Describe the arrangement in Madras under the East India Company in Hindi | ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन मद्रास में व्यवस्था का वर्णन कीजिए

Describe the arrangement in Madras under the East India Company in Hindi | ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन मद्रास में व्यवस्था का वर्णन कीजिए
Describe the arrangement in Madras under the East India Company in Hindi | ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन मद्रास में व्यवस्था का वर्णन कीजिए
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मद्रास की न्याय व्यवस्था- ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के अधीन मद्रास में व्यवस्था का वर्णन कीजिए

सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने के पश्चात अंग्रेजों (East India Company) का अगला लक्ष्य मद्रास था। यह अंग्रेजो की विस्तार वादी नीति का एक पहलू था। सन 1639 में मद्रास में एक अन्य फैक्ट्री स्थापित की गई। इस स्थल को सेंटजॉर्ज फोर्ट नाम दिया गया। भूमि के दाम के साथ ही उस हिंदू शासक ने मद्रास पट्टनम नामक एक और गांव भी कंपनी यानि (East India Company) को प्रदान किया। इस स्तर पर कंपनी ने अपना व्यापार प्रारंभ किया। बाद में इस फैक्ट्री के प्रशासन हेतु एक एजेंट नियुक्त किया गया। जो सूरत के अधीन होता था। इस फोर्ट के अंदर अंग्रेज रहते थे। तथा फोर्ट के बाहर बहुत से भारतीय आकर बस गए। भारतीयों के बस्ती का नाम काला नगर रखा गया। तथा जहां अंग्रेज रहते थे। उसे श्वेत नगर कहकर पुकारा गया।  काला नगर व श्वेत नगर को मिलाकर वर्तमान मद्रास का निर्माण किया गया।




मद्रास की न्याय व्यवस्था निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण हुई-The East India Company History

प्रथम चरण (1639-1665) – प्रथम चरण अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। क्योंकि इसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया गया। इस काल में न्याय व्यवस्था निम्न प्रकार की थी-
1- श्वेत नगर में अंग्रेज एजेंट (East India Company) एवं उसकी परिषद न्याय व्यवस्था के कार्य को संभालते थे। परिणाम स्वरूप श्वेत नगर में इंग्लैंड के कानून को ही लागू किया जाता था। एजेंट एवं उसकी परिषद दीवानी तथा फौजदारी दोनों प्रकार के विवादों का फैसला करते थे। किंतु इनकी न्याय शक्ति अत्यंत ही सीमित और अनिश्चित थी। जहां आगजनी जैसी घटनाएं होती थी। वहां निर्णय लेने में काफी संकोच होता था। तथा निर्णय के लिए इंग्लैंड भागना पड़ता था। क्योंकि उस समय संचार व्यवस्था ठीक नहीं थी। इस कारण न्याय प्रशासन में विलंब होता था। और यह बहुत असंतोष जनक परिस्थिति थी। इतिहास का अध्ययन करने पर उस समय के एक अभियोग का वर्णन मिलता  है। जिसमें दो अंग्रेजों का राजद्रोह के अपराध में कोड़ों से पीटा गया।
2- भारतीयों को न्याय देने के लिए चाउल्ट्री  न्यायालय की व्यवस्था थी। इस न्यायालय  के पदाधिकारी को अधिकार की संज्ञा दी गई थी। कालांतर से कुछ अधिकार भ्रष्ट हो गए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) ने कैप्टन मारिटिन  एवं जॉनले को अधिकार के पद पर नियुक्त किया गया। यदि कोई भारतीय क्रूर अपराध करता था। तो उसे हिंदू शासक की आज्ञा से अंग्रेजी कानून के अनुसार दंडित किया जाता था। इस प्रकार मद्रास में हिंदू शासक की अनुमति से इंग्लैंड का कानून भी लागू होता था।
 इस न्यायालय द्वारा दीवानी तथा फौजदारी के मामलों में दिए गए निर्णय के बारे में अधिक विवरण तो नहीं मिलता है। परंतु सन 1642 में एक भारतीय को अपने साथ रहने वाली औरत के हत्या के आरोप में आयोजित किया गया था। घर की तलाशी में औरतों के कपड़े तथा जेवर मिले थे। साधारण खोजबीन के द्वारा उसे दोषी माना गया। और दंडित करने के लिए उस व्यक्ति को राजा के पास भेजा गया। राजा ने एजेंट को यह आज्ञा दी कि इस मामले में निर्णय इंग्लैंड की विधि के अनुसार किया जाए तत्पश्चात उस व्यक्ति को फांसी दे दी गई।




 न्याय व्यवस्था का प्रथम चरण घोर भ्रष्टाचार व अव्यवस्था का शिकार था। जनता में अपरोक्ष रोष था। किंतु जुबान बंद रहती थे। ब्लैक टाउन तथा व्हाइट टाउन के लिए पृथक- पृथक न्याय व्यवस्था अनुचित असंगत तथा पूर्ण रूप से आतंकित थी।
द्वितीय चरण (1665-1688) – दूसरे चरण में न्याय व्यवस्था में शनैः शनैः परिवर्तन कर दिया गया था । सन् 1666 में मद्रास भी प्रेसिडेंट नगर बन गया था। तथा यहां एक प्रेसिडेंट नियुक्त हुआ, इस काल में मद्रास की व्यवस्था में सुधार किए गए।

यह सुधार निम्नलिखित है-

1- चाउल्ट्री न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा दी गई थी। इस अदालत में भी इंग्लैंड की न्याय पद्धति लागू की गई। इस प्रकार भारतीय न्यायालय इंग्लैंड का कानून लागू करने लगी।
2- गवर्नर की परिषद को न्यायिक अधिकार दे दिए गए थे।
3- भ्रष्ट व अनैतिक व्यापार में संलिप्त व्यापारियों को दंडित करने के लिए एडमिरल्टी कोर्ट की स्थापना की गई।




वास्तव में इस काल में गवर्नर की परिषद न्याय प्रदान करने में एकदम अक्षम थी।  क्योंकि गवर्नर और कौंसिल को कानून का अल्प ज्ञान था। इस कारण फौजदारी के मामलों में न्याय करते समय अपने को असमर्थ पाते थे। गंभीर तथा जटिल मामलों में अपने उच्च अधिकारियों की राय लेने इंग्लैंड भेजा करते थे। जब तक अधिकारी इंग्लैंड से वार्ताकर वापस नहीं आ जाता था। उसे एक लंबे समय तक  जेल में रहना पड़ता था। मार्च 1678 में एक प्रस्ताव में गवर्नर तथा उसकी काैंसिल ने सभी दीवानी और फौजदारी अभियोग को 12 सदस्यों की सूची की सहायता से इंग्लैंड की विधि के अनुसार सप्ताह में दो बार सुनने का निश्चय किया। इसे उच्च न्यायालय की संज्ञा दी गई। इस नई व्यवस्था की स्थापना के बाद एक अंग्रेज अभियुक्त को उच्च न्यायालय के समक्ष न्याय   का कानून भी लागू होता था।
 इस न्यायालय द्वारा दीवानी तथा फौजदारी के मामलों में दिए गए निर्णय के बारे में अधिक विवरण तो नहीं मिलता है। परंतु सन् 1642 में एक भारतीय को अपने साथ रहने वाली औरत के हत्या के आरोप में आयोजित किया गया था। घर की तलाशी में औरतों के कपड़े तथा जीवन मिले थे। साधारण खोजबीन के द्वारा उसे दोषी माना गया। और दंडित करने के लिए उस व्यक्ति को राजा के पास भेजा गया। राजा ने एजेंट को यह आज्ञा दी कि इस मामले में निर्णय इंग्लैंड की विधि के अनुसार किया जाए तत्पश्चात उस व्यक्ति को फांसी दे दी गई।




 न्याय व्यवस्था का प्रथम चरण घोर भ्रष्टाचार व अव्यवस्था का शिकार था जनता में अपरोक्ष रोष था किंतु जवान बंद रहती थे ब्लैक टाउन तथा व्हाइट टाउन के लिए पृथक पृथक न्याय व्यवस्था अनुचित असंगत तथा पूर्ण रूप से आतंकित थी।
द्वितीय चरण (1665-1688)  दूसरे चरण में न्याय व्यवस्था में शनैः शनैः परिवर्तन कर दिया गया था सन 1666 में मद्रास भी प्रेसिडेंट नगर बन गया था तथा यहां एक प्रेसिडेंट नियुक्त हुआ इस काल में मद्रास की व्यवस्था में सुधार किए गए यह सुधार निम्नलिखित है-

पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद – आपसी सहमति से तलाक के नियम

वास्तव में इस काल में गवर्नर की परिषद न्याय प्रदान करने में एकदम अक्षम थी।  क्योंकि गवर्नर और काउंसिल को कानून का अल्प ज्ञान था इस कारण फौजदारी के मामलों में न्याय करते समय अपने को असमर्थ पाते थे गंभीर तथा जटिल मामलों में अपने उच्च अधिकारियों की राय लेने इंग्लैंड भेजा करते थे जब तक अधिकारी इंग्लैंड से वार्ता कर वापस नहीं आ जाता था उसे एक लंबे तक जेल जेल में रहना पड़ता था मार्च 1678 में एक प्रस्ताव में गवर्नर तथा उसकी काउंसिल ने सभी दीवानी और फौजदारी अभियोग को 12 सदस्यों की सूची की सहायता से इंग्लैंड की विधि के अनुसार सप्ताह में दो बार सुनने का निश्चय किया इसे उच्च न्यायालय की संज्ञा दी गई इस नई व्यवस्था की स्थापना के बाद एक अंग्रेज अभियुक्त को उच्च न्यायालय में सक्षम समक्ष न्याय के लिए प्रस्तुत किया गया और उसे स्वरक्षार्थ हत्या का अपराधी पाया गया और दंड स्वरूप उसका माल असबाब और पशु जब्त कर लिए गए।




तीसरा चरण (1688-1725):-    मद्रास स्थित न्यायिक व्यवस्था का सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण तीसरा चरण था। क्योंकि इस चरण में कंपनी का अंतिम चार्टर प्रस्तुत किया गया था। इस चार्टर के द्वारा श्वेत नगर तथा काला नगर का विलीनीकरण हुआ ।कंपनी ने चार्टर जारी करके एक निगम स्थापित किया। यह निगम लंदन निगम का प्रतिरूप था।

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 कंपनी (East India Company) द्वारा स्थापित किए गए निगम में एक मेयर होता था। इस निगम में 12 एल्डरमैन तथा 60 से अधिक अन्य सदस्य होते थे। निगम का मेयर तथा एल्डरमैन एक न्यायालय की रचना करते थे। जिसको मेयर न्यायालय कहा जाता था। यह मेयर न्यायालय अभिलेख न्यायालय थी न्यायालय अपराध एवं व्यवहार दोनों प्रकार के मुकदमों की सुनवाई कर सकती थी। मृतकों की संपत्ति का विवरण भी इसके अधिकार क्षेत्र में था। यह न्यायालय विभिन्न प्रकार के दंड भी दे सकती थी। इस प्रकार में जूरी पद्धति लागू की गई थी । इसमें एक विशेषता यह थी, कि इस न्यायालय के विरुद्ध एडमिरल्टी कोर्ट में अपील हो सकती थी। वहां उस अपील की सुनवाई हो सकती थी-

 अतः तीसरे चरण में  मद्रास में निम्नलिखित अदालतें कार्यरत थी।

1- चाउल्ट्री कोर्ट।
2- मेयर न्यायालय।
3- एडमिरल्टी कोर्ट।
4- हाई कोर्ट ऑफ़ मद्रास जिसका निर्माण गवर्नर एवं उसकी परिषद द्वारा होता था।
यहां मुख्य बात यह थी, कि तीन न्यायालय न्याय का कार्य करते थे।  चाउल्ट्री न्यायालय में न्यायालय और सामुद्रिक न्यायालय।  समुद्री न्यायालय सरकारी नियंत्रण और प्रभाव से मुक्त था। जबकि इसके विपरीत मेयर का न्यायालय सरकारी प्रभाव और उसके नियंत्रण के अंतर्गत कार्यरत था। इस चरण की एक महत्वपूर्ण बात यह थी, कि न्यायालय के अधिकांश न्यायाधीश विधि के ज्ञान से अनभिज्ञ थे।




 दंड का कोई निर्धारित दंड माफ नहीं था। और दंड राजा या शासक की इच्छा पर निर्भर करता था । अक्सर दंड कठोर तथा अमानवीय भी होते थे। जो कि अन्य लोगों का भय दिलाने के लिए तथा अपराध रोकने के लिए दिए जाते थे। कोई भी सजा स्त्री तथा पुरुष को बिना भेदभाव के दी जाती थी।।।।।।।।।

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