सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – बहू को सास-ससुर के घर में रहने का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – बहू को सास-ससुर के घर में रहने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – बहू को सास-ससुर के घर में रहने का अधिकार
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बहू को सास-ससुर के घर में रहने का अधिकार

घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. इस फैसले का उद्देश्य बहू का ससुराल में अधिकार सुनिश्चित करना है. सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि ‘बहू को आश्रित ससुराल में रहने का अधिकार है. बहू को पति या परिवार के सदस्यों द्वारा साझा घर से निकाला नहीं जा सकता है.’ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर यह घर ससुराल वालों द्वारा किराए पर लिया गया है या उनका हो और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं है तो भी बहू को बाहर नहीं किया जा सकता.

तीन जजों की पीठ ने सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, आर सुभाष रेड्डी और एमआर शाह की पीठ ने तरुण बत्रा मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ के फैसले को पलट दिया है। दिल्ली के परिवार द्वारा दायर वाद पर सुनवाई करते हुए कहा कि देश में आज भी हर रोज कई महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं. इस दिशा में कड़े कदम उठाने की जरूरत है. घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट ने इस अपने फैसले में साफ कहा है कि पीड़ित पत्नी को अपने ससुराल की पैतृक और साझा संपत्ति यानी घर में रहने का कानूनी अधिकार होगा। पति की अर्जित की हुए संपत्ति यानि अलग से बनाए हुए घर पर तो अधिकार होगा ही। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में घरेलू हिंसा कानून 2005 का हवाला देते हुए कई बातें स्पष्ट की है।

पति या उसके रिश्तेदार पीड़िता पत्नी को बेदखल नहीं कर सकते




तरुण बत्रा मामले में दो जजों की पीठ ने कहा था कि कानून में बेटियां, अपने पति के माता-पिता के स्वामित्व वाली संपत्ति में नहीं रह सकती हैं। अब तीन सदस्यीय पीठ ने तरुण बत्रा के फैसले को पलटते हुए 6-7 सवालों के जवाब दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि पति की अलग-अलग संपत्ति में ही नहीं, बल्कि साझा घर में भी बहू का अधिकार है।

 

2005 के कानून (hindu succession act 2005) की स्पष्ट व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा ‘अकेली महिला को जीवनकाल में कई बार हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इसी दिशा में बना 2005 का कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है. इसमें उल्लिखित धारा 2 (एस) में दिए गए साझा घर की परिभाषा का मतलब उस घर से नहीं है जो संयुक्त परिवार का है, जिसमें पीड़िता के पति का हिस्सा है बल्कि जिसमें पति का स्वामित्व नहीं है उससे भी पीड़िता को बेदखल नहीं कर सकते.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि 2005 का कानून महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए पारित किया गया था.



घरेलू हिंसा कानून, 2005 के तहत किसी भी महिला को आश्रय का अधिकार दिया गया है. धारा 2(s) विवाहित महिला को पति के किसी भी ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ यानी ‘साझा मकान’ में आसरा पाने का हक देती है. 2006 में ‘एस आर बत्रा बनाम तरुणा बत्रा’ मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस बी सिन्हा और मार्कण्डेय काटजू की बेंच ने इसकी परिभाषा को सीमित कर दिया था.



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