अपील क्या है और अपील कितने तरह की होती है || अपील कब दायर करते है || What is Appeal

विवेचना कर बताइए कि विधिशास्त्र विधि का दर्शन है अथवा विधि का ज्ञान | Jurisprudence is the Philosophy of Law or Knowledge of Law
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अपील क्या है अथवा अपील की परिभाषा

अपील क्या है- न्यायालय द्वारा किसी मामले में दिए गए निर्णय को उच्च न्यायालय से उच्च स्तर के न्यायालय में चुनौती दी जा सकती हैं। तब  मामले की दोबारा सुनवाई होती है। इसी को अपील के नाम से जाना जाता है। अपील तीन प्रकार की होती हैं।

अपील के तीन प्रकार निम्नलिखित है।

(के) – अभियुक्त द्वारा दायर अपील याचिका।

(ख) – राज्य सरकार द्वारा दायर अपील याचिका।

(ग) – अभियोजन पक्ष द्वारा दायर अपील याचिका।

(क) – अभियुक्त द्वारा दायर अपील याचिका।

भारतीय संविधान में यह व्यवस्था की गई है। कि कोई अभियुक्तों फैसले के विरुद्ध निम्न प्रकरणों में उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील याचिका दायर कर सकता है। धारा 372 से धारा 376 सीआर.पी.सी. से संबंधित है। (अपील क्या है)

1- उच्च न्यायालय न्यायाधीश सेशन कोर्ट के आदेश को परिवर्तित करते हुए मृत्यु दंड का आदेश दिया हो तो उच्चतम न्यायालय में निर्णय के विरुद्ध अपील याचिका दायर की जा सकती है।

2-  उच्च न्यायालय या अनुशंसा करे की निर्णय की अपील उच्चतम न्यायालय में की जाए।

3-  यदि उच्च न्यायालय ने लोअर कोर्ट से किसी प्रकरण को मंगवाया हो और उस प्रकरण में मृत्युदंड की सजा सुनाई हो।

4- सेशन न्यायालय ने अभियुक्त की रिहाई का फैसला सुनाया हो, और उच्च न्यायालय ने उसके  सर्वथा विपरीत जाकर मृत्यु दंड का आदेश दिया हो, या आजीवन कारावास दिया हो, या 10 वर्ष अथवा 10 वर्ष से अधिक की सजा सुनाई है, यह प्रावधान सीआर.पी.सी धारा 379 के अनुसार किया गया है।

5- यदि लोअर कोर्ट ने 7 वर्ष से अधिक के कारावास की सजा दी हो तो उच्च न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 374 के अनुसार अपील याचिका दायर की जा सकती है।

 धारा 373 के प्रावधान हैं कि कोई भी व्यक्ति निम्न के लिए अपील कर सकता है।

1- जिसे परिशांति कायम रखने और सदाचार के लिए प्रतिभूति देने के लिए धारा 117 के आदेश आदेश दिया गया हो।

2- जो धारा 121 के अधीन प्रतिभू स्वीकार करने से इनकार करने वाले आदेश से व्यथित है। सेशन न्यायालय में ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील की जा सकती है।

 दोष सिद्ध के  विरुद्ध अपील करना । (अपील क्या है)

1- उच्च न्यायालय द्वारा अधिक दंड दिए जाने के विरुद्ध व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।

2-जिस व्यक्ति को सेशन न्यायाधीश या आपर सेशन न्यायाधीश द्वारा किए गए विचारण में कारावास का दंड देश दोष सिद्ध के रूप में  दिया गया है। वह व्यक्ति उच्च न्यायालय द्वारा अपील कर सकता है।

2- जिस व्यक्ति को सेशन न्यायाधीश या अप्पर सेशन न्यायाधीश द्वारा किए गए विचारण में कारावास का दंड देश दोष सिद्ध के रूप में दिया गया है वह व्यक्ति उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है*  लोअर कोर्ट ने 7 वर्ष से अधिक के कारावास की सजा दी हो तो उच्च न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 374 के अनुसार अपील याचिका दायर की जा सकती है।

धारा 373 के प्रावधान हैं कि कोई भी व्यक्ति निम्न के लिए अपील कर सकता है।

1- जिस पर शांति कायम रखने और सदाचार के लिए प्रतिभूति देने के लिए धारा 117 के  आदेश दिया गया हो।

2- स्कूल फीस के अधीन प्रति स्वीकार करने से इनकार करने वाले आदेश से व्यथित है। सेशन न्यायालय में ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील की जा सकती है।

दोष सिद्ध के  विरुद्ध अपील।

1- उच्च न्यायालय द्वारा अधिक दंड दिए जाने के विरुद्ध व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।

2- जिस व्यक्ति को सेशन न्यायाधीश या अप्पर सेशन न्यायाधीश द्वारा किए गए विचारण में कारावास का दंड देश दोष सिद्ध के रूप में दिया गया है वह व्यक्ति उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है*

३- यदि लोअर कोर्ट ने 7 वर्ष से अधिक के कारावास की सजा दी हो तो उच्च न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 374 के अनुसार अपील याचिका दायर की जा सकती है।

धारा 373 के प्रावधान हैं कि कोई भी व्यक्ति निम्न के लिए अपील कर सकता है।

1- जिसे पर शांति कायम रखने और सदाचार के लिए प्रतिभूति देने के लिए धारा 117 के आदेश आदेश दिया गया हो।

2- स्कूल फीस के अधीन प्रति स्वीकार करने से इनकार करने वाले आदेश से व्यथित है। सेशन न्यायालय में ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील की जा सकती है।

दोष सिद्ध के  विरुद्ध अपील।

1- उच्च न्यायालय द्वारा अधिक दंड दिए जाने के विरुद्ध व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।

2-जिस व्यक्ति को सेशन न्यायाधीश या अप्पर सेशन न्यायाधीश द्वारा किए गए विचारण में कारावास का दंड देश दोष सिद्ध के रूप में दिया गया है वह व्यक्ति उच्च न्यायालय द्वारा अपील कर सकता है।

3- उपरोक्त द्वारा में जैसा प्रावधान है इसके अतिरिक्त कोई व्यक्ति।

(क) – महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए विचारण में दोष सिद्ध व्यक्ति सेशन न्यायालय में अपील कर सकता है।

(ख) – जो धारा 325 के अधीन दंडनीय हो वह भी सेशन न्यायालय में अपील कर सकता है।

(ग) – जिसे किसी मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 307 के अधीन परिविक्षा का लाभ दिया गया है। अथवा दंड आदेश पारित किया गया है। वह भी सेशन न्यायालय में अपील कर सकता है।

अभियुक्त जिन मामलों में दोषी होना स्वीकार करता है। उसके संबंध में धारा 375 का प्रावधान है । धारा 374 के संबंध में जहां अभियुक्त ने दोषी होना स्वीकार किया है। और उसी स्वीकारोक्ति पर उसे दोष सिद्ध किया गया है तो-

(क) – यदि दोष सिद्ध उच्च न्यायालय द्वारा की गई है, तो अपील नहीं की जा सकती।

(ख) -5 सेशन न्यायालय महानगर मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा की गई है तो अपील दंड के परिणाम या उसकी वैधता के बारे में ही हो सकेगी अथवा नहीं।




 छोटे मामलों में अपील ना होना।

धारा 376 में यह प्रावधान है कि धारा 374 में किसी बात के होते हुए भी दोषी करार दिया गया व्यक्ति कोई अपील निम्नलिखित मामलों में नहीं सकेगा-

(के) – जहां उच्च न्यायालय ने 6 माह तक के कारावास या ₹1000 तक का जुर्माना अथवा इन दोनों का दंडादेश दिया है।

(ख) – जहां सेशन न्यायालय या महानगर मजिस्ट्रेट ने 3 मास से अधिक का  कारावास नहीं, या ₹200 से अधिक जुर्माना नहीं अथवा इन दोनों का संयुक्त दंडादेश दिया हो तो अपील नहीं की जा सकती।

(ग) – जहां प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ने ₹100 तक का जुर्माना किया हो अपील नहीं होती।

(घ) – जहां संछिप्त विचारण के मामले की धारा 207 के अधीन कार्य करने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट ने ₹200 तक का जुर्माना किया हो वहां अपील नहीं हो सकती।

 लेकिन यदि किसी दंड के आदेश के साथ कोई अन्य दंड का आदेश मिला दिया गया हो तो ऐसे  दंडादेश के खिलाफ अपील की जा सकती है लेकिन वह निम्न अपराधों पर अपील के योग्य नहीं हो जाएगा कि –

1- दोष सिद्ध व्यक्ति की पर शांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति देने का आदेश दिया गया है।

2- जुर्माना देने में देरी होने पर कारावास के निर्देश को दंड के आदेश में शामिल किया गया है।

3- उस मामले में जहां जुर्माना का एक से अधिक दंड का आदेश दिया गया है यदि अधिसूचित जुर्माना की कुल रकम उस मामले की बाबत निर्दिष्ट की गई रकम से अधिक नहीं है।

(ख) – राज्य सरकार द्वारा दायर अपील याचिका।

उन मामलों में जहां अपराधी को दिया गया दंड अपर्याप्त है । और वह दंड उच्च न्यायालय से निचली अदालतों द्वारा दिया गया है। तो धारा 377 सीआरपीसी के तहत राज्य सरकार लोक अभियोजक की मार्फत उच्च न्यायालय में अपील याचिका दायर कर सकती है कुछ मामलों में केंद्र सरकार भी ऐसा कर सकती है इस प्रकार की अपील पर उच्च न्यायालय अभियुक्तों को सुनवाई का मौका देते हुए पूछ सकती है कि उसकी सजा क्यों ना बढ़ाई जाए इस पर अभियुक्त उच्च न्यायालय के सम्मुख अपना पक्ष रख सकता है।

(ग) – अभियोजन पक्ष द्वारा दायर अपील याचिका।

राज्य सरकार की ही भांति अभियोजक पक्षी भी अपराधी को मिली आप पर्याप्त सजा के लिए अपील याचिका दायर कर सकते हैं। अपील याचिका का तर्क क्या होता है। कि संगीन अपराध के दंड स्वरूप सुनाई गई सजा पर्याप्त नहीं है अतः सजा में वृद्धि की जानी चाहिए।




* जब धारा 378 के अधीन अपील दायर की जाती है तब उच्च न्यायालय वारंट जारी कर यह आदेश देगा कि अभियुक्त को गिरफ्तार कर अधीनस्थ न्यायालय के सामने उपस्थित किया जाए।  वह न्यायालय अभियुक्त को कारागार में रख सकता है जब तक की अपील का निवारण ना हो जाए अथवा उसकी जमानत स्वीकार कर सकता है।

* धारा 391 के अनुसार अपील न्यायालय यदि अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता समझता हो तो कारणों को आप लिखित करेगा और ऐसा साक्ष्य स्वयं लेगा या मजिस्ट्रेट द्वारा या जब अपील न्यायालय उच्च न्यायालय है तो सेशन न्यायालय में मजिस्ट्रेट द्वारा लिए जाने का आदेश दे सकता है।

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