Describe The Definition of Law And Explain The Principle of Living Law || विधि शब्द की परिभाषा बताइए और जीवित कानून के सिद्धांत को समझाए

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Describe The Definition of Law And Explain The Principle of Living Law || विधि शब्द की परिभाषा बताइए और जीवित कानून के सिद्धांत को समझाए

विधि शब्द की परिभाषा – The Principle of Living Law

किसी विषय की व्याख्या करना उसे परिभाषित करने से अधिक कठिन है। फिर भी विषय के अध्ययन से पूर्व परिभाषा अत्यंत आवश्यक तत्व है। क्योंकि किसी विषय की इति और अर्थ परिभाषा ही होती है।
विधि शब्द का अर्थ और इसमें सम्मिलित होने वाली बातें भिन्न-भिन्न समाजों में भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे हिंदू प्रणाली में विधि शब्द का पर्याय धर्म, है ।मुसलमानों में हुकुम, रोमन में जस, फ्रांसीसी में ड्राफ्ट, और जर्मन में रिच्ट हैं।

फिर भी परिभाषा की दृष्टि से विधि को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-




1- आदर्शवादी।
2- विध्यात्मवादी।
3- समाजशास्त्रीय।
(1)  आदर्शवादी परिभाषा- इस वर्ग के अंतर्गत रोमन विधिशास्त्रियो और अन्य प्राचीन विधिशास्त्रियों द्वारा दी गई अधिकांश परिभाषाएं आती हैं-

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सामण्ड-  विधि न्याय के प्रशासन में राज्य द्वारा मान्य और लागू किया जाने वाला नियम समूह है।

(2)  विध्यात्मवादी परिभाषा_ यद्यपि विधि की विध्यात्मवादी परिभाषा बहुत प्राचीन है। किंतु इसका एक स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण विवेचन हम ऑस्टिन में पाते हैं।
केल्सन- केल्सन विध्यात्मवादी विचारधारा का विद्वान विधि शास्त्री है। और उसकी विचारधारा ऑस्टिन के समादेश के इर्द-गिर्द घूमती है। फिर भी उससे भिन्न है। कैल्सन विधि को अमानकीय समादेश के रूप में परिभाषित करता है। समादेश से उसका तात्पर्य एक कर्तव्य से हैं।




(3)  समाजशास्त्रीय परिभाषा- समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण एक दृष्टिकोण नहीं है। इसके अंतर्गत अनेक चिंतन समाहित है। अतः उन्हें समझने के लिए समाजशास्त्रीय परिभाषा को समझना होगा।
डयुग्वि-डयुग्वि विधि को आवश्यक रूप से और अनन्य रूप से एक सामाजिक तथ्य के रूप में परिभाषित करता है। डयुगि की परिभाषा के लिए सामाजिक समेकता आवश्यक है।।
इहरिंग- विधि समाज के जीवन की स्थितियों की गारंटी है। जो राज्य की बाध्यता को शक्ति द्वारा सुनिश्चित किया जाता है।

इहरिंग द्वारा दी गयी परिभाषा बहुत स्पष्ट एवं सहज है।

एलरलिच- एलरलिच अपनी परिभाषा में उन सभी मानकों को सम्मिलित करता है। जो किसी निर्दिष्ट समाज में सामाजिक जीवन को शासित करते हैं।
रास्को पाउण्ड-  विधि सामाजिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली एक सामाजिक संस्था है।

उपरोक्त परिभाषा ओं का विवेचन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। कि किसी परिभाषा के सार्वजनिक होने के लिए निम्नलिखित तत्वों का समावेश आवश्यक है।




1- राज्य द्वारा नियमों का निर्णायप, मान्यता एवं प्राधिकरण
2- नियमों के प्रभावी होने के लिए उनके पीछे अनुशासित शक्ति और
3- नियमों के पीछे प्रयोजन की सार्थकता।।

जीवित कानून का सिद्धांत – The Principle of Living Law

The Principle of Living Law- जीवित कानून के प्रतिपादक प्रसिद्ध विधिवेत्ता एवं चिंतक इहरिंग हैं। इहरिंग के मत के अनुसार विधि का विकास उसकी उत्पत्ति के समान ही ना तो स्वतः होता है। और ना ही शांतिपूर्ण तरीके से अर्थात यह शांति एवं व्यवस्था उपलब्ध करने की दृष्टि से सतत, संघर्ष या विरोध का परिणाम है। इहरिंग विधि को एक लक्ष्य के लिए साधन के रूप में मानता है। उसका लक्ष्य व्यक्तिगत ना होकर सामाजिक है। विधि का कार्य इसी लक्ष्य की पूर्ति माना जाता है।

इहरिंग के अनुसार इस लक्ष्य की पूर्ति या तो पुरस्कार द्वारा संभव है या बल प्रयोग द्वारा।

एहरिक- ने अपने विचार प्रकट करते हुए भी कहा कि विधि और सामाजिक मजबूरी के मानकों के मध्य अंतर बहुत कम है। कहने का तात्पर्य है कि लोग राज्य की आज्ञा होने मात्र के कारण ही बहुत किसी कार्य को करने या न करने की ओर प्रेरित नहीं होते। बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और दबाव के कारण वैसा करते हैं। समाज की इकाइयों में परिवार, जाति, धर्म, और समाज इत्यादि का बड़ा महत्व होता है। उनके आदेशों का प्रायः प्रत्येक शक्ति एवं पालन करता है।

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कभी-कभी सामाजिक आदेशों को संहिताबद्ध किया जाता है। अतः कानून का क्षेत्र राज्य की प्रभुसत्ता के साथ संलग्न रहका अन्य सामाजिक संस्थाओं से भी संबंध है।

आलोचना- एहरिक ने राज्य को गौण बताया है। उसे विधि निर्माण में कोई स्थान नहीं दिया जबकि आजकल राज्य सर्वोपरि है। एहरिक ने रीति-रिवाजों की विधि का स्रोत माना है। यह तथ्य ऐतिहासिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता। आधुनिक युग में विधि के अनेक स्रोत माने जाते हैं। जिनमें से रीति-रिवाज एक स्रोत आवश्य है। जीवित विधि के सिद्धांत में ऐसा कोई मापदंड नहीं है, जिसके आधार पर सामाजिक मानकों व वैधिक मानको से भेद किया जा सके। अंत में राज्य द्वारा निर्मित कानूनों की उपेक्षा उचित नहीं है। क्योंकि राज्य द्वारा निर्मित कानूनों में सामाजिक मूल्य व नैतिक आदेशों को प्रतिस्थापित करने की शक्ति होती है।।।




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