धारा 299 तथा 300 में अन्तर | Difference Between IPC 299 and 300 in Hindi 

धारा 299 तथा 300 में अन्तर | Difference Between IPC 299 and 300 in Hindi
धारा 299 तथा 300 में अन्तर | Difference Between IPC 299 and 300 in Hindi
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धारा 299 तथा 300 में अन्तर | Difference Between IPC 299 and 300 in Hindi

 

आर० बनाम गोविन्द के वाद में मेलबिल जज ने धारा 299 तथा 300 में अन्तर स्पष्ट किया था। इस प्रकरण में अभियुक्त ने धक्का देकर अपनी पत्नी को जमीन पर गिरा दिया। तत्पश्चात् उसके सीने पर अपना घुटना रखकर प्रचण्ड वेग से दो या तीन बार चेहरे पर बन्द मुष्टिका से प्रहार किया। प्रहार के वेग के कारण उस महिला के मस्तिष्क से रक्त प्रवाह प्रारम्भ हो गया जिससे वह या तो उसी समय या उसके कुछ ही समय पश्चात् मर गया। इस प्रकरण में अभियुक्त का आशय अपनी पत्नी की न तो मृत्यु कारित करना था न ही उसके द्वारा पहुंचायी गयी शारीरिक क्षति इतनी पर्याप्त थी कि प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में उससे उसकी मृत्यु हो सकती थी।  अभियुक्त को हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध के लिए दण्डित किया जायेगा।

 

धारा 299 IPC और धारा 300 IPC में मुख्य अंतर

 

IPC धारा 299 धारा 300 IPC
कोई व्यक्ति मानव वध करता है जब वह कार्य जिससे मृत्यु कारित करता है। इस धारा में वर्णित अपवादों को छोड़कर आपराधिक मानव वध हत्या है यदि वह कार्य जिससे मृत्यु की गयी है।
मृत्यु करीत करने के आशय से मृत्यु करीत करने के आशय से
ऐसी शारीरिक क्षति करीत करने के आशय से जिससे मृत्यु सम्भाव्य हो किसी व्यक्ति को शारीरिक उपहति करीत करने के आशय से और वह शारीरिक उपहति जिसे करीत करने का आशय है , प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु करीत करने के लिए
इस ज्ञान से की वह कार्य आसन्न संकट से इतना परिपूर्ण है।  की हर अधिसम्भाव्यता के अंतर्गत उस कार्य से मृत्यु हो जाएगी या ऐसी शारीरिक उपहति जिससे मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य हो, किया गया हो।

 

(1) “एतस्मिनपश्चात् अपवादित दशाओं को छोड़कर आपराधिक मानव-वध हत्या है” IPC  धारा 300 की शुरुआत इन शब्दों के साथ होती है। इसका अर्थ यह है कि यदि आपराधिक मानव-वध धारा 300 के अन्तर्गत वर्णित किसी भी एक अपवाद की सीमा के अन्तर्गत आता है तो वह हत्या नहीं होगा।




(2) जब कभी भी अपराधी का आशय मृत्यु कारित करना होता है तो वह सदैव हत्या का मामला होगा जब तक कि अपराध धारा 300 IPC में वर्णित किसी एक अपवाद के अन्तर्गत न आता हो।

 

(3) धारा 299 IPC के खण्ड (ख) तथा IPC धारा 300 के खण्ड (2) के बीच अन्तर अपराधी के इस ज्ञान पर आधारित है कि जिस व्यक्ति को उपहति कारित की गयी है उसकी मृत्यु होनी सम्भाव्य है। अपराधी यहि यह जानता है कि या तो विशिष्ट शारीरिक संरचना के कारण या अपरिपक्व उम्र, या अन्य विशिष्ट परिस्थितियों के कारण क्षतिग्रस्त व्यक्ति की किसी ऐसी उपहति से मृत्यु होने की सम्भावना है जिससे साधारणतया मृत्यु कारित नहीं होती, तो अपराध हत्या की कोटि में आयेगा।

 

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IPC धारा 300 के दष्टान्त (ख) द्वारा इस अन्तर को सुस्पष्ट किया गया है। यह खण्ड वस्तुत: उन मामलों के लिये आशयित है जिसमें मृतक का प्लीहा या यकृत बढ़ा हुआ होता है और जिसे साधारण शक्ति लगाकर नष्ट किया जा सकता है। ऐसे मामलों में आपराधिकता की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि क्या अभियुक्त को इन तथ्यों का ज्ञान था। धरा 299 खण्ड (ख) के अन्तर्गत ऐसा ज्ञान अपेक्षित नहीं है।

 

(4) धारा 299 खण्ड (ख) और धारा 300 खण्ड (3) की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि कारित अपराध, आपराधिक मानव-वध होगा यदि आशयित शारीरिक उपहति ऐसी है जिससे मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य है, यह तब हत्या होगी जब शारीरिक उपहति ऐसी है जो प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त है। यह अन्तर यद्यपि बहुत सूक्ष्म है फिर भी उल्लेखनीय है।




अनेक सन्देहात्मक मामलों में निर्णय इन दोनों खण्डों की तुलना पर ही निर्भर करता है। जब किसी बात के घटित होने की सम्भावना उसके घटित न होने की सम्भावना से अधिक होती है तो यह कहा जाता है उस वस्तु का घटित होना ” अधिसम्भग्व्य'” है। जब उसके घटित होने की सम्भावना अत्यधिक होती है यह कहा जाता है कि उसका घटित होना  अत्यधिक अधिसम्भाव्य है।

 

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‘प्रकृति’ के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त कोई उपहति का अर्थ है, प्रकृति के सामान्य अनुक्रम को ध्यान में रखते हुये मृत्यु  की उपहति का अत्यधिक अधिसम्भाव्य परिणाम होता है। इस पदावली का यह अर्थ नहीं है कि मृत्यु हो जाये। अत: IPC धारा 299 खण्ड (ख) तथा धारा 300 खण्ड (3) के बीच अन्तर उपहति के परिणाम-स्वरुप मृत्यु की अधिसम्भाव्यता या सम्भावना की मात्रा पर निर्भर करता है। जैसा कि न्यायाधीश मेलविल के परिप्रेक्षित किया है, व्यवहारत: उपहति कारित करने में प्रयुक्त आयुध की प्रकृति पर भी विचार करना आवश्यक है। शरीर के किसी मार्मिक स्थान पर मुष्टिका अथवा छड़ी द्वारा प्रहार सम्भाव्यत: मृत्यु कारित कर सकता है; तलवार द्वारा शरीर के किसी मार्मिक स्थान पर मुष्टिका अथवा छड़ी द्वारा प्रहार सभ्भाव्यत: कारित करने के लिये पर्याप्त है।

 

यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि उपहति कारित करने में प्रयुक्त आयुध की प्रकृति उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि कारित उपहति की प्रकृति यही यहाँ वर्णित अन्तर की पुष्टि करती है। एक ही आयुध से अलग-अलग प्रकृति की उपहति कारित की जा सकती है। यह व्यक्ति की शारीरिक संरचना, प्रयुक्त आवेग की मात्रा तथा शरीर के किस स्थल पर प्रहार किया गया, इत्यादि पर निर्भर कगता है।




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(5) धारा 299 खण्ड (ग) तथा IPC धारा 300 (ग) उन मामलों के लिये आशयित प्रतीत होते हैं जिनमें हत्या या उपहति कारित करने का आशय तो नहीं होता किन्तु अपराधी को यह ज्ञान अवश्य रहता है कि कार्य संकटपूर्ण है, अत: मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य है। कार्य द्वारा मृत्यु कारित होने की सम्भाव्यता का ज्ञान इन दोने ही खण्डों के अन्तर्गत अपेक्षित है। खण्ड 4 के अन्तर्गत सम्भावना की अत्यधिक मात्रा अपेक्षित है। खण्ड 4 को प्रभावकारी बनाने के लिये निम्नलिखित तत्व आवश्यक हैं-

 

(1) यह कि कार्य आस न संकट से युक्त है;
(2) यह कि हर अधिसम्भाव्यता के अन्तर्गत कार्य से मृत्यु हो जायेगी या ऐसी शारीरिक उपहति होगी जिसरसे मृत्यु कारित होनी सम्भाव्य है; तथा
(3) यह कि कार्य जोखिम उठाने के लिये बिना किसी प्रतिहेतु के किया गया है। कोई अपराध, आपराधिक मानव-वध है या हत्या, मानव-जीवन के लिये उत्पन्न संकट पर निर्भर करता है। यदि मृत्यु होने की सम्भावना है तो अपराध, आपराधिक मानव-वध होगा और यदि मृत्यु अत्यधिक सम्भाव्य है तो यह हत्या है। किसी लोक मार्ग के नजदीक अत्यधिक तीव्र गति से वाहन चलाना या किसी
लक्ष्य पर गोली चलाना इत्यादि इसके उदाहरण हैं।




यदि कोई व्यक्ति किसी संकरी और भीड़युक्त गली में अन्धाधुन्ध तथा उपेक्षापूर्वक तीव्र गति से बग्गी हाँकता है तो वह यह जानता है कि इस प्रकार बग्गी चलाकर किसी भी व्यक्ति की वह मृत्यु कारित कर सकता है किन्तु उसका आशय किसी की मृत्यु कारित करना नहीं भी हो सकता है। इस प्रकार के मामले में वह आपराधिक मानव-वध का दोषी होगा जब तक कि तथ्य के तौर पर यह न पाया जाये कि वह जानता था कि उसका कार्य इतने आसन्न संकट से युक्त था कि इससे हर सम्भाव्यता के अन्तर्गत या तो मृत्यु कारित होगी या ऐसी शारीरिक उपहति जिससे प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु होनी सम्भाव्य थी ताकि मामला IPC धारा 300 के खण्ड (4) के अन्तर्गत आ जाय ।

 

किन्तु यदि कोई व्यक्ति प्रचण्ड वेग से बग्गी को उपर्युक्त गली में केवल चलाता ही नहीं है बल्कि साशय लोगों के एकसमूह पर बग्गी दौड़ा देता है तो यह माना जायेगा कि उसे यह ज्ञात था कि उसका कार्य आसन्न संकट से इस प्रकार युक्त था कि वह हर सम्भाव्यता के अन्तर्गत मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक उपहति करेगा जो प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिये पर्याप्त होगी जैसा कि धारा 300 IPC के खण्ड (4) में अपेक्षित है।




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