Describe The Analytical Ideology of Jurisprudence by John Austin || जॉन ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा का वर्णन कीजिए

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Describe The Analytical Ideology of Jurisprudence by John Austin || जॉन ऑस्टिन द्वारा प्रतिपादित विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा का वर्णन कीजिए

जॉन ऑस्टिन का विधि सिद्धांत Analytical Ideology of Jurisprudence by John Austin

Analytical Ideology of Jurisprudence by John Austin:- ब्रिटेन के वर्तमान राज्य के संदर्भ में विख्यात विधि शास्त्री जॉन ऑस्टिन का नाम अग्रगण्य है जिन्होंने विधि के प्रति विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाकर विधि को व्यावहारिक रूप दिलाया है। ऑस्टिन के मतानुसार विधि ऐसे नियमों का संकलन है। जो एक बुद्धिमान व्यक्ति किसी अन्य ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति के मार्गदर्शन के लिए निर्मित करता है। जिस पर उसकी संप्रभुता हो। सुस्पष्ट या निश्चयात्मक विधि की परिभाषा देते हुए कहते हैं, कि यह विधि ऐसे आदेशों का समूह है। जो एक संप्रभुताधारी द्वारा किसी स्वतंत्र राजनयिक समाज में प्रजा के व्यवहार को निर्धारित करने के लिए तैयार किए गए हैं।

जॉन ऑस्टिन की उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है-

कि विधि को न्याय से भिन्न मानते हैं। उनके मतानुसार विधि उचित या अनुचित पर आधारित ना होकर संप्रभुताधारी के आदेशों पर आधारित है। अतः आस्टिन का निश्चित मत था, कि विधि का आधार संप्रभुताधारी व्यक्ति या व्यक्तियों की शक्ति में निहित है। इस सिद्धांत को उन्होंने विधि का आदेशात्मक सिद्धांत कहा है।

विधि का आदेश आत्मक सिद्धांत
जॉन ऑस्टिन ने विधि संबंधित जो सिद्धांत प्रतिपादित किया है- उसे विधि का आदेशात्मक सिद्धांत कहा जाता है।




इस सिद्धांत के मुख्य तत्व इस प्रकार है-

(1) समादेश- स्नेह विधि को संप्रभुता धारी कसम आदेश माना है उनके अनुसार संदेश राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है जो प्रजा से किसी कार्य को करने या ना करने की आकांक्षा करें इस यज्ञ की अभिव्यक्ति प्रार्थना के रूप में नहीं होती है संप्रभुता धारी का संबंध किस दो प्रकार का हो सकता है।
(I) सामान्य समा देश और
(ii) विशिष्ट समादेश

सामान्य समादेश वह है जो सभी व्यक्तियों के प्रति सभी समय समान रूप से जारी किया जाता है। तथा यह तब तक प्रतिभाशाली रहता है, जब तक कि उसका निरसन का किया जाए या उसे समाप्त न किया जाए। विशिष्ट समादेश कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति सभी समय के लिए या सभी व्यक्तियों के प्रति कुछ समय के लिए जारी किया जाता है।

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आस्टिन ने समादेश को ही निश्चयात्मक विधि माना है।

आस्टिन ने समादेश तथा कर्तव्य को परस्पर संबंधित और अविभाज्य निरूपित किया है। उनके अनुसार संप्रभुताधारी की इच्छा की अभिव्यक्ति का नाम समादेश है। समादेश की अवहेलना कोई कर्तव्य भंग कहते हैं, तथा इन दोनों के परिणाम स्वरूप जो हानि उत्पन्न होगी, उसे ऑस्टिन ने शास्ति कहा है। उल्लेखनीय है, कि आदेश का तत्व विधि को नैतिक नियमों से अलग रखता है,

ऑस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि के नियम में विशेषताएं होती हैं- Analytical Ideology of Jurisprudence by John Austin

( I) प्रत्येक विधि आचरण संबंधी क्रम प्रस्तुत करती हैं।
( ii) प्रेत्यक कानून एक प्रकार का समादेश होता है।
( iii) संप्रभु द्वारा प्रवर्तित विधि की पृष्ठभूमि में से राज्य की मालिक शक्ति निहित होती है। जिसके अनुसार समा देश को ना मानने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाता है
(iv) निश्चयात्मक कानून संप्रभुता धारी के प्रत्यक्ष या परोक्ष आदेश होते हैं।

(2) संप्रभु शक्ति- आस्टिन ने विधि को संप्रभुताधारी का आदेश कहा है।




उन्होंने संप्रभुता शक्ति के 2 लक्षण बताए हैं –

प्रथम यह है कि वह सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए जिस पर किसी अन्य बाहर शक्ति का प्रभुत्व ना हो तथा दूसरे यह कि संप्रभु शक्ति ऐसी होनी चाहिए जिस के आदेशों का प्रचार स्वेच्छा से अनुपालन करने की इच्छुक है।

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(3) शास्ति- आस्टिन ने अपने आदेशात्मक विधि सिद्धांत में यह स्पष्ट किया है- कि संप्रभुताधारी के आदेश मात्र ही कानून का रूप धारण नहीं कर लेते जब तक कि उनके पीछे कोई शास्ति ना हो, ऐसे आदेश को जिसका अनुपालन न किए जाने पर या जिनका का उल्लंघन होने पर दोषी व्यक्ति को दंड देने की व्यवस्था ना हो, सही अर्थ में कानून नहीं कहा जा सकता। ऑस्टिन के अनुसार आदेश के साथ शास्ति जुड़ी रहने पर ही उसे निश्चयात्मक विधि कहा जा सकता है।

ऑस्टिन के अनुसार संप्रभुता विशेषताएं-

( I) अभिभाज्यता
(ii) असीमतता
(iii) अपरिहार्यता।

आस्टिन संप्रभुता में किसी प्रकार के सीमा बन्धन को स्वीकार नहीं करते तथा उनके मतानुसार प्रत्येक राज्य के लिए संप्रभुता अनिवार्य है।

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ऑस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि में संप्रभुता आदेश कर्तव्य तथा स्वास्थ्य के चार तत्व होना आवश्यक है, उन्होंने विधि के औचित्य या अनौचित्य को कोई महत्व नहीं दिया है।

उनके विधि संबंधी सिद्धांत में दो बातों पर विशेष बल दिया गया है

1- विधि की समानता
2- विधि की प्रवर्तनीयता।

विधि राजनीतिक प्राधिकारी द्वारा प्रवर्तित की जाती है। तथा इसे सभी व्यक्तियों के प्रति समान रूप से बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाता है। विधि को प्रवर्तित करने वाली संप्रभु शक्ति में लोगों से अपने आदेशों का अनिवार्य रूप से पालन करा सकने की क्षमता होती है।

ऑस्टिन के अनुसार विधियों के प्रकार

जॉन ऑस्टिन ने विधियों के दो प्रकार बताए हैं-
1- देवी विधियां
2-मानव विधियां।

मानवीय विधियां दो प्रकार की हो सकती हैं, प्रथम-निश्चयात्मक विधि जिसे राज्य के संप्रभु द्वारा अपने अधीनस्थ व्यक्तियों के अनुपालन हेतु आदेश के रूप में निर्मित किया गया हो। द्वितीय- ऐसी विधि जो प्रस्तुत विधि नहीं है।क्योंकि उसका मूलाधारी संप्रभुता का आदेश ना होकर असम के व्यक्तियों की राय या भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र है।

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आस्टिन इस प्रकार की विधि को लाक्षणिक विधि कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं, उनका स्पष्ट है, कि इस विधि को विधि कहा जाना अनुचित है। उनके अनुसार फैशन संबंधी विधियां या गुरुत्वाकर्षण संबंधी विधियां जो बोली में आती हैं।

जॉन ऑस्टिन को विश्लेषणवादी शाखा का प्रवर्तक लाया गया है

फिर 4 वर्ष तक लंदन विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र के अध्यापक रहे उनकी सुप्रसिद्ध कृति दि प्राविन्स ऑफ ज्युरीप्रूडेन्स डिटरमेन्ड सन् 1832 में प्रकाशित हुई इस कृत्य से यह स्पष्ट होता है, कि ऑस्टिन की विचारधारा हॉब्स ब्लैकस्टोन तथा बेन्थन आदि पूर्वर्ती विधि शास्त्रियों के विचारों से प्रभावित हुए बिना रह सकी।

आस्टिन ने कुछ समय जर्मनी में रहकर रोमन विधि के अध्ययन में बिताया रोमन विधि के सुव्यवस्थित वैज्ञानिक निरूपण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जर्मनी से वापस लौटने पर इंग्लैंड की विधि में प्रति विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाई जाने पर बल दिया। ऑस्टिन की अन्य कृतियों में एप्लीकेशन फॉर कान्स्टीट्यूशन, भी एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।




यद्यपि हॉब्स ने भी संप्रभु शक्ति को ही विधि का स्रोत माना है।

तथा उनके विचार में विधि संप्रभुताधारी का समादेश है परंतु आस्टिन ने हाब्स के सामाजिक संविदा के सिद्धांत को निराधार माना है। तथापि हॉब्स की संप्रभु शक्ति की अविभाज्यता तथा अपरिमितता को स्वीकार करते हुए उन्होंने व्यक्त किया कि विधि ऐसी संप्रभु शक्ति का समावेश है।

उल्लेखनीय है कि आस्टिन के विश्लेषणात्मक प्रमापवाद की अनेक विधिवेत्ताओं ने आलोचना की है, प्रोफेसर एलेन ने इस आध्यात्मिक रीति मात्र निरूपित किया है ।

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