माध्यस्थम एवं सुलह अधिनियम 1996 का संक्षिप्त इतिहास | Brief History of Arbitration and Cancellation Act 1996 

माध्यस्थम एवं सुलह अधिनियम 1996 का संक्षिप्त इतिहास | Brief History of Arbitration and Cancellation Act 1996 
माध्यस्थम एवं सुलह अधिनियम 1996 का संक्षिप्त इतिहास | Brief History of Arbitration and Cancellation Act 1996 
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माध्यस्थम एवं सुलह अधिनियम 1996 का संक्षिप्त इतिहास | Brief History of Arbitration and Cancellation Act 1996

 

मध्यस्थता का संक्षिप्त इतिहास – भारतवर्ष में शान्तिपूर्ण तरीके से विवाद को सुलझानें के लिए पंचायतों का सहारा लेना अति प्राचीन कहा जा सकता है और यह विधा अभी भी अपने अस्तित्व में है। भारत में अंग्रेजों के आने के बाद अंग्रेजी विधि का प्रवेश 1726 में माना जाता है। बंगाल रेगुलेशन 1772, 1781, 1787 मध्यस्थता विधि के पोषक रहे हैं।




रेगुलेशन 1793 ने 200 रु. से कम के मामलों को न्यायालय द्वारा मध्यस्थता में भेजने की पूर्ण स्वतन्त्रता दे दी। मध्यस्थता की विधा (Mechanism) को के रेगुलेशन्स से भी बढ़ोत्तरी हुई है। मद्रास को 1816 तथा बाम्बे को 1827 के रेगुलेशन से माध्यस्थम विधि दी गई।प्रथम सुव्यवस्थित एवं पूरे ब्रिटिश इण्डिया को समाहित करने वाली माध्यस्थम विधा को समर्पित आबीट्रेशन एक्ट 1840 एवं सी पी सी 1859 बना।

 

इसके बाद सी पी सी में सुधार होते-होते 1908 में इसको Reenact किया गया और माध्यस्थम की विधा को बढ़ावा तथा सुरक्षा देने में संविदा विधि, 1872, स्पेसेफिक रिलीफ एक्ट, 1878 भी रहे। 1899 में भारतीय मध्यस्थता अधिनियम पारित किया गया जो सी0 पी0 सी0 1908 के साथ-साथ माध्यस्थम 1802, 1814, 1822, एवं 1883 विधा को आगे बढ़ाता रहा परन्तु 1940 में समग्र तथा वृहद मध्यस्थम अधिनियम पारित किया गया जिसे 1996 में निष्क्रिय (Repeal) करके वर्तमान माध्यस्थम एवं समझौता अधिनियम, 1996 पारित किया गया है ।




माध्यस्थम विधि की आवश्यकता

 

1992 में सार्वभौमिक तथा उदारीकरण (globalisation and liberalization) नीति का आर्थिक तथा औद्योगिक क्षेत्र में भारत में भी सूत्रपात हुआ जिसमें विदेशी पूंजीपतियों द्वारा भारत में निवेश की सम्भावना बनी। निवेश बढ़ाने के लिए, उनकी समस्याओं का त्वरित निदान प्राप्त करने के उद्देश्य से माध्यस्थम तथा अन्य वैकल्पिक विवाद निपटान की विधा (Mechanism) को भारत में प्रयुक्त करना आवश्यक हो गया और न्यायालयीय हस्तक्षेप, अधिक व्यय, अधिक समय तथा विभिन्न टेक्निकल संव्यवहार से छुटकारा पाना समय की माँग हो गई और विदेशी निवेश तथा आर्थिक प्रगति प्राप्त करना आवश्यक समझा गया जिसके लिए त्वरित कम खर्च और सौहार्द्र उत्पन्न करने वाले विवाद निपटान की आवश्यकता की पूति के लिए 1996 में आज का माध्यस्थम विधायन Arbitration and Conciliation Act, 1996 पारित किया गया जिसमें अपने देश तथा अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम की व्यवस्था की गई।




सुलहकर्त्ता तथा अन्य वैकल्पिक विवाद निपटान की विधा को नया स्थान दिया गया। इस प्रकार यह विधायन समग्र तथा विस्तृत स्वरूप में है। यह विधायन दोनों पक्षों को बराबरी का स्थान देता है, उनको अपने मध्यस्थ चुनने की स्वतन्त्रता देता है, माध्यस्थम अधिकरण को न्यायालय के समान अधिकार देता है तथा पंचाट को डिक्री की तरह प्रयुक्त करने की शक्ति देता है। न्यायालयीय हस्तक्षेप निम्न है। तथा माध्यस्थम के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही न्यायालय बीच में आता है जैसे-जब पक्षकार मध्यस्थ न नियुक्त कर सके, जब पंचाट में किसी पक्ष के साथ अन्याय हुआ हो या ऐसे मामले का निपटारा कर दिया गया हो जिसे संदर्भित ही नहीं किया गया हो, इत्यादि।




अभी तक यह विधायन पर्याप्त रूप से सफल रहा है। इसके सुलह का अतिरिक्त प्रावधान तथा अन्य वैकल्पिक विवाद निपटान विधा का समावेश इस विधायन को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिला रहा है। आर्थिक औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र में इस विधायन का प्रयोग सुचारू रूप से किया जा रहा है और लगभग सभी व्यापारिक संविदाओं में माध्यस्थम् वाक्य (Arbitration Clause) का समावेश रहता है। जिससे आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय न जाकर माध्यस्थम द्वारा विवाद का शीघ्र निपटारा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में किया जा सके।




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