Section 351 Assault of (IPC) Indian Penal Code | भारतीय दंड संहिता की धारा 351 हमला को परिभाषित कीजिये

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Section 351 of IPC- हमले को परिभाषित करो उपर्युक्त दृष्टांतो से समझाइए-

भारतीय दंड संहिता 1807 की (Section 351 IPC) धारा 351 में हमला शब्द को परिभाषित किया गया है जिस अनुसार-
351.हमला (Section 351 IPC)- जो कोई कोई अंग विक्षेप या कोई तैयारी इस आशय से करता है। या यह संभाव्य जानते हुए करता है कि ऐसे अंकविक्षेप या तैयारी करने से किसी उपस्थित व्यक्ति को यह आशंका हो जाएगी, कि वह उस व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करने ही वाला है। वह हमला कहा जाता है।
स्पष्टीकरण- केवल शब्द हमले की कोटि में नहीं आते, किंतु जो सब कोई व्यक्ति प्रयोग करता है। वह उसके अंगविक्षेप या तैयारियों को ऐसा अर्थ दे सकते हैं, जिससे वे अंगविक्षेप या तैयारियां हमले की कोटि में आ जाएं।

निम्न दृष्टांतो से स्पष्ट हो जाता है, कि किन बातों एवं घटनाओं को (Section 351 IPC) हमला में शामिल किया गया है।

(क)  य पर अपना मुक्का क इस आशय से या यह संभाव्य जानते हुए हिलाता है कि उसके द्वारा य को यह विश्वास हो जाए कि क, य को मारने वाला ही है, क ने हमला किया है।
(ख)  य एक हिंसक कुत्ते की मुखबंधनी इस आशय से या यह संभावित जानते हुए खोलना आरंभ करता है कि उसके द्वारा य को यह विश्वास हो जाए कि वह य पर कुत्ते से आक्रमण कराने वाला ही है, क ने य पर हमला किया है।
(ग)  य से कहते हुए कि “मैं तुम्हें पीटूँगा“।  क एक छड़ी उठा लेता है, यहां यद्यपि क द्वारा प्रयोग में लाए गए शब्द किसी अवस्था में हमले की कोटि में नहीं आते ।और यद्यपि केवल अंगविक्षेप बनाना जिसके साथ अन्य परिस्थितियों का अभाव है । हमले की कोटि में ना भी आए तथा पर शब्दों द्वारा स्पष्टीकरण अंगविक्षेप हमले की कोटि में आ सकता है।

निम्नलिखित दो बातें किसी भी कार्य को हमला (Section 351 IPC) सिद्ध करने के लिए आवश्यक हैं-

अपराध की संरचना के लिए यह धारा दो बातों की अपेक्षा करती है-
1- किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति में कोई अंगविक्षेप या तैयारी करना।
2- इस संभाव्यता को आशय अथवा ज्ञान की उपस्थिति व्यक्ति उस अंगविक्षेप या तैयारी से यह आशंका कर सकता है, कि अंगविक्षेप या तैयारी करने वाला व्यक्ति उसके प्रतिकूल आपराधिक बल का प्रयोग करने वाला है।

(1)  कोई अंग विक्षेप या तैयारी करना-  धारा 351 (Section 351 IPC) का दृष्टांत-

 (क)  यह प्रस्तुत करता है कि कोई ऐसा अंगविक्षेप जो किसी व्यक्ति में यह आशंका  कारित करेगी, अंग विक्षेप करने वाला व्यक्ति उसके विपरीत आपराधिक बल का प्रयोग करने वाला ही है। तो वह अंग विक्षेप हमला की कोटि का अपराध माना जाएगा।




“जेम्स एवं विजय दत्त झा“ के वादों में इसी संदर्भ में यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया था, कि किसी व्यक्ति की ओर से भरी हुई पिस्तौल का लक्ष्य हमला की कोटि का अपराध है। आपराधिक बल के प्रयोग की आशंका उस व्यक्ति के प्रतिकूल होना आवश्यक है, जो अंगविक्षेप अथवा तैयारी का प्रदर्शन कर रहा है। यदि यह आशंका  आशंका अंगविक्षेप अथवा तैयारी का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति के प्रति ना होकर किसी अन्य व्यक्ति के प्रति होती हैं। तो यह अंगविक्षेप अथवा तैयारी का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया हमला नहीं माना जा सकता।
मुनेश्वर सिंह के वाद में अभियुक्त ने अपनी ओर से परिवादकर्ता के विपरीत ऐसा कोई कार्य नहीं किया था जो हमला की परिभाषा के अंतर्गत आता। परंतु उसने अपने अनुचारियों को ऐसा संकेत दिया था। जिसको देखते ही वह सब परिवादकर्त्त और संत संतर्जना के साथ थोड़ा सा आगे बढ़ जाए। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारण प्रदान किया था, कि अभियुक्त हमले के लिए दोषी नहीं है।

 हमले की स्थिति में अलग-अलग तथ्यों के लिए अलग-अलग धाराओं में दंड का प्रावधान है।

धारा 354 (Section 354 IPC) के अनुसार-354. स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग-     जो  किसी स्त्री के लज्जा भंग करने के आशय से या यह संभाव्य जानते हुए  कि तद् द्वारा वह उसकी लज्जा भंग करेगा। उस स्त्री पर पहला हमला करेगा, या आपराधिक बल का प्रयोग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 2 वर्ष तक ही हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
 इस धारा के अंतर्गत अश्लील हमला अथवा आपराधिक बल का प्रयोग दंडनीय बनाया गया है। अपराध की संरचना के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है, कि अभियुक्त का आशय हमला या आपराधिक बल प्रयोग द्वारा किसी स्त्री की लज्जा का हरण करना था। या उसे यह ज्ञात था कि यह संभाव्य है कि उसके हमले या आपराधिक बल प्रयोग से स्त्री की लज्जा भंग होगी। स्त्री के साथ बलात्संग करने के आशय से किया गया हमला या आपराधिक बल प्रयोग इस धारा के अंतर्गत दंडनीय ना होकर धारा 376 के अंतर्गत दंडनीय है।




 
पंजाब राज्य ब. मेजर सिंह- के  वाद में अभियुक्त ने एक घर में प्रवेश करके साढ़े सात मास की सो रही बालिका पर अश्लील आक्रमण किया था। यह अभिनिर्धारण प्रदान किया गया कि उसने इस धारा के अंतर्गत अपराध किया है। क्योंकि उसने केवल उस बालिका की लज्जा ही भंग की वरन् जो कुछ भी लज्जा वह नन्ही सी बालिका संजोए थी, उसे भंग करने के आशय से वह युक्त भी था।
 यह वाद एक प्रश्न उठाता है, कि क्या यह आवश्यक है, कि वह स्त्री जिसकी लज्जा भंग हुई है, स्वयं यह अनुभव करें कि उसकी लज्जा भंग हुई है। इसका उत्तर देते हुए न्यायाधीश मुधोलकर महोदय ने अभिमत व्यक्त किया था। की धारा 354 की किसी स्त्री की लज्जा भंग करने की बात करती है। अतः इस धारा की सहज व्याख्या से यही निष्कर्ष निकलता है। कि हमला अथवा आपराधिक बल प्रयोग से ग्रस्त महिला को स्वयं यह अनुभूति होना चाहिए, कि उसकी लज्जा को अपहरण कर लिया गया, परंतु यदि इस धारा की यही व्याख्या की गई है, तो बहुत से ऐसे हमले इस धारा की विस्तार सीमा से बाहर चले जाएंगे।
जिनसे अश्लील हमला या आपराधिक बल का प्रयोग ना केवल कच्ची उम्र की किसी बालिका पर किया गया है। वरन् ऐसी बालिका अथवा महिला पर भी किया गया है। जो अंकुरित अवस्था में है, या जो सो रही है, और जागती ही नहीं है, या जो अचेत्ति अवस्था में है, या जड़ मूर्ख है, या जिसकी मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है, कि अपनी लज्जा अथवा शीलहरण को जान सके, या उसकी अनुभूति कर सके। कुछ परिस्थितियों में घोर अनैतिक महिलाओं में भी अपने शील हरण की अनुभूति नहीं करती हैं।  तो क्या यही कहा जाएगा, कि इस धारा के निर्माण के पीछे दंड संहिता के प्रारूपकारों का यही आशय  था कि शील हरण के ऐसे मामले तभी इस धारा की विस्तार सीमा के अंतर्गत आ सकते हैं,  जब महिला स्वयं अपने  शील हरण अथवा लज्जा भंग की अनुभूति करें । (हमले को परिभाषित करो)




पुनः यदि लज्जा हरण का संपूर्ण मापदंड किसी विशिष्ट कार्य के प्रति महिला की प्रतिक्रिया ही मान ली जाती हैं। तो क्या यह मापदंड महिलाओं की अनुभूति और उनकी मान मर्यादा के क्रम से प्रत्येक परिस्थितियों में एक दूसरे से भिन्न नहीं हो सकता। अतः इस मापदंड को स्वीकार करना न्यायोचित नहीं लगता है, क्या अभियुक्त के कार्य से महिला ने अपनी लज्जा भंग की अनुभूति की थी। इस संबंध में यह स्वीकार करना पड़ेगा, की लज्जा भंग का विस्तार विस्तृत मापदंड स्थापित करना कठिन कार्य है। परंतु इतना तो कहा ही जा सकता है, कि यदि किसी महिला के विपरीत अथवा उसकी वीपर्यस्त परिस्थिति में किया गया। कोई कार्य मानव जाति के सामान्य भाव के अंतर्गत काम ध्वनित करता है, तो वह कार्य अवश्य ही इस धारा द्वारा अनुचिन्ति अनिष्ट परिहार के अंतर्गत आ जाएगा। (Section 351 IPC)
 
किसी महिला के उदर पर हाथ रख देने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, कि अभियुक्त का आशय धारा 354 के अर्थ अंतर्गत कोई अपराध कार्य करना था, या उसे परेशान करना था, आपराधिक आशय  से साबित किए जाने पर ही इस धारा के आधीन अभियुक्त को सिद्धदोष ठहराया जा सकता है।

धारा 355 (Section 355 IPC) के अनुसार- 355. गंभीर प्रकोपन होने से अन्यथा किसी व्यक्ति का अनादर करने से आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग- जो

दुष्प्रेरण भारतीय दंड संहिता की धारा 107 की परिभाषा- Definition of Abetment IPC 107

 

अन्यथा इस आशय से करेगा। की तद् द्वारा उसका अनादर किया जाए वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 2 वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से ,या दोनों दंड से, या दंडित किया जाएगा।

 गंभीर और अचानक प्रकोपन से परे किसी व्यक्ति का निरादर करने से के आशय से उस पर किया गया। हमला या आपराधिक बल का प्रयोग इस धारा के अंतर्गत दंडनीय बनाया गया है।  “अल्ताफ मियां“ के बाद में अभियुक्त ने निवारण के समय साक्ष्य कोष्ठ में खड़े उसके विपरीत साक्ष्य देने वाले पुलिस उप-निरीक्षक पर आपराधिक बल का प्रयोग कर उसे आहत कर दिया था। यह भी निर्धारित किया गया था, कि वह इस धारा के अंतर्गत दोषी था। (हमले को परिभाषित करो)
धारा 356 (Section 356 IPC) अनुसार- 356. किसी व्यक्ति द्वारा ले जाए जाने वाली संपत्ति की चोरी के प्रयत्नों में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग-  जो कोई किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग किसी ऐसी संपत्ति की चोरी करने के प्रयत्न में करेगा। जिसे वह व्यक्ति उस समय पहने हुए हो, या लिए जा रहा हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 2 वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से या, दोनों से दंडित किया जाएगा।




 
धारा 357 (Section 357 IPC) के अनुसार- 357. किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध करने के प्रयत्नों में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग- जो कोई किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति का सदोष  पर विरोध करने का प्रयत्न करने में करेगा। वह दोनों में से किसी बात के कारावास से जिसकी अवधि 1 वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो ₹1000 तक का हो सकेगा, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

धारा 358 (Section 358 IPC) के अनुसार- 358. गंभीर प्रकोपन  मिलने पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग-   जो कोई किसी व्यक्ति पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग उस व्यक्ति द्वारा दिए गए गंभीर और अचानक  प्रकोपन पर करेगा वह सादा कारावास से जिसकी अवधि 1 मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, ₹200 तक का हो सकेगा, या दोनों से ,दंडित किया जाएगा। (हमले को परिभाषित करो)

स्पष्टीकरण- अंतिम धारा उसी स्पष्टीकरण के अध्यधीन है जिसके अध्यधीन धारा 352 (Section 352 IPC) है।

 यह धारा गंभीर और अचानक प्रकोपन  की  स्थिति में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करने पर हल्के दंड का प्रावधान प्रस्तुत करती हैं। धारा 352 में निर्दिष्ट अपराध की प्रचलित प्रशमिता अवस्था इस धारा में अभिव्यक्त की गई है।।




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