भारतीय सविधान में विधिक शासन की अवधारणा | भारतीय संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया

भारतीय सविधान में विधिक शासन की अवधारणा | भारतीय संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया
भारतीय सविधान में विधिक शासन की अवधारणा | भारतीय संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया
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भारतीय संविधान की उद्देशिका – (Preamble of Indian Constitution)

 
 
भारतीय संविधान की उद्देशिका उन आदर्शों एवं प्रेरणाओं का द्योतक है जिसके लिए ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया गया था. “हम भारत के लोग शब्द अमेरिकी संविधान की उद्देशिका, हम संयुक्त राज्य के लोग और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रारम्भिक शब्द हम
संयुक्त राष्ट्र संघ के लोग से उधार लिया गया है। 
 
 

उद्देश्यिका के तत्व-उद्देशिका उद्घोषित करती है-

 
 
हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्म निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय-विचार, अभिव्यक्ति विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत् दो हजार छह, विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते है। 
 
 

भारतीय सविधान में विधिक शासन की अवधारणा

 

  • विधिक शासन की अवधारणा सविधान का एक आयाम है यह निरंकुशता के विरुद्ध है और प्रत्येक स्थान पर इसकी पहचान व्यक्ति की स्वतंत्रता से की जाती है। 

 
  • विधिक शासन पद फ्रेंच सूत्र la principa de legalite (विधिकता का सिद्धांत) से व्युत्पन्न (derive) हुआ है जिसका अर्थ यह है कि सरकार विधि के सिद्धांत पर कार्यरत रहे न कि व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह सनक के आधार पर, 
 
 
  • ब्रिटिश विधि शास्त्री विधिक शासन व जनीतिज्ञ दार्शनिक एडवर्ड कोक की. उपज है जिसने यह प्रतिपादित किया कि राजा को ईश्वर व विधि के अधीन होना चाहिए और इस प्रकार कार्यपालिका के दावे पर विधि की तथा संसद पर सामान्य अधिकार व तर्क की श्रृंखला होनी चाहिए, श्रेष्ठता होनी चाहिए। प्राचीन ग्रीक दार्शनिक अरस्तु ने विधिक शासन की अवधारणा के संदर्भ में कहा था कि विधि को शासन करना चाहिए. 
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विक्टोरिया स्वर्ण काल में ए. बी. डाइसी ने अवधारित किया कि जहाँ विवेकाधिकार है वहां निरंकुशता के लिए स्थान रहेगा। 

 

डाइसी ने विधिक शासन के तीन सिद्धांत प्रतिपादित किये-

 
 
(1) सरकारी कार्मिकों में विवेकाधिकार शक्ति का प्रयोग ज्ञात व स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए न कि सनक whimsical) के आधार पर
 
(2) कोई व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं है चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो. उसके साथ विधि के न्यायालय के समक्ष समानता का आचरण किया जाना चाहिए चाहे वह प्रधानमंत्री हो अथवा कांस्टेबल इस संदर्भ में विधिक शासन के निम्न निहित अर्थ हैं-
 
(i) किसी सरकारी अथवा अन्य व्यक्ति के पास विशेषाधिकार की गैर विद्यमानता। 
(ii) सभी व्यक्ति चाहे वह किसी प्रास्थिति का हो सामान्य न्यायालय के समक्ष क्षेत्राधिकार की अधीनता। 
(iii) प्रत्येक व्यक्ति राज्य के साधारण विधायी अंग द्वारा पारित विधि द्वारा नियन्त्रित होना चाहिए। 
 

(3) न्यायिक प्रशासन के संदर्भ सभी व्यक्तियों (ब्रिटेन में) के अधिकार न्यायालय द्वारा मान्य स्रोत रूढ़ियों एवं परम्परायें हैं। 

 
 
डायसी के तीन सिद्धांतों में से ऊपर के दो सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में अधिरोपित हैं अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत सभी व्यक्तियों को विधि के विरुद्ध एवं विधियों का समान संरक्षण प्राप्त है. अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य किसी व्यक्ति को भारत के राज्य क्षेत्र में विधि के समक्ष समता अथवा विधियों के समान संरक्षण को नहीं नकारेगी। 
 
किन्तु तीसरा सिद्धांत कि लोगों के अधिकारों का स्रोत रूढ़ियां अथवा परम्पराएं हैं भारत में नहीं मान्य है क्योंकि भारत में अधिकारों का स्रोत संविधान है। 
 

भारतीय संविधान में विधिक शासन के निम्न आयाम हैं-

 
 
प्रथम, अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत वर्ग विधायन का प्रतिषेध किन्तु विधायन द्वारा युक्तियुक्त वर्गीकरण के मान्यता प्रदान की गयी है. अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत समानता के दो आयाम हैं. एक तो यह कि वर्गीकरण में स्वेच्छाचारित नहीं होनी चाहिए, और दूसरा यह कि समानों को न कि असमानों का समान वर्गीकरण होना चाहिए। 
 
 
एम. नागराज बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया है कि समानता का संवैधानिक सिद्धांत विधिक शासन में अन्तर्निहित है. विधिक शासन का प्राथमिक सम्बन्ध विधि का तत्व नहीं है, अपितु इसके प्रवर्तन एवं क्रियान्वन से ही विधि के शासन की
तुष्टि तभी हो जाती है जब विधियों को समानता से प्रवर्तित अथवा लागू किया जाता है, अतः उसे समरूप ढंग से किसी पक्षपात (bias) के बगैर तथा बगैर अतार्किक भेदभाव से प्रवर्तित अथवा लागू किया जाता है। 
 

समानता जनतंत्र का आवश्यक तत्व है और तदनुरूप संविधान का मूलभूत ढांचा है। 

 
 
दूसरा, अनुच्छेद 19(1)(a) के अन्तर्गत प्रदत्त स्वतंत्रताएं विधिक शासन का भाग हैं। अधिरोपित प्रतिबन्ध की युक्तियुक्ता अनुच्छेद (2–6) विधिक शासन का तत्व है। 
 
 
तीसरा, अनुच्छेद 20 के अन्तर्गत (1) पूर्वतिथि विधि द्वारा दण्ड से संरक्षण (ii) दोहरे दण्ड के विरुद्ध संरक्षण तथा (iii) स्वयं के विरुद्ध सक्षी होने के लिए बाध्यता के विरुद्ध संरक्षण विधिक शासन का भाग है.
 
 
चौथा, अनुच्छेद 21 एवं 22 के अन्तर्गत जीवन व स्वतंत्रता की रक्षा अर्थात केवल यथोचित विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही जीवन व स्वतंत्रता से निरूद्धि जाँच की मेनका गांधी बनाम भारत संघ द्वारा प्रतिपादित किया गया था, विधि शासन का अंग है अतः 
 
 
(i) विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया अर्थात विधि द्वारा स्थापित युक्त्युिक्त प्रक्रिया द्वारा ही किसी व्यक्ति को उसके जीवन व स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। 

 
(ii) अनुच्छेद 14, 19(2) तथा 21 में अन्तर्सम्बन्ध अतः विधायिका तथा कार्यपालिका का निर्णय युक्तियुक्त होना चाहिए जो कि विधिक शासन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। 
 
 
पाँचवां, अनुच्छेद 22 में उल्लेखित निम्न पांच सिद्धांत निवारक निरोध करने वाले प्राधिकारियों पर अंकुश लगा कर गिरफ्तारी तथा आपराधिक विधि को मानवीय चेहरा प्रदान करते है। 
 
 
(i) गिरफ्तार अभिव्यक्ति के गिरफ्तारी के आधार को संसूचित करना।
(ii) अंपनी पसन्द के वकील से परामर्श का अधिकार।
(iii). मिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना।
(iv) गिरफ्तार व्यक्ति का मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना चौबीस घंटे से गिरफ्तार करने वाले पुलिस अथवा प्राधिकारी की अभिरक्षा में न रखना।
 
 

छठवां, न्यायिक स्वतंत्रता, विधिक शासन की महत्वपूर्ण प्रकृति है जो संविधान के निम्न प्रावधानों में उल्लिखित है-

 
(i) अनुच्छेद 124(2) के अन्तर्गत न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका का न्यूनतम हस्तक्षेप और राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम  न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा के परामर्श की अपरिहार्यता उच्चतम न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकार्ड बनाम भारत संघ तथा इन रि प्रेसिडन्सियल संदर्भ मामले में कलेजियम की संस्तुति व परामर्श को कार्यपालिका अर्थात राष्ट्रपति पर बाध्यकारिता,
 
 
(ii) अनुच्छेद 124 (4) के अन्तर्गत न्यायाधीशों के निष्कासन की विशेष कठोर, प्रक्रिया है ताकि न्यायपालिका की संपत्ति को संरक्षित किया जा सके।
 
 
(iv) Article अनुच्छेद 121 के अन्तर्गत संसद में न्यायाधीशों के आचरण पर बहस की केवल उनके निष्कासन प्रक्रिया के दौरान तक ही सीमित रखना।
 
 
(v) अनुच्छेद 125(2) यह सुनिश्चित करता है कि न्यायाधीशों के विशेषाधिकार व परिलब्धियां नियुक्त के बाद यहां तक कि उनके अलाभ में परिवर्तित नहीं की जा सकती।
 

(vi) अनुच्छेद 124(7) किसी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवा निवृत्त के पश्चात् उच्चतम न्यायालय सहित भारत के किसी भी न्यायालय में उसके व्यवसाय पर प्रतिबन्ध इसी प्रकार का प्रतिबन्ध अनुच्छेद 220 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर यह है कि वे अपने राज्य के अथवा न्यायालय में अथवा अन्य किसी अधीनस्थ न्यायालय में व्यवसाय नहीं कर सकेंगे।
 
सातवां, ( अनुच्छेद 32, 226, 136, 142 एवं 144 अनुच्छेद 32 के अधीन उपयुक्त प्रक्रिया के प्रयोग के लिए स्वतंत्र उच्चतम न्यायालय किसी सिविल आपराधिक अथवा साक्ष्य प्रक्रिया से बाध्य नहीं है और प्रावधान उच्चतम न्यायालय के हाथ में लोगों की स्वतंत्रता का एक सशक्त हथियार हैं। 
 
 
(i) अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय की सम्पूर्ण न्याय की शक्ति, अनुच्छेद 136 विशेष याचिका शक्ति तथा अनुच्छेद 144 किसी मामले को एक राज्य से दूसरे राज्य में अन्तरित करने की शक्ति प्रदान करता है। जाहिरा शेख बनाम गुजरात राज्य का मामला इन अनुच्छेदों के प्रयोग का ज्वलंत उदाहरण है. जहां सम्पूर्ण न्याय देने के लिए गुजरात दंगा पीड़ित जाहिरा शेख के मामले को गुजरात से हटाकर बम्बई कर दिया गया था। 
 

(iii) अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत लोक हित वाद द्वारा एक नए क्रांतिकारी विधि शास्त्र विकसित करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरण बचाने की सुरक्षा, बलात्संग पीड़ित महिलाओं, कामकाजी महिला, पुलिस मुठभेड़ में व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति के लिए उपयोग किया है, 
 
 
आठवां, केशवानन्द भारती , एम, नागराज, आई.आर. सिल्हो, अशोक कुमार ठाकुर के मामलों में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 14 को अनुच्छेद 16(4)  तथा (4B)19 के साथ सामंजस्थित किया है और यह विचार स्थापित किया है कि जहाँ अनुच्छेद 14 सामान्य समानता दर्शित करता है वही अनुच्छेद 15(3).(4) एवं 16(4)(4A), (AB) विशिष्ट समानता अर्थात विशिष्ट वर्गों को समानता देने के लिए उपलब्ध है।
 
 
नवां, अनुच्छेद 32450. 3255 तथा 32669 चुनाव द्वारा भारतीय मतदाताओं की इच्छा द्वारा ही सरकार स्थापित करने की मान्यता देता है और यह जनता से, जनता द्वारा तथा जनता के लिए सिद्धांत को स्थापित करता है। 

 
दसवाँ, उच्चतम न्यायालय ने लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम भारत संघ के मामले में लिंगानुतरितियोंहिजड़ों की (Transgenders) तीसरे लिंग के रूप में पहचान, उनके व्यक्तिगत, सामाजिक, शैक्षिणिक व नियोजन की सुरक्षा व अधिकार को विधिक शासन घोषित
किया है। 
 
 
एकादशवाँ, उच्चतम न्यायालय ने 25 सितम्बर, 2014 को मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में राष्ट्रीय अपील न्यायाधिकरण की स्थापना को कर मामलों से सम्बन्धित विधि के सारभूत प्रश्नों के निर्धारण की शक्ति प्रदान करने को उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226 तथा 227 के अधीन प्रदत्त क्षेत्राधिकार पर अतिक्रमण माना है जो कि न्यायिक स्वतन्त्रता का उल्लंघन मानते हुए न्यायिक स्वतन्त्रता को विधिक शासन का अन्तरंग माग घोषित किया है जो संविधान का मूलभूत ढांचा है। 
 

 

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