।

 

4 अपराध शास्त्र का उद्देश्य अपराधियों की आवश्यकता और अपराध के कारणों के संदर्भ में दंड या उपचार के सुझाव पेश करना है । जबकि अपराधिक नीति का उद्देश्य समाज से अपराधी प्रवृत्ति को हतोत्साहित या समाप्त करना है ।

 

5 अपराध शास्त्र यह बताता है कि अमुक अपराध किन कारणों से जन्मा है जबकि अपराधिक नीति उन कारणों को दूर करने की कोशिश करती है । वर्तमान दंड नीति ने अपराधी कारणों को ध्यान में रखते हुए अपराधियों के उपचार हेतु अपराधियों को दंडित करने की बजाय उन्हें परिवीक्षा, पैरोल अन्य निर्धारित दंड आवेश खुले कारागार शिविर आदि अनेक व्यवस्थाओं के द्वारा उपचारित करती है । तथा यह दिखाती है कि अमुक दंड या उपचार का अपराधी और समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है ।




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