उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 तथा विभिन्न संशोधन | Consumer Protection Act 1986 and Various Amendments

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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 तथा विभिन्न संशोधन:- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 ने 24 दिसंबर 1986 को स्वरूप ग्रहण किया। इसके खंड 1,2 तथा 10 को जम्मू व कश्मीर को छोड़कर समस्त भारत पर 15 -4-87 का अधिसूचना जारी करके लागू किया गया। 

 इस अधिनियम के प्रथम खंड में विविध शब्द की परिभाषा तथा विस्तार संबंधी जानकारी हैं। 

दूसरे खंड में विभिन्न परिषद के गठन व क्रियाकलापों आदि संबंधी सूचनाएं चौथे खंड में विविध विषयों पर चर्चा है । जो मुख्यतः फोरम के अधिकारी व कार्यों से संबंध है। 

 खंड 3 को अधिसूचना द्वारा  10- 6-19 87 से प्रभावी माना गया है। खंड तीन पूर्ण रूप से फोरम के गठन कार्य पद्धति तथा अधिकारियों तथा आदि से संबंध है। 

 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1991 – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 तथा विभिन्न संशोधन

 इस अधिनियम के इस प्रथम संशोधन में फोरम के गठन व कार्य करने पर विचार किया गया। फोरम में एक अध्यक्ष व 2 सदस्य होते हैं। वह इस प्रकार के कुल 3 सदस्य की खंडपीठ होती है। संशोधन में यह बात जोड़ी गई है। कि फोरम की प्रक्रिया को चलाने के लिए एक अध्यक्ष व एक सदस्य का रहना अनिवार्य है।  अध्यक्ष की अनुपस्थिति में 2 सदस्य कार्य प्रक्रिया नहीं चलाई जा सकती। आगे चलकर इस बात को भी स्पष्ट किया गया है। कि यदि किसी कारणवश अध्यक्ष अनुपस्थिति हो या उसका स्थान रिक्त हो तो ऐसा कोई व्यक्ति जो अध्यक्ष के पद के लिए योग्य हो उसके स्थान पर कार्य कर सकता है। व फोरम की प्रक्रिया चलाई जा सकती है। 

 उपभोक्ता संरक्षण(संशोधन) अधिनियम 50- 1993 दिनाँक 18-6-1993

एक बहुत ही विस्तृत संशोधन था। इस संशोधन के माध्यम से कई शब्द परिभाषित किए गए व कई नए प्रावधान जोड़े गए। 

1- अधिसूचना संख्या एस ओ 390(ई/ दिनांक 15- 4-1987

2- अधिसूचना संख्या एस ओ 568(ई) दिनांक 10-6- 1987

3-  उपभोक्ता फोरम किस प्रकार की लैबोरेट्री से वस्तुओं की जांच कराये-यह परिभाषित किया गया है।

4-  जितने व्यापार पद्धति को भी उपभोक्ता कानून की परिधि में लाया गया। 

 5- वस्तु दोष के साथ-साथ सेवा में कमी को भी पहली बार उपभोक्ता कानून के अंतर्गत समेटा गया। 

 इसमें पूर्व जिला स्तर के फोरम एक लाख तक के मामले सुन सकते थे। अब 5,00,000 तक के मामले सुन सकेगी।,इसी प्रकार राज्य आयोग 5,00,000 से 20,00,000 तथा राष्ट्रीय आयोग 20 लाख से एक करोड़ तक के मामले सुनने का अधिकार पा गया। 

 यदि उपभोक्ता झूठी व दूसरे पक्ष को तंग करने के लिए शिकायत करता हो तो उसे भी दोषी माना जा सकता है। वह क्षतिपूर्ति के आदेश उसके विरुद्ध भी जारी किए जा सकते हैं। यह नया प्रावधान इस संशोधन में जोड़ा गया। 

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 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 61- 2002 दिनांक 17 -12 -2002

पिछले संशोधन की तरह वर्ष 2002 का संशोधन भी पर्याप्त व्यापक है। जिस पर विशद चर्चा ही नहीं हुई अनेक आपत्तियां भी उठाई गई। अंततः संशोधन हुआ। व इस कल्याणकारी अधिनियम का स्वरूप पहले से अधिक निखर कर सामने आया।  इस संशोधन के मुख्य बिंदु है-

1- आर्थिक क्षेत्राधिकारी में वृद्धि –

जिला उपभोक्ता फोरम -500000 से बढ़कर 2000000

 राज्य आयोग -20 लाख से एक करोड़ तक

 राष्ट्रीय आयोग -एक करोड़ से ऊपर

2- प्रक्रिया के लिए समय सीमा का निर्धारण

 शिकायत स्वीकार/अस्वीकार करना- 21 दिन के भीतर

  अधिकृत शिकायत का नोटिस देना- 21 दिन में

 विपक्ष का उत्तर देने के लिए समय देना- 30 दिन

 शिकायत का निपटान- 3 महीने में

 लैब टेस्टिंग संबंधी शिकायत का निपटान -5 महीने में

 राज्य आयोग व नेशनल आयोग द्वारा अपील का निपटारा- 90 दिन में

3- उपभोक्ता फोरम को अंतरिम आदेश की शक्तियां प्राप्त। 

4- कोरियर फैक्स व स्पीड पोस्ट द्वारा भी नोटिस दिया जाना। 

5- अध्यक्ष की अनुपस्थिति में वरिष्ठ सदस्य द्वारा अध्यक्ष के कार्य को देखना। 

6- अनुचित व्यापार पद्धत की विस्तृत व्याख्या। 

7- राष्ट्रीय आयोग द्वारा अपने ही आदेश पर पुनर्विचार। 

8- उपभोक्ता अदालत द्वारा जारी आदेशों के पालन के लिए फोरम कमीशन को प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के आधार अधिकार प्राप्त। 

9- सेवा की परिभाषा में विस्तार

कुल मिलाकर यह एक वृहद अधिनियम बन गया। व उपभोक्ताओं के लिए सिविल न्यायालय के समानांतर एक सरल सुलभ व कम खर्चीली न्याय व्यवस्था के द्वार और खुले हो गये।। 

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