Abolition and Retention of Capital Punishment in India – मृत्यु दण्ड को ख़तम करने और बनाये रखने के सिद्धांत

Abolition and Retention of Capital Punishment in India - मृत्यु दण्ड को ख़तम करने और बनाये रखने के सिद्धांत
Abolition and Retention of Capital Punishment in India - मृत्यु दण्ड को ख़तम करने और बनाये रखने के सिद्धांत
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Abolition and Retention of Capital Punishment in India – मृत्यु दण्ड को ख़तम करने और बनाये रखने के सिद्धांत

 

दण्ड के प्रमुख सिद्धान्त (Main theories of Punishment)


सामण्ड के अनुसार, अपराधिक न्याय के विभिन्न उद्देश्यों को दृष्टि में रखते हुये दण्ड के मुख्य रूप से चार सिद्धान्त प्रतिपादित किये जा सकते हैं-


निवारण सिद्धान्त (Deterrent Theory)

 

इस सिद्धान्त का उद्देश्य अपराधी को कठोरतम दण्ड देकर अन्य लोगों को भयभीत करके अपराधों को रोकना है। यह सिद्धान्त भय के मनोविज्ञान पर आधारित है। इस सिद्धान्त के प्रमुख समर्थक सोफिस्ट्स, बेन्थम, फिश्टे, प्लेटों आदि हैं। दण्ड इतना कठोर होना चाहिये जिससे भावी अपराधी उसको याद करके भयभीत हो उठे। अपराध की गम्भीरता को देखते हुए मृत्यु दण्ड देना न्यायोचित है बशर्ते कि उसका प्रभाव दूसरों के ऊपर व्यापक रूप से पड़ता हो ।

 

प्राचीन तथा मध्यकाल में भयात्मक दण्ड को अधिक महत्व दिया जाता था और अपराधियों को खुले स्थानों में फाँसी देना आदि, कठोर दण्ड प्रचलित थे। कठोर दण्ड का उद्देश्य न केवल अपराधी को दुबारा उस अपराध करने से रोकना है बल्कि उसको कठोरता से दण्डित करके दूसरों को सबक देना होता है ताकि जो लोग अपराध करने की बात सोचते हैं वे कठोर दण्ड के भय के कारण अपराध करने से रुक जायें।

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आलोचना (Criticism)-

 

वर्तमान युग में यह सिद्धान्त बहुत ही अव्यवहारिक, अमनोवैज्ञानिक, अतार्किक तथा अवैज्ञानिक ठहरता है। यदि दण्ड वास्तव में भयोत्पादक होता तो अपराध बिल्कुल समाप्त हो जाते या उनमें कमी आ जाती परन्तु ऐसा नहीं हुआ। 


उदाहरणार्थ-महारानी एलिजाबेथ के जमाने में जेब काटने के लिये मृत्यु दण्ड दिया जाता था फिर भी इस दृश्य को देखने के लिये इकट्ठी हुई भीड़ में ही जेब काटने, चोरी या छेड़छाड़ की अपराधिक वारदातें हो जाया करती थीं। अतः दण्ड का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। इस सिद्धान्त का मुख्य दोष यह है कि इसमें अपराधी को कठोर दण्ड देकर उसे आत्म सुधार के अवसर से वंचित रखा जाता है जो मानवीय दृष्टिकोण से अनुचित है। अतः यह सिद्धान्त अपने में पूर्ण नहीं है और इसके परिणाम अच्छे नहीं निकले हैं।

 

2. निरोधात्मक सिद्धान्त (Preventive Theory)-

 

इस सिद्धान्तानुसार अपराधी को पुन अपराध करने से रोकना है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु अपराधी को जेल में रखा जाता है, पदच्युत कर दिया जाता है या मृत्यु दण्ड दिया जाता । इसके मुख्य समर्थक होम्स तथा सामण्ड आदि हैं । सामण्ड अपने विचार के समर्थन में तर्क देते हुए कहते हैं कि हम सापों को इसलिये मार डालते हैं कि वे संसार में न रहें और यदि रहते हैं तो काट खाये जाने का भय बना रहेगा। इससे मुक्त रहने के लिये अच्छा यह होता है कि उन्हें रहने ही न दिया जाये। यही बात गम्भीर अपराधियों के बारे में भी लागू होती है। उन्हें प्राण दण्ड देकर आगे अपराध करने से रोक दिया जाता है। प्राचीनकाल में इसीलिये अपराधियों को अंग-भंग कर दिया जाता था ।

 

उदाहरणार्थ-योनी सम्बन्धी अपराध करने वालों को नपुसंक बना दिया जाता था।

 

आलोचना (Criticism)-

 

कान्ट के अनुसार, यह सिद्धान्त व्यक्ति को वस्तु के में प्रयोग करता है। उसे साधन मानता है कि न उद्देश्य । यह मानवता के सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता। इसके अलावा सभी अपराधियों को तो मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता। अपराधी जब कारावास से सजा भुगत कर बाहर आते हैं तो आदती अपराधी पुनः वही अपराध करने लगते हैं और उनके मन से दण्ड का भय खत्म हो जाता है। पैटन के अनुसार, यह सिद्धान्त अपराधियों की प्रवृत्ति में सुधार की ओर विशेष ध्यान नहीं देता।


3. प्रतिकारात्मक सिद्धान्त (Retributive Theory)-

 

यह सिद्धान्त बदले की भावना पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को उसके अपराध के अनुपात में ही दण्डित किया जाना चाहिये । “दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख तथा अंग के बदले अंग का सिद्धान्त इसमें लागू होता है। उस व्यक्ति का हाथ काट लेना ज्यायोचित होगा जिसने दूसरे का हाथ काटा हो अत यह सिद्धान्त “जैसे को तैसा (Tit for Tat) वाली कहावत पर आधारित है। इस सिद्धान्त के समर्थक “कान्द, सामण्ड तथा डॉ० इहरिंग आदि हैं। काट का मत है कि बदला लेने से मानव-भावनाओं को सन्तोष मिलता है। यह भी कहा जाता है कि दोष और दण्ड मिलकर निर्दोषिता के बराबर होते हैं।

 

आलोचना (Criticism)-

 

वर्तमान युग में यह सिद्धान्त बहुत ही अव्यवहारिक, अमनोवैज्ञानिक, अतार्किक तथा अवैज्ञानिक ठहरता है। यदि दण्ड वास्तव में भयोत्पादक होता तो अपराध बिल्कुल समाप्त हो जाते या उनमें कमी आ जाती। यह सिद्धान्त अव्यवहारिक तथा अनुपयोगी है इस सिद्धान्त में अपराधी के सुधार के लिये कोई स्थान नहीं है।

इसके मुख्य दोष हैं कि 1. जिस व्यक्ति का हाथ, पैर या नाक कट गई, उसका बदला उसी रूप में लेने से कोई लाभ नहीं होता बदला लेकर उस अंग का स्थानापन्न नहीं किया जा सकता। बैन्थम ने इसे शेर के मुख से मधु टपकने के समान माना है।

2. जो कष्ट या क्षति किसी व्यक्ति को हुये हैं उसके समान अनुपात में अपराधी को कष्ट देना सम्भव नहीं है ।

3. यदि यह सही है कि बदला लेने से आत्म-सन्तोष होता है तो हत्या के मामलों में इस प्रकार के आत्म-सन्तोष का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वास्तव में अपराध की जाने की परिस्थितियाँ होती हैं । अतः हमें अपराध के कारणों का उन्मूलन करके अपराधों को रोकना चाहिये।

 

4. सुधारात्मक सिद्धान्त (Reformative Theory)-

 

वर्तमान युग में अपराधियों को दण्डित करने की अपेक्षा उनके सुधार पर अधिक महत्व दिया जाता है। सुधारात्मक सिद्धान्त का उद्देश्य अपराधी के चरित्र सुधार पर विशेष बल देता है। अपराधी में यह भावना पैदा की जाती है कि अपराध करना एक सामाजिक बुराई है। इहरिंग के अनुसार, अपराध के तत्वों का पता लगाने तथा सामाजिक परिस्थितियों में दोष-निवारण करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाना चाहिये। अच्छे न्याय के लिये यह आवश्यक है कि अपराधी की मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, कौटम्बिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करके उनके संदर्भ में ही सजा तथा सुधार के उपायों को लागू किया जाये। LL.B Legal History Notes in Hindi – सुप्रीम कोर्ट तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच उत्पन्न मतभेदों का पटना वाद में वर्णन कीजिए।

 

महात्मा गाँधी के अनुसार, “अमय से घृणा करो अपराधी से नहीं। (Hate the sin not the sinner) इसी में हम सबका कल्याण निहित है । अपराध की जड़ को समाप्त करना हितकर है न कि अपराधी को क्योंकि अपराधी का भी समाज के लिये कोई महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। केवल अपराध करने से वह अमानव नहीं बन जाता है। उसमें मानवीय गुण छिपे रहते हैं। उनका विकास करना आवश्यक होता है। भारतीय इतिहास में इसके उदाहरण महर्षि बाल्मिकि तथा अंगुलीमाल आदि महापुरुष हैं ।


यह सिद्धान्त अपराधी को एक रोगी (Patient) के रूप में देखता है। जिस प्रकार चिकित्सा पद्धति से रोगी में सुधार लाया जाता है और उसे निरोगी कर दिया जाता है उसी प्रकार अपराधी में भी वैधानिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक उपायों से सुधार लाया जाना चहिये। जिस व्यक्ति ने जिस प्रकार का, जिन परिस्थितियों में अपराध किया है, उसी अनुपात में तथा उसी आधार पर दण्ड दिया जाना चाहिये। डॉ. विनोग्रेडाफ के अनुसार , न्यायाधीश की स्थिति एक डॉक्टर के समान ही है, उसको भी डॉक्टर की तरह बीमारी के कारणों की छानबीन करके रोग का उपचार करना चाहिये। Special Powers of President in India – राष्ट्रपति के विशेष अधिकार


आलोचना (Criticism)- यह सिद्धान्त अधिक उपयोगी है क्योंकि-

 

(i) यह अपराधियों का हृदय परिवर्तन करके अपराध के प्रति ग्लानि पैदा करता है,

(ii) यह किशोर तथा प्रथम अपराधियों के प्रति बहुत न्यायकारी सिद्ध हुआ है,

(iii) यह किशोर अपराधियों का अन्य अपराधियों से अलग रखकर, उन्हें दक्ष अपराधी बनने से रोकता है,

(iv) यह अपराधियों को व्यवसायिक शिक्षा देता है जिससे जब वे जेल से छूटते हैं तो अपना जौवन-निर्वाह कर सकते हैं। सामण्ड के अनुसार,

इस सिद्धान्त में तीन बुराईयाँ हैं-

(i) अपराधियों को शारीरिक, बौद्धिक तथा नैतिक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध करने के लिये कारावास को सुखद आवास गृह में बदलना होगा जिससे अपराधियों के हृदय में दण्ड का
भय खत्म हो जायेगा।

(ii) अपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों पर सुधार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा

(iii) इस नीति से अपराध करना एक लाभदायक धन्धा बन जायेगा। अतः सामण्ड इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि न्याय-प्रशासन की दृष्टि से न तो केवल सुधारात्मक पद्धति उपयुक्त है और न निवारणार्थ पद्धति, बल्कि इन दोनों का उचित समन्वय होना आवश्यक है।

 

भारत के लिये दण्ड का कौन-सा सिद्धान्त उपयुक्त है (Which theory of punishment is suitable for India )–

 

भारतवर्ष के लिये दण्ड का कोई एक सिद्धान्त उपयुक्त न होकर दण्ड का समन्वित रूप होना चाहिये । हम सामण्ड के इस विचार से सहमत
हैं कि दण्ड सुधारात्मक एवं प्रतिरोधात्मक पद्धति के समन्वय के आधार पर दिया जाना चाहिये । दण्ड का स्वरूप अपराधी की व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिये। कुछ अपराधी सामान्य एवं स्वस्थ प्रकृति के नहीं होते। ऐसे अपराधियों के प्रति सुधारात्मक दण्ड व्यवस्था लागू करना बेकार है।

 

इसके विपरीत महिला, किशोर या प्रथमतः अपराधियों को कठोर दण्ड देना अनुचित है। उन्हें सुधारात्मक दण्ड पद्धति से सुयोग्य नागरिक के रूप में पुनः स्थापित किया जाना चाहिये। डॉ० सेथना ने भी यही निष्कर्ष निकाला
है कि मुआवजा देने की बाध्यता, अनुचित कमाई को वापस लिया जाना, ऊपर से दण्ड ये तीनों बातें यदि समन्वित हैं तो अपराधी पुन अपराध करने के लिये प्रेरित नहीं होगा। भारतीय सविधान में विधिक शासन की अवधारणा | भारतीय संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया


(ब) मृत्यु दण्ड के पक्ष में तर्क (Arguments for Capital Punishment)-


मृत्यु दण्ड कठोरतम दण्ड होते हुये भी अनिवार्य है। मृत्यु दण्ड को बनाये रखने के लिए निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-


1. अपराधी का निवारण

 

मृत्यु दण्ड देकर अपराधी को उसके प्राणों से सदा के लिये वंचित कर दिया जाता है। वह संसार से हमेशा के लिये चला जाता है अत उसके द्वारा पुनः अपराध किये जाने का अवसर नहीं रह जाता। इससे अपराध की प्रत्यावर्तिता (Recidivism) की समस्या का काफी सीमा तक समाधान हुआ है । न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी इस तर्क का मुख्य आधार है।

 

2. अन्य व्यक्तियों का अपराधों से निर्वारित रहना-

 

मृत्यु दण्ड में अपराधी को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। इससे अन्य व्यक्ति जो अपराध करने का विचार रखते हैं भयभीत हो जाते हैं और अपराध करने का साहस नहीं करते । अतः मृत्यु दण्ड पुनः हत्याओं को रोकता है। यदि मृत्यु दण्ड को खत्म करके केवल आजीवन कारावास रख दिया जाये तो इससे हत्यारों को प्रेरणा मिलेगी क्योंकि भारतवर्ष में आजीवन कारावास की अवधि केवल दस वर्ष है।


3. दृष्टों के लिये एकमात्र उचित दण्ड

 

कुछ व्यक्ति आदतन अपराधी एवं खतरनाक प्रकृति के होते हैं। प्रत्येक समय कोई न कोई अपराध करते रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों का मात्र
एक इलाज मृत्यु दण्ड है। Indian Penal Code (IPC) Section 306 in Hindi || आई.पी.सी.की धारा 306 में क्या अपराध होता है?

 

4. जीवन एवं सम्पत्ति की सुरक्षा का साधन-

 

आदतन अपराधियों का उद्देश्य बिना किसी कारण के ही जन-साधारण की जानमाल को नुकसान पहुँचाने का होता है। वे हर समय-
लोगों को आतकिंत करते हैं। डाकू ऐसे ही व्यक्ति होते हैं। ऐसे अपराधियों से जीवन और सम्पत्ति की रक्षा का एक मात्र उपाय मृत्यु दण्ड ही है।


5. निर्दयी अपराधियों का अन्त

 

दया एक मानवीय गुण है जिसका अपराधियों में अभाव होता है। समाज सदा ही ऐसे लोगों से भयभीत रहता है। अतः ऐसे लोगों को
मृत्यु दण्ड देकर समाज को आतंक से मुक्त किया जा सकता है। High Court Judgement Transfer Petitions in Matrimonial Disputes


6. अपराधी वंश का अन्त

 

प्रारूपवादी सम्प्रदाय के विद्वानों के अनुसार अपराधी जन्मजात होते हैं तथा अपराधिकता उन्हें वंशानुक्रम में मिलती है। मृत्यु दण्ड से अपराधी का अन्त हो जाने से वह अपराधी वंश भी खत्म हो जाता है जिसकी भावी सन्तानें अपराधी हो सकती थीं।


7. कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने में सहायक-

 

यदि राज्य अपराधियों को उचित दण्ड देने में असफल रहता है तो पीड़ित व्यक्ति कानून को अपने हाथों में लेकर अपराधियों से बदला लेंगे। फलस्वरूप “जंगल का राज” स्थापित हो जायेगा। उदाहरणार्थ- यदि हत्यारे को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता तो मृतक के निकटतम सम्बन्धी हत्यारे की मृत्यु करके हत्या का बदला लेंगे तथा कानून एवं व्यवस्था भंग हो जायेगी .


8. सुखद एवं कम खर्चीला दण्ड-

 

मृत्यु दण्ड के स्थान पर अपराधी को आजीवन कारावास में रखने से राज्य की अपार धनराशि खर्च होती है जबकि मृत्यु दण्ड सुखद एवं कम खर्चीला है। उदाहरणार्थ-अमेरिका के गैली गिलमोर को उनकी स्वयं की प्रार्थना पर मृत्यु दण्ड दिया गया था।


9. सामाजिक एवं नैतिक आवश्यकता

 

समाज की प्रगति एवं विकास के लिये समाज का संगठित होना एक आवश्यक शर्त है। मृत्युदण्ड के डर से व्यक्ति समाज विरोधी कार्य
नहीं करता जिससे समाज संगठित बना रहता है। कुछ अपराधी इतनी दुष्ट प्रकृति के होते हैं कि वे समाज के लिये कभी उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकते । वे समाज में कोढ की बीमारी के समान हैं जो अपनी विनाशकारी गतिविधियों से समाज को सदा क्षति पहुँचाते रहते हैं। अतः
ऐसे अपराधियों को समाप्त करना समाज एवं राज्य का नैतिक कर्त्तव्य है


10. आत्म शुद्धि का साधन-

 

प्रत्येक अपराध (पाप) का प्रायश्चित होना चाहिये” यह एक प्राचीन धार्मिक मान्यता है। अतः मृत्यु दण्ड को आत्म-शुद्धि का साधन भी माना जात । ऐसा माना जाता है कि मृत्यु दण्ड देने से हत्या का प्रायश्चित हो जाता है और अपराधी की आत्मा शुद्ध होकर अगले जन्म में पुण्यात्मा बनती है।


मृत्यु दण्ड के विपक्ष में तर्क (Arguments against the capital punishment)-

 

कामिन्जर, बैकारिया और वैन्थम आदि ने मृत्यु दण्ड को पूर्णतः समाप्त करने की वकालत की है वे मृत्यु दण्ड को समाप्त करने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क पेश करते हैं-


1. मृत्यु दण्ड से अपराधों का निवारण नहीं होता कामिन्जर का मत है कि मृत्यु दण्ड में कोई सुधारात्मक गुण नहीं होता। इससे अपराधियों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। मृत्यु दण्ड की व्यवस्था भूतकाल से चली आ रही है किन्तु क्या आज हत्यायें आदि नहीं हो रही हैं। वास्तविकता यह है कि मृत्यु दण्ड से अपराधियों का उन्मूलन होता है अपराधों का नहीं। 


2. भय से अपराध नहीं रुकते-अपराधों का सीधा सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा और मनःस्थिति से होता है। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, आवेग आदि के कारण मनुष्य अपराध कर बैठता है। वास्तव में अपराधों के निवारण हेतु इन प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण स्थापित किया जाना
चाहिये। यदि दण्ड वास्तव में भयोत्पादक होता तो अपराध बिल्कुल समाप्त हो जाते या उनमें कमी आ जाती किन्तु ऐसा नहीं हुआ। उदाहरणार्थ-महारानी एलिजाबेथ के जमाने में जेब काटने के लिये मृत्युदण्ड दिया जाता था फिर भी इस दृश्य को देखने के लिये एकत्रित हुए
जन समुदाय में ही जेब काटने, चोरी या छेड़छाड़ की अपराधिक वारदात हो जाया करती थीं। अत दण्ड का कोई प्रभाव नहीं पडता था।


3. अपराधियों के वंश को समाप्त करने की धारणा प्रामाक है-अपराधी जन्मजात नहीं होते। परिस्थितियां मनुष्य को अपराधी बना देती हैं। ऐसा कोई उदाहरण देखने में नहीं आता है कि किसी परिवार के समस्त सदस्य अपराधी रहे हों। इसके विपरीत ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ पिता अपराधी है तो पुत्र आदर्शवान् रहा है या पुत्र अपराधी है तो पिता नेक व्यक्ति रहा है।


4. मृत्यु दण्ड सुखद एवं कम खर्चीला नहीं है-मृत्यु दण्ड पारित होने में वर्षों लग जाते हैं और इस समय तक अपराधी पर हुआ खर्च मृत्यु के साथ-साथ व्यर्थ हो जाता है। इसके बजाय यदि अपराधी को कारावास की सजा देकर उनसे कारागृह में काम लिया जाता है तो इससे अपराधियों को न केवल आय होगी बल्कि कारागृहों से वे अच्छे नागरिक बनकर लिकलेंगे।


5. मृत्यु दण्ड परिजनों के लिये संकटमय होता है कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को मृत्यु दण्ड दे दिया जाता है जो अपने परिवार में अन्धे की लकड़ी की तरह होता है। उसकी मृत्यु का दुष्परिणाम समस्त परिवार को भुगतना पड़ता है ।


6. मृत्यु दण्ड समाज के निर्धन वर्ग के लिये होता है न्याय प्राप्त करने के सम्बन्ध में यह कहावत सही उतरती है कि समरथ को नहि दोष गुसाई। यह कहा जाता है कि मृत्यु दण्ड केवल समाज के निर्धन वर्ग के लिये होता है। बहुत ही कम मामलों में किसी धनी या श्वेतपोश अपराधी को मृत्यु दण्ड मिलता है। बैन्थम का मत था कि धनी लोग न्याय को खरीद लेते हैं और जो इसका मूल्य नहीं चुका पाते वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। Explain Para Legal Service and its benefits || पैरा लीगल सर्विस इसके लाभ बताइए


7. मृत्यु दण्ड धर्म और अध्यात्म के विरुद्ध है-मृत्यु दण्ड से व्यक्ति को पीड़ा होती है। तथा हमारी संस्कृति अहिंसा में विश्वास करती है। “अहिंसा परमो धर्म हमारा आदर्श है। मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म मानवता के प्रति प्रेम, सहानुभूति और अहिंसा है। इसलिये पवित्र
बाइबिल में मृत्यु दण्ड का विरोध किया गया है।

 

निष्कर्ष (Conclusion)-

 

संक्षेप में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मृत्यु दण्ड केवल ऐसे अपराधियों के लिये रहना चाहिये जो शौक या चाव से हत्यायें करते हैं जैसे रंगा बिल्ला, कनफटीमार, शंकरिया आदि । इसके विपरीत कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो परिस्थिति- वश अपराध कर बैठते हैं तथा बाद में प्रायश्चित भी करते हैं। उनमें सुधरने की भावना होती है। ऐसे व्यक्तियों को मृत्यु दण्ड देना उचित नहीं होता है।

 

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